पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार की नीति आज वैसी ही है, जैसी 55 बरस पहले कर्पूर चन्द्र कुलिश जी ने वकालत की थी।
भारत-पाकिस्तान का रगड़ा खत्म होने वाला नहीं लगता। खत्म होना होता तो हो चुका होता, क्योंकि दोनों देशों ने लड़ाइयां भी लड़ लीं और भारत ने शांति से विवाद निपटाने की भी अनेक कोशिशें कर लीं। हमारे प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर तक चले गए थे। लेकिन, पाकिस्तान ने ‘कारगिल’ किया और मुंबई को दहलाया। मतलब उसने साबित कर दिया कि शांति की भाषा तो उसे समझ आती ही नहीं। वह सख्ती ही समझता है। बल्कि, सख्ती पर भी बाज नहीं आता। भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद की उसकी हरकतें इस बात का सबसे ताजा उदाहरण हैं।
राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश भी पाकिस्तान के खिलाफ सख्त नीति अपनाने के ही पक्षधर रहे थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय उन्होंने जो संपादकीय लिखे, उन्हें पढ़ कर समझा जा सकता है कि पाकिस्तान से विवाद खत्म करने के लिए तब जो उनके विचार थे, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
कुलिश जी का साफ मानना था कि चाहे विदेश की जो भी ताकतें पाकिस्तान के साथ हो, भारत को उसके साथ कड़ाई से ही पेश आना चाहिए। उनका साफ मानना था कि पाकिस्तान को कोई दूसरा देश साथ देगा तो अपने स्वार्थ के चलते ही देगा। दूसरे देश अपने हितों की कीमत पर पाकिस्तान का साथ नहीं देंगे।
13 दिसंबर, 1971 को उन्होंने ‘कब्जा सच्चा, झगड़ा झूठा’ शीर्षक से संपादकीय में साफ लिखा, ‘हमारा काम तो सिर्फ यह है कि एक दिन का भी समय खोये बिना बांग्लादेश को पूरी तरह मुक्त करवाकर उसको जनता के हवाले कर देना है और शरणार्थियों की वापसी के लिए हालात पैदा करना है। उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा।’
पाकिस्तान आज भी ऐसी ही कड़ाई से काबू आता है। सच कहें तो इससे भी बेअसर ही रहता है। ओसामा बिन लादेन को उसने अपने यहां रखे रखा, अमेरिका को वहां घुस कर उसे खत्म करना पड़ा। भारत ने उसकी सीमा में घुस कर आतंकी ठिकानों पर हमला कर जवाब दिया, लेकिन उसने आतंक का कारोबार बंद नहीं किया।
भारत ने जब पाकिस्तान को धूल चटा कर उसकी सेना को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया और अलग बांग्लादेश बनाया तो कुलिश जी ने ‘राजस्थान पत्रिका’ (17.12.1971) में लिखा, ‘भारत में सांप्रदायिक विष के शमन और आधुनिक राष्ट्रीय चरित्र के गठन का एक नया युग शुरू होगा। अमेरिका और चीन के मुंह पर समूची शांतिप्रिय मानव जाति थूकेगी।’
वह पाकिस्तान के प्रति जिस रुख के समर्थक थे, आज भारत सरकार पाकिस्तान के प्रति वैसी ही नीति पर चल रही है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ इसी नीति का नतीजा था।
विदेशी मददगारों के दम पर कूदने वाले पाकिस्तान के लिए 1971 में कुलिश जी का जो संदेश था, वही आज भी लागू है। याह्या खान के घुटने टेक देने के बाद 18 दिसंबर, 1971 के ‘राजस्थान पत्रिका’ में कुलिश जी ने लिखा था,
‘शुक्र है खुदा का, आखिर पाकिस्तान ने युद्ध विराम का भारत का प्रस्ताव मान लिया और आज रात 8 बजे से सीमा पर तोपों की गर्जना बंद हो गई। ज. याह्या खां का नशा उतरा और जंग जारी रखने की कल की बात को भूल गए। काश! उनके आका अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को भी अक्ल आ जाती। वे शायद युद्ध विराम से भी बेचैन हैं। स्वाभाविक भी है। अब तक अमरीकी गिद्ध इंसान की लोथड़ों को ही नोंच-नोंच कर मुस्टंडे होते आए हैं। कहीं मौत का साज-बाज बजता है, तो उनकी बांछें खिलने लगती हैं और वे मरघट के आसपास मंडराने लगते हैं, जैसे कि सातवां बेड़ा बंगाल की खाड़ी की छाती रौंद रहा है। अमरीकियों को अभी तक यह अहसास नहीं हो रहा है कि इधर दिल्ली की ‘काली माई’ नरभक्षकों के मुण्ड मांग रही है और वह छोड़ने वाली नहीं है।’
(यह आलेख श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)