Karpoor Chandra Kulish: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्म शताब्दी पर जानिए संविधान और गरीबी पर उनका दर्शन। उन्होंने हमेशा अंतिम छोर के व्यक्ति को व्यवस्था के केंद्र में लाने और मुफ्तखोरी के बजाय अधिकार देने की वकालत की।
Karpoor Chandra Kulish Birth Centenary: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश की जन्म शताब्दी (2026) केवल एक पत्रकारीय यात्रा का उत्सव नहीं है; यह एक ऐसे दार्शनिक के विचारों के पुनर्मूल्यांकन का समय है, जिसने लोकतंत्र की नब्ज को सड़क से लेकर संसद तक महसूस किया। कुलिश जी ने 'धाराप्रवाह' में अपने जीवन को शब्दों में पिरोया, लेकिन उनके असली वैचारिक 'हस्ताक्षर' उनके संपादकीय लेखों ('दृष्टिकोण') और सार्वजनिक भाषणों में दर्ज हैं। आमतौर पर कुलिश जी को एक निर्भीक पत्रकार और राजस्थानी अस्मिता के पैरोकार के रूप में याद किया जाता है। लेकिन, भारत के संविधान की कार्यप्रणाली और देश में पसरी गरीबी के अंतर्संबंधों पर उनका जो मौलिक चिंतन था, वह आज के राजनीतिक विमर्श में कहीं अधिक प्रासंगिक है। उनका यह दर्शन अकादमिक नहीं, बल्कि टोंक के सोडा गांव की धूल और दिल्ली के सत्ता-गलियारों की विडंबनाओं से उपजा था।
कुलिश जी ने अपने आलेखों और 'दृष्टिकोण' में बार-बार इस बात पर जोर दिया कि भारत का संविधान दुनिया का सबसे बेहतरीन दस्तावेज होने के बावजूद, अपने क्रियान्वयन में कई बार आम आदमी से कट जाता है। उनका मानना था कि संविधान वकीलों की बहस का विषय या सत्ताधीशों के शासन का टूल मात्र नहीं होना चाहिए; इसे गांव की चौपाल पर बैठे उस आखिरी आदमी का 'सुरक्षा कवच' होना चाहिए, जिसे अपने अधिकारों का नाम तक नहीं पता। उन्होंने महसूस किया कि सत्ता वर्ग अपनी सुविधानुसार संविधान की व्याख्या करता है। जब भी व्यवस्था में बैठे लोगों ने संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने या संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ करने की कोशिश की, कुलिश जी की कलम ने तीखा प्रहार किया।
उनके अनुसार, 'संविधान की असली परीक्षा अदालतों के वातानुकूलित कमरों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह एक निरक्षर और शोषित व्यक्ति को सत्ता के मनमानेपन से कितना बचा पाता है।' उनके लेखों में यह चिंता झलकती थी कि न्याय प्रक्रिया की जटिलता और संवैधानिक शब्दावली का भारीपन कहीं 'आम आदमी' को लोकतंत्र की मुख्यधारा से बाहर न कर दे। इसीलिए उन्होंने अपने अखबार की भाषा को इतना सरल रखा कि एक मजदूर भी अपने संवैधानिक अधिकारों को अपनी ही बोली में समझ सके।
कुलिश जी का रुख गरीबी को लेकर तत्कालीन सरकारों की नीतियों-चाहे वह 'गरीबी हटाओ' का नारा हो या पंचवर्षीय योजनाओं के भारी-भरकम बजट-पर हमेशा एक सतर्क आलोचक की तरह रहा। उन्होंने 'धाराप्रवाह' में ग्रामीण जीवन के यथार्थ का जो खाका खींचा है, वह स्पष्ट करता है कि उनके लिए गरीबी केवल 'पैसे की कमी' या 'अर्थशास्त्र का एक आंकड़ा' नहीं थी। उनके अनुसार, गरीबी दरअसल 'मानवीय गरिमा का हनन' और 'निर्णय लेने की शक्ति से वंचना' है। वे अपने भाषणों में अक्सर इस बात पर नाराजगी का इजहार करते थे कि नीतियां वातानुकूलित कमरों में वे नौकरशाहो बनाते हैं, जिन्होंने कभी नंगे पैर चिलचिलाती धूप में मीलों चल कर पानी नहीं भरा।
कुलिश जी लिखते थे कि सरकारें गरीबी को एक 'प्रोजेक्ट' की तरह देखती हैं, जबकि यह एक गहरी सामाजिक बीमारी है। मुफ्त राशन या खैरात बांटने की राजनीतिक संस्कृति के वे सख्त खिलाफ थे। उनका दर्शन था कि गरीब को दान नहीं, बल्कि 'अवसर और अधिकार' चाहिए। जब तक व्यवस्था गरीब को उसका स्वाभिमान नहीं लौटाती और उसे उत्पादक अर्थव्यवस्था का सक्रिय हिस्सा नहीं बनाती, तब तक गरीबी उन्मूलन के सारे सरकारी दावे केवल कागजी 'पोलमपोल' साबित होंगे।
कुलिश जी के वैचारिक लेखन ('हस्ताक्षर' और संपादकीय) का सबसे धारदार पहलू वह था जहां वे संविधान और गरीबी को आमने-सामने खड़ा करते थे। उनका सवाल सत्ता से हमेशा यह रहा कि 'अगर हमारा संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है, तो फिर आजादी के इतने दशकों बाद भी हाशिये पर खड़ा वर्ग व्यवस्था के केंद्र में क्यों नहीं आ सका?'
उन्होंने बेबाकी से लिखा कि गरीब की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अपने उन संवैधानिक अधिकारों को लागू करवाने की हैसियत ही नहीं रखता, जो उसे कागज पर दिए गए हैं। न्याय महंगा है और सत्ता की पहुंच गरीब की चौखट से बहुत दूर। कुलिश जी ने पत्रकारिता को वह सेतु बनाया जो इस खाई को पाटने का काम करे। उन्होंने अखबार के पन्नों को आम जनता की 'संवैधानिक अदालत' में तब्दील कर दिया, जहां बिना किसी वकील की फीस चुकाए, जनहित के मुद्दों पर सीधे सत्ता से जवाब-तलब किया जाता था।
कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्म शती पर उनके इस दर्शन का पुनर्पाठ इस बात का प्रमाण है कि वे अपने समय से कितने आगे की सोच रखते थे। आज जब आर्थिक असमानता बढ़ रही है और संवैधानिक मूल्यों को लेकर बहसें तेज हैं, कुलिश जी का साहित्य हमें आगाह करता है। उन्होंने सिखाया कि लोकतंत्र की सफलता इसमें नहीं है कि कितने लोग वोट डालते हैं, बल्कि इसमें है कि कितने लोगों को गरीबी के अभिशाप से मुक्त कर उन्हें संविधान के छाते के नीचे सम्मानजनक जगह दी जाती है। कुलिश जी के लिए पत्रकारिता का अंतिम लक्ष्य यही था-एक ऐसे समाज का निर्माण जहां संविधान केवल राजपत्रों में न रहे, बल्कि सड़क पर चलते हर आम भारतीय के जीवन का स्पंदन बन जाए। उनका यह चिंतन न केवल राजस्थान पत्रिका के लिए, बल्कि समूचे भारतीय मीडिया और नीति-निर्माताओं के लिए आज भी एक अनिवार्य 'मार्गदर्शिका' है।
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