Indore Contaminated water Death: विधानसभा में सुनाई दी इंदौर के दूषित पानी से अब तक 35 मौतों के मामले की गूंज, जमकर हुआ हंगामा, सदन की मर्यादा भंग, जनहित के मामले में सदन के ये हाल... और इंदौर चुप है... अहिल्या नगरी का ये मौन अखरता है...
पंकज श्रीवास्तव,
Indore Contaminated water Death: इंदौर के दूषित पानी से अब तक 35 मौतों के मामले की गूंज गुरुवार को विधानसभा में सुनाई दी। काफी हंगामा हुआ। इतना कि अध्यक्ष ने इस मामले पर चर्चा कराने का आश्वासन दिया। इतना हंगामा कि सदन की मर्यादा भंग हुई। अफसोस की ये सब हुआ जनहित के मामले में उठे सवालों पर। बस इसलिए कि विपक्ष मांग उठाए है कि नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इस्तीफा दें। भागीरथपुरा आखिर उनके ही विधानसभा क्षेत्र में आता है। अब विपक्ष पर सत्ता पक्ष आरोप लगा सकता है कि वो राजनीतिक लाभ लेने के लिए इसे मुद्दा बना रहे हैं। पर मीडिया....
मीडिया तो लगातार पेयजल व्यवस्था की खामियां गिनवा रहा है और बदले में उसे अपशब्द भी सुनने को मिल चुके हैं। एक तरह से देखा जाए तो मीडिया और विपक्ष ने वो पाला संभाल रखा है जिसे इंदौर की आम अवाम संभालती थी। इंदौर, सबसे जिंदा शहर। न्यायप्रियता के लिए जाना जाने वाला। मां अहिल्या से न्याय के लिए लडऩा जो सीखा है। सीखा है कि न्याय के लिए अपनों की भी कुर्बानी देनी पड़े तो पीछे नहीं हटना। वही इंदौर आज मौन साधे है।
27 दिसंबर से मौतों का सिलसिला शुरू हुआ और वो रुका नहीं। धीरे-धीरे संख्या 35 तक जा पहुंची। शुरुआत में कुछ जागरूक इंदौरी पहुंचे पीड़ितों का साथ देने के लिए। और अब बस मौन पसरा है। कोई प्रतिक्रिया नहीं। ये इंदौर ऐसा कभी नहीं रहा है। कैसा भी वक्त रहा हो, अपने लिए लड़ा है। सामने कोई भी हो। माफिया सामने आए हों या गुंडे, इंदौर ने एकजुट होकर मोर्चा संभाला। एक वक्त था कि जब गुंडाराज ने महिलाओं को परेशान कर दिया था। इंदौर तब साथ लड़ा। जनआंदोलन हुआ। पुलिस ने सरेआम जुलूस निकाले गुंडों के। आज महिलाएं देर रात तक सराफा जैसे स्थानों पर बेखौफ आती-जाती हैं। माहौल सुधरा तो कोचिंग्स ने इस शहर को अपनाया। आज मध्यप्रदेश में कोटा जैसी इज्जत है इंदौर की।
बात स्वच्छता की आई तो सब ऐसे जुटे कि लगातार खिताब अपने पास रखा। मजाल है कोई इनके शहर को गंदा कर जाए। क्रिकेट में जीत हो या ऑपरेशन सिंदूर का वक्त। राजबाड़ा तिरंगों से पट गया। एक-एक घर से युवा, बुजुर्ग-बच्चे सब राजबाड़ा में एकत्र दिखे हमेशा। रंगपंचमी की गेर में भी एंबुलेंस को जगह देने वाले इंदौर ने हमेशा भावनाओं का शानदार परिचय दिया है। पर पेयजल जैसे मुददे पर इस शहर का मौन अखरता है। राजबाड़ा की खामोशी अखर रही है। 35 लाशें उठने के बाद भी कोई एक यहां अहिल्या माता के समक्ष धरने पर नहीं बैठा।
कैसी विडंबना है कि हम चीते के शावकों के जन्म पर खुशियां मना लेते हैं पर इतनी मौतों पर हमारे दिल नहीं पसीजते। राजबाड़ा पर माता अहिल्या की प्रतिमा मौन देख रही है। जीते-जागते लोगों को पत्थर की प्रतिमा होते हुए। जब विपक्ष ने प्रदर्शन किया तब वहां भी पीडि़तों के साथ उनके परिवारों के अलावा कोई नजर नहीं आया। क्या इंदौर ये मान बैठा है कि अपेक्षित न्याय मिल चुका है इस मामले में! नहीं तो फिर मौन की वजह क्या है? इस मौन का खमियाजा समझें अब। जब इंदौर में बात पेयजल की उठी तो मीडिया ने प्रदेशभर से ऐसी अनेक खामियां खोजीं। वैसे ही हालात अनेक शहरों में। खबरें चलीं। कुछ अफसरों-कर्मचारियों पर एक्शन हुआ और मामला थम गया। अब जब इंदौर ने मौन धर लिया तो बाकी क्यों उठेंगे? तो होगा ये कि भविष्य में ऐसे मामले गंभीरता से नहीं लिए जाएंगे। उसी आंखों से आंसू बहेंगे जिसके घर से अर्थी उठेगी। वाटर फिल्टर लगाकर या बोतलबंद पानी पीने वालों की आंखों का पानी तो मर ही चुका है। इस पानी के मरने के नतीजे पीढ़ियां भुगतेंगीं। जल्द ही भू-जल भी दूषित होगा या अत्यधिक दोहन से सूख चुका होगा।
नदियां प्रदूषण से बिलबिला रही हैं पहले ही। तालाब हम पहले ही लील चुके हैं। यानी पेयजल खत्म। पानी तब बनेगा असली धंधा। इतना महंगा कि पीढिय़ां हमें कोसेंगीं। हमारी करनी पर थूकेंगीं। ऐसा न हो इसके लिए आज जनमानस को सवाल करना है बस। एक साथ मिलकर। क्यों सीवेज के साथ पेयजल की लाइन बिछाई गईं? नई पाइप लाइन बिछाने में क्यों देरी हो रही है? क्यों इतना संपत्तिकर देने के बाद भी पानी वैसा शुद्ध नहीं कि सीधे नल से पी सकें? पानी की टंकिया गंदी क्यों? पाइप लाइन जर्जर क्यों? लापरवाह अपने पदों पर क्यों? मुखर होने का वक्त है। जिंदा रहने ही नहीं, दिखने का भी वक्त है। जब इंदौर एक साथ सवाल करेगा तो उम्मीद है कुछ नैतिकता लौटती दिखे उनमें, जो बड़े से बड़े मामले को हंसी में उड़ा देते हैं।
बस इतना करें कि जब भी स्वच्छता की बात हो तो पूर्ण स्वच्छता की हो। सिर्फ सड़कें- गलियां नहीं, हमें हवा भी साफ चाहिए और पानी तो हर हाल में शुद्ध चाहिए। आधी-अधूरी स्वच्छता की योजनाएं आने वाली पीढिय़ों के लिए सही नहीं। व्यवस्थाओं के जिम्मेदार लोगों के मन में भी स्वच्छता होनी जरूरी है, जिससे वे आमजन के जीवन से जुड़े मामलों में निर्मल मन से न्याय कर सकें और जनहित के फैसले लेने के लिए बनी संस्थाओं की मर्यादाएं कभी भंग न हों।