Karpoor Chand Kulish speech summary: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश जी ने 1993 में पत्रकारों को क्या सीख दी थी? जानें स्वाध्याय, सत्यनिष्ठा और मीडिया के 'शिल्प' पर कानों सुने उनके विचार।
Karpoorchandra kulish birth centenary: लिख कर वरक़े-दिल से मिटाने नहीं होते, कुछ लफ़्ज़ हैं ऐसे जो पुराने नहीं होते।
समय की रेत पर कुछ क़दमों के निशां ऐसे होते हैं जो हवा के तेज़ झोंकों से मिटते नहीं, बल्कि और गहरे होते जाते हैं।"भारतीय पत्रकारिता के शलाका पुरुष, राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश जी के विचार आज उसी श्रेणी में आते हैं। ये विचार कल भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं। मुझे याद है , यह 1993 की बात है, जोधपुर के एक कार्यक्रम में उनकी कही गई बातें आज 2026 के 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' और 'सोशल मीडिया' के दौर में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और चुनौती भरी महसूस होती हैं।
मार्च 1993 का वह महीना मुझे आज भी याद है, जब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ राजस्थान (जार) की जोधपुर इकाई ने यह निर्णय लिया कि गोवर्धन हेड़ाऊ स्मृति व्याख्यानमाला में कुलिश जी को आमंत्रित किया जाए। एक युवा पत्रकार के रूप में मेरे लिए यह किसी सपने से कम नहीं था। हम जिस शख़्सियत के बारे में केवल सुनते आए थे, जिनकी क़लम की धार और विचारों की गहराई के क़िस्से किसी किंवदंती की तरह लगते थे, वे हमारे बीच आने वाले थे।
10 अप्रेल 1993 का दिन। जोधपुर का टाउन हॉल खचाखच भरा था। हवा में एक अजीब सी गंभीरता और उत्सुकता थी। जब पत्रकारिता मनीषी कुलिश जी मंच पर आए, तो लगा कि हम केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पत्रकारिता के एक पूरे युग को सुन रहे हैं। उस दिन उन्होंने जो कहा, वह महज़ भाषण नहीं था; वह आने वाले समय की पत्रकारिता का 'ब्लूप्रिंट' था।
कुलिश जी ने उस दिन एक बहुत बारीक बात कही थी, जो आज के कॉरपोरेट मीडिया के लिए एक आईना है। उन्होंने कहा था, "काग़ज़, स्याही और मशीनें तो केवल अख़बार का शरीर (कलेवर) तैयार करती हैं, जिसमें 80-85 प्रतिशत खर्च हो जाता है। लेकिन अख़बार की 'आत्मा' या 'प्राण' तो पत्रकार की लेखनी है।"
आज जब हम मीडिया को देखते हैं, तो पाते हैं कि सारा जोर 'कलेवर' पर है। टीवी स्टूडियो की चमक-धमक, वेबसाइट का यूआई (UI), ग्राफ़िक्स और पैकेजिंग पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं। लेकिन क्या हम 'आत्मा' यानि कंटेंट की गुणवत्ता पर उतना ही निवेश कर रहे हैं? कुलिश जी ने चेतावनी दी थी कि अगर आत्मा पर ध्यान नहीं दिया गया, तो अख़बार (या आज का चैनल/वेबसाइट) निष्प्राण हो जाएगा। आज 'फेक न्यूज़' और सतही पत्रकारिता का जो संकट है, वह इसीलिए है क्योंकि आज पत्रकारों ने पत्रकारिता को 'शिल्प' या 'विद्या' मानना छोड़ कर उसे शुद्ध 'धंधा' बना लिया है। इसके उलट उन्होंने हमें सिखाया था कि पत्रकारिता एक 'शिल्प' है, जिसमें विद्या का भाव होना अनिवार्य है।
उस व्याख्यान का सबसे शक्तिशाली शब्द था-'स्वाध्याय'। कुलिश जी ने बार-बार चिंता जताई थी कि पत्रकारों में पढ़ने-लिखने की आदत छूट रही है। उन्होंने कहा था, "पत्रकार मानव जाति का दैनिक इतिहास लिखता है… ऐसा व्यक्ति अगर पढ़ने के प्रति उदासीन रहेगा तो वह समाज के साथ न्याय नहीं कर पाएगा।" आज की युवा पीढ़ी और सोशल मीडिया इन्फ़्लुएंसर्स के लिए यह सबसे बड़ी नसीहत है। आज सूचना का विस्फोट है, लेकिन ज्ञान का अकाल है। एक युवा पत्रकार आज किसी विषय पर ख़बर बनाने से पहले किताबें नहीं पढ़ता, वह 'गूगल' करता है। 'कट-कॉपी-पेस्ट' की संस्कृति ने मौलिक चिंतन को खत्म कर दिया है।
कुलिश जी का 'स्वाध्याय' से तात्पर्य केवल साक्षरता से नहीं था। उस कार्यक्रम के वाक्य याद हैं। वे चाहते थे कि पत्रकार 'बहुश्रुत' और 'बहुज्ञ' बने। यानि उसे इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र और राजनीति की गहरी समझ हो। आज जब कोई यूट्यूबर माइक लेकर सड़क पर निकलता है, तो अक्सर उसके पास संदर्भ की कमी होती है। यही कारण है कि ख़बरें अब 'गहराई'के बजाय 'सनसनी' पैदा कर रही हैं। कुलिश जी की वह सीख- कि पत्रकार को खुद को तपाना पड़ता है-आज के 'इंस्टेंट जर्नलिज्म' के दौर में एक मार्गदर्शक मशाल है। आज के पत्रकार को उनकी वह सीख आत्मसात करनी होगी।
कुलिश जी के भाषण का वह अंश आज भी मेरे कानों में आज भी गूंजता है: "हमें इतना समर्थ बनना चाहिए कि सुविधाओं के लिए सरकार की ओर न देखें।" यह वाक्य आज के दौर में 'दबा हुआ मीडिया' बनाम 'स्वतंत्र मीडिया' की बहस का उत्तर है। 1993 में भी प्रलोभन थे, आज भी हैं। लेकिन कुलिश जी का स्पष्ट मत था कि एक पत्रकार की लेखनी और बुद्धि में इतना सामर्थ्य होना चाहिए कि सुविधाएं खुद उसके पास आएं, न कि उसे सरकारी चौखट पर हाथ फैलाना पड़े।
आज जब सोशल मीडिया पर पत्रकारिता बंट गई है-कुछ सत्ता के पक्ष में हैं तो कुछ विरोध में-तब कुलिश जी का 'सत्य' का सिद्धांत याद आता है। उन्होंने कहा था, "सत्य की परिभाषा बस इतनी है कि जो आपके अंतःकरण को सही लगे, वही सत्य है।" आज पत्रकार अपने अंतःकरण की कम और 'एल्गोरिदम' की ज्यादा सुन रहा है। कौन सी ख़बर ट्रेंड करेगी, किससे व्यूज़ आएंगे-यही आज का 'सत्य' बन गया है। कुलिश जी की विचारधारा हमें याद दिलाती है कि विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन जब देश और समाज की बात आए, तो पत्रकार को किसी गुट या ख़ेमे का नहीं, बल्कि 'सत्य' का पक्षधर होना चाहिए।
कुलिश जी ने कहा था कि अगर पाठकों की रुचि का ध्यान नहीं रखा, तो अख़बार उनसे 'तादात्म्य' नहीं बना पाएगा। आज सोशल मीडिया पर 'एंगेजमेंट' ही सब कुछ है। लेकिन कुलिश जी का तादात्म्य 'क्लिकबेट' वाला नहीं था, वह 'संवेदना' वाला था। उन्होंने कहा था- "गांव के समाचार और वहां की समस्याएं हमारी पत्रकारिता का अभिन्न अंग बननी चाहिए।" आज डिजिटल मीडिया के कारण यह संभव हुआ है कि गांव की खबरें बाहर आ रही हैं, लेकिन क्या उन खबरों में वह संवेदना है जिसकी बात कुलिश जी करते थे? या वहां भी हम केवल वायरल वीडियो ढूंढ रहे हैं ?
उस कार्यक्रम के बाद जब अकिंचन को उनसे मिलवाया गया, तब वह क्षण नाचीज के लिए किसी दीक्षांत समारोह से कम नहीं था। एक युवा पत्रकार, जो अभी दुनिया को समझने की कोशिश ही कर रहा था, उसके सामने एक ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व खड़ा था, जो पत्रकारिता का विश्वविद्यालय था। शुरुआत में मुझे 'स्वाध्याय' शब्द थोड़ा भारी लगा था। लेकिन उनसे मिलने के बाद के दो-तीन दिन मैंने इसी शब्द के मर्म को समझने में बिताए। धीरे-धीरे समझ में आया कि स्वाध्याय का मतलब केवल पत्र पत्रिकाएं व किताबें पढ़ना नहीं, बल्कि खुद को रोज अपडेट करना, हर घटना के पीछे के 'क्यों' और 'कैसे' को समझना है।
उस दिन मिली सीख ने ख़ाकसार की पत्रकारिता की दिशा बदल दी। तब समझा कि बिना अध्ययन किए की गई पत्रकारिता वैसी ही है जैसे बिना नींव का मकान। आज, दशकों बाद, जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं, तो पाता हूं कि मेरी हर अच्छी स्टोरी, हर गहरा विश्लेषण उसी 'स्वाध्याय' की देन था।
युवाओं के लिए पाथेय आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं। माध्यम बदल गए हैं-अख़बार से हम मोबाइल स्क्रीन पर आ गए हैं। लेकिन पत्रकारिता के मूल सिद्धांत नहीं बदले। नए दौर के युवा पत्रकारों, ब्लॉगर्स और सोशल मीडिया रिपोर्टर्स को कुलिश जी की उस नसीहत को गांठ बांध लेना चाहिए:
ग्लैमर नहीं, तैयारी: माइक थामने से पहले विषय की गहरी समझ पैदा करें।
शिल्पकार बनें: अपनी भाषा, अपने तथ्यों और अपनी प्रस्तुति को एक शिल्पकार की तरह तराशें।
अंतःकरण की सुनें: व्यूज़ और लाइक्स के लिए अपनी अंतरात्मा से समझौता न करें।
कुलिश जी आज हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द और विचार आज भी टाउन हॉल की उन दीवारों से टकरा कर हमारी चेतना को झकझोर रहे हैं हर अग्रलेख, संपादकीय और किताबों में जीवित हैं और मानो कह रहे हों,- "अगर पढ़ने-लिखने के प्रति उदासीन रहोगे, तो समाज के साथ न्याय नहीं कर पाओगे।" यही वह मंत्र है जो पत्रकारिता को 'बिज़नेस' बनने से बचा सकता है और उसे पुनः एक पवित्र 'विद्या' के रूप में स्थापित कर सकता है।
(यह आलेख श्री कर्पूरचंद्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)