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सामाजिक सरोकारों को बनाया ध्येय, समाज को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित किया

Karpoor Chandra Kulish Is birth centenary: पत्रकारिता के शलाका पुरुष कर्पूरचंद्र कुलिश जी ने राजस्थान पत्रिका के माध्यम से पत्रकारिता को केवल ख़बरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज सेवा का बड़ा हथियार बनाया। जानिए कैसे उनके अभियानों ने लाखों लोगों की ज़िंदगी बदल दी।

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Feb 28, 2026
पत्रकारिता के शलाका पुरुष श्रद्धेय कर्पूरचंद्र कुलिश जी व सामाजिक सरोकार। फोटो: पत्रिका

Karpoor Chandra Kulish birth centenary: भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में श्रद्धेय कर्पूरचंद्र कुलिश जी (Karpoor Chandra Kulish)ने मीडिया के माध्यम से समाज के लिए कई ऐसे विशिष्ट और अभूतपूर्व कार्य किए,जो अमिट छाप छोड़ गए। उन्होंने अपने प्रभावी आलेखों और संपादकीयों के माध्यम से पाठकों व समाज में एक नई चेतना का संचार किया। कुलिश जी ने न सिर्फ़ जनता को उनके सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक किया और कर्तव्य बोध कराया, बल्कि स्वयं आगे बढ़ कर अनूठी मिसाल भी पेश की। उन्होंने 'राजस्थान पत्रिका' (Rajasthan Patrika) के मंच से सामाजिक सरोकारों को अख़बार का मूल ध्येय बनाया,इसके लिए वे ख़ुद अगुवा बन कर मैदान में डटे। इस तरह पाठकों को समाजसेवा व राष्ट्र-निर्माण के साथ मज़बूती से जोड़ दिया।

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कुलिश जी के लिए लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन मूल्य था

स्वस्थ समाज वही है, जो अपनी समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो

अहम बात यह है कि​ उनके लिए 'सामाजिक सरोकार' कोई केवल किताबी शब्द नहीं था, बल्कि यह उनकी ज़िंदगी और लेखन का मूल तत्व बन गया था। उनका मानना था कि एक अख़बार केवल मूक दर्शक या घटनाओं का रिपोर्टर नहीं हो सकता, बल्कि उसे समाज के सुख-दुख का साथी, प्रेरक और सतत सुधार में सहभागी होने के साथ ही दिशा-निर्देशक भी होना चाहिए। उन्होंने अपनी आत्मकथा "मैं देखता चला गया" और अपने स्तंभ "पोलमपोल" में बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि एक स्वस्थ समाज वही है, जो अपनी समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो। इस तरह वे पाठक को बार-बार जगाते रहे।

जनता को ही कर्तव्य बोध करना होगा (Indian Journalism)

उन्होंने अपने कई संपादकीय और अग्रलेखों में साफ तौर पर कहा कि सत्ता और सरकारें समाज का एक हिस्सा मात्र हैं, वे संपूर्ण समाज नहीं हैं। असली शक्ति जनता में निहित है और जनता को ही कर्तव्य बोध करना होगा। उनका मानना था कि जब तक समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के आंसू नहीं पौंछे जाते, तब तक कोई भी विकास बेमानी है। यह काम केवल सरकार के स्तर पर नहीं, पाठक और समाज के स्तर पर भी होना चाहिए। वेद और उपनिषदों के गहरे अध्येता होने के कारण उन्होंने उस ज्ञान को आत्म सात किया और उनका सामाजिक दर्शन 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की भावना से ओत-प्रोत बन गया।

समाज को राष्ट्र के विकास में कैसे लगाया जाए ?

कुलिश जी का साफ़ तौर पर मानना था कि केवल सरकारी योजनाओं या संसदों में बनने वाले क़ानूनों से राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता। इसके लिए राष्ट्र के विकास में समाज को भागीदार बनाने के लिए उन्होंने कई मार्ग सुझाए। अपने प्रखर संपादकीयों में कुलिश जी अक्सर लिखते थे, जिनका सार यह था कि समाज को हर छोटी-बड़ी बात के लिए सरकार का मुंह ताकना बंद करना होगा। जब समाज ख़ुद पहल करता है, तो बड़े से बड़े पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं।

वे चाहते थे कि विकास योजनाओं में जनभागीदारी हो

उनका मानना था कि विकास योजनाओं में जब तक स्थानीय लोगों का पसीना और पैसा (चाहे वह एक रुपया ही क्यों न हो) नहीं लगता, तब तक वे उस योजना को अपना नहीं मानते। उन्होंने 'सहकार' की भावना को राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी कुंजी बताया था। कुलिश जी के अनुसार, एक चरित्रहीन और अपनी जड़ों से कटा हुआ समाज कभी महान राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता। वे चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो, जो युवाओं में अपनी संस्कृति, भाषा और मिट्टी के प्रति कर्तव्य बोध व गर्व पैदा करे। वे विकास की उस अंधी दौड़ के ख़िलाफ़ थे, जो प्रकृति का विनाश करती हो। समाज को अपनी नदियों, तालाबों और पर्यावरण का रक्षक ख़ुद बनना होगा।

राजस्थान पत्रिका के सामाजिक सरोकार वाले अभियान (Social interest)


कर्पूरचंद्र कुलिश जी की इसी दूरदर्शी सोच का परिणाम था कि राजस्थान पत्रिका केवल एक अख़बार नहीं, बल्कि एक 'सामाजिक संस्था' बन गया। उनके मार्गदर्शन में पत्रिका ने ज़मीनी सतह पर ऐसे कई ऐतिहासिक व प्रभावी अभियान चलाए जिन्होंने जनभागीदारी की मिसाल पेश की।

अकाल और सूखा राहत अभियान दशकों तक चला (Social Impact)

राजस्थान की विषम भौगोलिक स्थिति के कारण इस प्रदेश में अकाल एक स्थायी त्रासदी रही है। कुलिश जी के नेतृत्व में पत्रिका ने हर भीषण अकाल के दौरान 'अकाल राहत कोष' की स्थापना की। अख़बार की अपील पर आम जनता, व्यापारियों और प्रवासियों ने करोड़ों रुपये दान किए, जिससे गांव-गांव में चारा डिपो खोले गए, पानी पहुंचाया गया और अन्न क्षेत्र चलाए गए।

कारगिल शहीद कोष (1999) बनाया

जब 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ, तो राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत कुलिश जी के मार्गदर्शन में राजस्थान पत्रिका ने शहीदों के परिवारों की मदद के लिए एक बड़ा अभियान छेड़ा। पत्रिका की अपील पर पाठकों ने दिल खोल कर दान दिया। इस कोष से न केवल शहीद परिवारों की आर्थिक मदद की गई, बल्कि उनके बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास का भी स्थायी प्रबंध किया गया।

गुजरात भूकंप राहत कोष (2001)

कुलिश जी ने 2001 में गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंप के समय राष्ट्रीय एकता का परिचय देते हुए राजस्थान पत्रिका की ओर से राहत कोष शुरू किया। समाज के सहयोग से राजस्थान से ट्रकों में भर कर राशन, दवाइयां, टेंट और कपड़े गुजरात भिजवाए गए। यह इस बात का प्रमाण था कि पत्रिका के सरोकार केवल राजस्थान की सीमाओं तक सीमित नहीं थे।

अमृतं जलम्' अभियान के माध्यम से जनता को जल स्रोतों का संरक्षण करना सिखाया

उन्होंने सूखे और बदहाल जलाशयों को जीवनदान देने के लिए 'अमृतं जलम्' अभियान के माध्यम से बीड़ा उठाया। यूं तो इस अभियान ने बाद के वर्षों में एक वटवृक्ष का रूप लिया, लेकिन जल संरक्षण की इसकी वैचारिक नींव और शुरुआत कुलिश जी के जीवनकाल में ही 2004-2005 के आसपास हो चुकी थी। उन्होंने समाज को चेताया था कि "अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।" उनके इसी चिंतन को धरातल पर उतारते हुए पत्रिका ने बावड़ियों, तालाबों और कुओं की साफ़-सफ़ाई के लिए लाखों लोगों को श्रमदान के लिए प्रेरित किया। उनकी प्रेरणा से आगे आए उस जनसमूह की यादों पर मजरूह सुल्तानपुरी का यह शेर याद आता है:

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

जन मंगल ट्रस्ट के माध्यम से शिक्षा और स्वास्थ्य

कुलिश जी ने यह सुनिश्चित किया था कि अख़बार से होने वाली आय का एक हिस्सा समाज को वापस मिले। इसके लिए उन्होंने ट्रस्ट स्थापित किए गए, जिनके माध्यम से ग़रीब मेधावी छात्रों को छात्रवृत्तियां, सुदूर इलाक़ों में चिकित्सा शिविर और पुस्तकालयों की स्थापना जैसे किए गए।

देश और समाज का प्रकाश स्तंभ की तरह मार्गदर्शन

बहरहाल, कर्पूरचंद्र कुलिश जी की जन्म शती हमें यह याद दिलाती है कि पत्रकारिता का अंतिम लक्ष्य 'लोक कल्याण' है। उन्होंने अपने विचारों और राजस्थान पत्रिका के अभियानों के माध्यम से यह साबित कर दिया कि जब एक अख़बार समाज की आवाज़ बन जाता है, तो वह पूरे राष्ट्र की दिशा बदलने की ताक़त रखता है। आज के इस दौर में, जहां पत्रकारिता पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं, कुलिश जी का जीवन दर्शन और उनकी ओर से कायम किए गए जन-सरोकार के मापदंड एक प्रकाश स्तंभ की तरह देश और समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

(यह आलेख श्री कर्पूरचंद्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)

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