Karpoor Chandra Kulish : श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी ने अपनी पुस्तक 'दृष्टिकोण' में फास्ट-फूड की कृत्रिमता को नकारते हुए भारतीय पारंपरिक खान-पान, ऋतुचर्या और सात्विक आहार को ही सच्ची औषधि बताया है। उनका यह जीवन दर्शन आज के आधुनिक समय में बीमारियों से बचने और स्वस्थ एवं संतुलित जीवन शैली अपनाने के लिए एक सटीक और वैज्ञानिक मार्ग है।
Karpoorchandra Kulish's birth centenary : आधुनिक भारत की पत्रकारिता के आधार स्तंभ, राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी (Karpoor Chandra Kulish) का जीवन केवल समाचारों के संकलन तक सीमित नहीं था। वे भारतीय संस्कृति, वेद विज्ञान और लोक-जीवन के गहरे अध्येता थे। उनकी चर्चित पुस्तक 'दृष्टिकोण' में संगृहीत आलेखों में उनकी यही दूरगामी सोच स्पष्ट रूप से झलकती है। आज जब हम उनकी जन्म शताब्दी (1926-2026) मना रहे हैं, तब इस पुस्तक में 'भारतीय खान-पान' और जीवनशैली पर उनके व्यक्त किए गए विचार एक संजीवनी की तरह प्रतीत होते हैं। कृत्रिमता और फास्ट-फूड की अंधी दौड़ में हांफते आज के समाज को कुलिश जी का यह आलेख याद दिलाता है कि भारत का खान-पान (Traditional Indian Food) केवल उदर-पोषण का साधन नहीं, बल्कि एक पूर्ण विज्ञान, आयुर्वेद और अध्यात्म का अद्भुत संगम है।
कुलिश जी का मानना था कि मनुष्य का शरीर और उसका स्वास्थ्य उसके परिवेश की उपज है। आयुर्विज्ञान का मूल आधार ही यह है कि किसी भी रोग या रोगी का अध्ययन केवल उसके शारीरिक लक्षणों तक सीमित न हो, बल्कि उसके परिवेश और खान-पान का गहराई से अध्ययन किया जाए। उनका विचार था कि अलग-अलग क्षेत्रों में जलवायु के अनुसार लोगों की शारीरिक आवश्यकताएं भिन्न होती हैं। जो अन्न जिस जलवायु में पैदा होता है, वह वहां के निवासियों के लिए सबसे अधिक सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक होता है। कुलिश जी ने चिकित्सा के उस बाजारीकरण पर हमेशा कटाक्ष किया जो बीमारी को केवल दवाओं से ठीक करने का दावा करता है। उनका दृष्टिकोण था कि सही 'आहार-विहार' ही सबसे बड़ी औषधि है।
उन्होंने बताया था कि चैत्र के महीने में क्या खाना चाहिए और भाद्रपद में किन चीजों का परहेज करना चाहिए, यह ज्ञान भारतीय किसानों और महिलाओं को पीढ़ियों से मिला है। इस 'ज्ञानी' के सामने अच्छे-खासे पढ़े-लिखे लोग नासमझ दिखाई देते हैं। उनकी नजर में ऋतुचर्या और सात्विक आहार का दर्शन भारतीय खान-पान की सबसे बड़ी विशेषता इसका ऋतुओं के साथ तालमेल (ऋतुचर्या) है। 'दृष्टिकोण' के माध्यम से कुलिश जी इसी विज्ञान को रेखांकित करते हैं:
कुलिश जी का मानना था कि सात्विक भोजन से ही विचार शुद्ध होते हैं। भोजन केवल शरीर को ऊर्जा नहीं देता, वह हमारे मन और मस्तिष्क की प्रवृत्तियों को भी गढ़ता है। उन्होंने तासीर का विज्ञान बताया। सर्दियों में बाजरा, तिल और गुड़ का सेवन तथा गर्मियों में छाछ और राबड़ी का उपयोग कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि शुद्ध वैज्ञानिक आहार प्रणाली है।
कुलिश जी की दृष्टि बहुत पारदर्शी थी। उन्होंने दशकों पहले यह देख लिया था कि किस प्रकार शहरीकरण और पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ हमारे रसोईघरों को बीमार कर रही है। यांत्रिक भीड़ और भागदौड़ ने इत्मीनान से बनाए और खाए जाने वाले पारंपरिक भोजन की जगह डिब्बाबंद और कृत्रिम भोजन को दे दी है। उनका कहना था कि हमने गांव की जरूरत को नहीं समझा, उसकी जीवन दृष्टि को नहीं आंका और उस पर उधार ली गई विदेशी तकनीक लाद दी। नतीजा यह हुआ कि शुद्ध दूध-घी और ताजा अन्न से पुष्ट होने वाला ग्राम्य जीवन भी चौपट होने लगा।
भारतीय खान-पान को पचाने के लिए जिस शारीरिक श्रम की आवश्यकता थी,आधुनिक सुख-सुविधाओं ने उसे खत्म कर दिया। यही कारण है कि आज समाज नई-नई संक्रामक और जीवनशैली जनित बीमारियों का घर बनता जा रहा है।
कुलिश जी 'वेद विज्ञान' के मर्मज्ञ थे। वे भोजन को 'अन्नब्रह्म' मानते थे। वैदिक परंपरा में उदर पूर्ति को एक जैविक क्रिया नहीं, बल्कि एक यज्ञ (प्राणाग्निहोत्र) माना गया है। भोजन करते समय उस अन्न को उगाने वाले किसान (श्रमशक्ति), उसे सींचने वाले मेघों और धरती माता के प्रति कृतज्ञता का भाव ही भारतीय खान-पान को अन्य संस्कृतियों से अलग करता है। 'अति सर्वत्र वर्जयेत' के सिद्धांत के तहत, भारतीय थाली हमेशा संतुलित रही है-जिसमें छह रसों का वैज्ञानिक समावेश होता है।
श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्म शताब्दी के अवसर पर उनकी पुस्तक 'दृष्टिकोण' का अध्ययन और इन विचारों को समझना केवल अतीत का गौरवगान नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित करने का एक स्पष्ट मार्ग है। उनका लेखन हमें चेतावनी देता है कि अपनी जड़ों से कट कर और अपने पारंपरिक खान-पान को त्याग कर हम कभी एक स्वस्थ और सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते। आज जब पूरी दुनिया 'लोकल डाइट', 'ऑर्गेनिक फूड' और 'सस्टेनेबल लाइफस्टाइल' के नाम पर वापस प्रकृति की ओर लौट रही है, तब हमें यह गर्व के साथ याद रखना चाहिए कि दशकों पहले हमारे अपने
कुलिश जी ने इसी 'देसी दृष्टिकोण' को अपनाने का आह्वान किया था। उन्होंने हमें बताया कि भारतीय खान-पान कोई पुरानी रूढ़ि नहीं, बल्कि एक शाश्वत विज्ञान है। उनके इस जन्मशती वर्ष में उनके सात्विक विचारों को जीवन की थाली में उतारना ही उनके प्रति सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(यह आलेख श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)