ओपिनियन

कर्नाटक तय करेगा हवा का रुख

प्रधानमंत्री मोदी से राज्य में भले ही कुछ नाराजगियां हों किंतु उनकी प्रतिष्ठा बरकरार है।
3 min read
Apr 30, 2018
opinion,work and life,rajasthan patrika article, karnataka election
karnataka election

- नीरजा चौधरी, राजनीतिक विश्लेषक

कर्नाटक विधानसभा चुनाव को 2019 के आम चुनाव से जोडक़र देखा जा रहा है। १५ मई को आने वाले परिणाम भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। हाल ही में बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा सीटों के लिए उपचुुनाव नतीजे भाजपा के लिए अच्छे नहीं रहे। कहा गया कि ये उपचुनाव बदलाव की जनभावना की ओर इशारा करते हैं। यदि कर्नाटक चुनाव भाजपा जीत जाती है तो कहा जाएगा कि बदलाव की जनभावना का तर्क ठीक नहीं है। भाजपा कर्नाटक चुनाव को ‘दक्षिण भारतीय राज्यों के गेटवे’ के रूप में देख रही है। यदि कर्नाटक की जनता भाजपा को हरी झंडी देती है तो सम्पूर्ण भारत को भगवामय करने के उसके लक्ष्य में ये चुनाव मददगार साबित होंगे। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बीते तीन दशकों में कर्नाटक में कोई भी दल फिर से सत्ता हासिल करने में कामयाब नहीं हुआ है।

यदि कर्नाटक में कांग्रेस जीतती है तो कहा जाएगा कि यह उसके पुनरुद्धार की शुरुआत है। बाद के चुनावों में गठबंधन के लिहाज से वह मजबूती के साथ दावा पेश कर सकेगी क्योंकि जीत की स्थिति में उसे चढ़ता हुआ सितारा समझा जाएगा। अन्यथा, अन्य दलों के साथ गठबंधन में उसकी स्थिति काफी कमजोर होगी जैसा कि उत्तरप्रदेश में उसके साथ हुआ। इसके अलावा यह भी संदेश जाएगा कि देश, कांग्रेसमुक्त होने की ओर बढ़ रहा है। कुल मिलाकर कांग्रेस के लिए जीत ही उसके पुनरुद्धार का मार्ग प्रशस्त करेगी। इसके सिवाय उसके पास रास्ता भी नहीं है।

उधर, कर्नाटक में विशेष तौर पर दक्षिणी क्षेत्र में जनता दल (एस) तेजी से उभरती लग रही है। युवाओं के बीच कुमारस्वामी की लोकप्रियता बढ़ी है। यदि जनता दल (एस) 40-50 सीटें जीतती है तो क्षेत्रीय दलों के लिए संकेत होगा कि उनके पुनरुद्धार का मौका बना हुआ है। क्षेत्रीय दलों के लिए यह उत्साहवर्धक होगा, फिर चाहे 2019 के आम चुनाव में वे किसी के भी साथ जाने का फैसला करें। कर्नाटक में कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए विशेष तौर पर पुराने मैसुरू क्षेत्र में जनता दल (एस) और भाजपा के बीच जमीनी स्तर के समझौते के भी संकेत मिल रहे हैं।

कांग्रेस एक बार फिर सरकार बनाने की स्थिति में आती है तो इसका अधिकाधिक श्रेय सिद्धारमैया को ही जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी पहले ही साफ कर चुके हैं कि सिद्धारमैया ही राज्य में कांग्रेस का चेहरा हैं और चुनाव जीतने के बाद वही मुख्यमंत्री होंगे। कुल मिलाकर कर्नाटक विधानसभा चुनाव, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सिद्धारमैया की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन रहा है। कर्नाटक में भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं बन सका है। आमतौर पर सरकार के खिलाफ विपक्ष के पास यह प्रमुख मुद्दा रहता है, लेकिन मतदाता जानते हैं कि विपक्ष भी दूध का धुला नहीं है।

सिद्धारमैया अपने काम के आधार पर ही वोट मांग रहे हैं। उन्होंने दलित, मुस्लिम और ओबीसी के गठजोड़ का प्रयास किया है। शुरुआत में उन्होंने इस गठजोड़ को केंद्रित करते हुए कल्याणकारी योजनाएं बनाईं और फिर उन्हें सभी के लिए लागू कर दिया। उन्होंने आमजन को एक रुपए किलो चावल, मुफ्त अंडा उपलब्ध कराया और फिर इंदिरा कैंटीन भी शुरू की। इस कैंटीन में उन्होंने 10 रुपए में पर्याप्त मात्रा में साफ-सुथरा दाल-चावल उपलब्ध कराया। उन्होंने विद्यार्थियों के लिए मुफ्त किताबें व लैपटॉप भी बंटवाए।

पांच साल में आमतौर पर लोग सरकार से नाराजगी रखते हैं, लेकिन उनके कामकाज से लोग संतुष्ट नजर आते हैं। सिद्धारमैया ने एक अन्य दांव खेला है, कन्नड़ स्वाभिमान का। उन्होंने राष्ट्रगान के साथ कर्नाटक के राज्यगान और अलग राज्यध्वज की बात की है। इसी तरह उन्होंने परंपरागत तौर पर भाजपा समर्थक रहे लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जे का दांव खेलकर इस भाजपाई किले में सेंध लगाने की कोशिश भी की है। पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा लिंगायत समुदाय से हैं, वे इस समुदाय को अल्संख्यक दर्जा देने का समर्थन भी करते हैं।

यूं तो कांग्रेस की ओर से सिद्धारमैया ही उसके मुख्यमंत्री के दावेदार हैं, लेकिन कांग्रेस बहुमत
के करीब रही तो पहले वह जीते हुए अन्य निर्दलीय विधायकों के साथ गठबंधन पसंद करेगी। यदि जनता दल (एस) से गठबंधन की स्थिति बनी तो प्लान बी के तहत कांग्रेस को सिद्धारमैया का नाम वापस लेना पड़ सकता है। क्योंकि एच.डी.देवेगौड़ा-कुमारस्वामी को सिद्धारमैया किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं होंगे। उधर, येद्दियुरप्पा का अभियान काफी धीमा चल रहा है और भाजपा भी उन पर दांव लगाने में हिचक रही है। अमित शाह और उनकी टीम ही चुनाव प्रबंधन देख रही है। हालांकि पीएम मोदी का इंतजार है। भले ही कुछ नाराजगियां हों किंतु मोदी की प्रतिष्ठा बरकरार है। देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे गुजरात जैसा जादू कर्नाटक में दिखा पाएंगे? अंतर यही है कि गुजरात उनका गृह राज्य है और इस बार चुनाव कर्नाटक में हैं, जहां दूसरी भाषा में भाषण से मतदाता को रिझाना उनके लिए आसान नहीं होगा।

Published on:
30 Apr 2018 09:50 am