ओपिनियन

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख: दाता रहो, याचक क्यों!

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं-एक प्रकाशित, दूसरा छाया में। यही अर्द्धनारीश्वर का सिद्धान्त है। स्वयं सूर्य का नीचे का आधा भाग ही अमृत है। शेष आधा भाग मर्त्य कहलाता है। शरीर का भी ऊपरी भाग प्रकाशित, भीतर का भाग छाया में रहता है।
4 min read
• •
Oct 02, 2026
gulab kothari
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं-एक प्रकाशित, दूसरा छाया में। यही अर्द्धनारीश्वर का सिद्धान्त है। स्वयं सूर्य का नीचे का आधा भाग ही अमृत है। शेष आधा भाग मर्त्य कहलाता है। शरीर का भी ऊपरी भाग प्रकाशित, भीतर का भाग छाया में रहता है। प्रकृति का एक नियम और है। हमारे तीन शरीर कहे गए हैं-अव्यय, क्षर, अक्षर। इन्हीं को क्रमशः कारण, स्थूल और सूक्ष्म शरीर कहते हैं। स्थूल शरीर अन्न से बनता है, प्राण-शरीर सूक्ष्म है तथा कारण शरीर सुसूक्ष्म है। स्थूल शरीर को पशु कहा जाता है। यह पृथ्वी के पशु प्राणों से निर्मित होता है। प्राण शरीर दिव्य शरीर है। हृदय की प्रतिष्ठा है, आत्मा का आश्रय है। स्थूल और सूक्ष्म ही अपरा और परा प्रकृति रूप में जीवन का संचालन करते हैं।

अर्द्धनारीश्वर में भी यही सिद्धान्त काम करता है। हर पुरुष बाहर अग्नि, भीतर सोम है। हर स्त्री बाहर सोम, भीतर अग्नि है। अग्नि सत्य (आकृति) तथा सोम निराकार होता है। सोम की अग्नि में आहुति ही यज्ञ है। यज्ञ ही निर्माण की आधार भूमि है। सौम्या स्त्री आग्नेय पुरुष में आकर आहुत होती है। पुरुष के भीतर का सोम रूप शुक्र, स्त्री के रक्त (शोणित) में आहुत होकर प्रजा को उत्पन्न करता है। प्रजा उत्पन्न करने के लिए रजस्वला होना जहां स्त्री की अनिवार्यता है, वहां चन्द्रमा की सोलह कलाओं का भोग करना (16 वर्ष तक) पुरुष की आवश्यकता है। इसी के साथ दोनों में कामना जाग्रत होने लगती है। प्राचीनकाल में विवाह की आय का आधार यही था।

आज शिक्षा ने विवाह की परिभाषा बदल दी है, किन्तु शरीर की प्रकृति को नहीं बदल सकी। विवाह पूर्व की आज वही स्थिति है जो उम्र तय करती है। शिक्षा का प्रभाव यहां उन्मुक्तता या स्वच्छन्दता का हो गया। सम्बन्धों की परिभाषाएं बिखर गईं। विवाह की आवश्यकता और जिज्ञासा जीवन से बाहर हो गई। फिर भी शरीर का दबाव परिवार की परम्परा पर भारी पड़ने लग गया। इसके अपने कारण हैं।

शिक्षा ने लड़कियों का पौरुष भाव उन्नत किया। उनका स्त्रैण भाव कमजोर होता जाता है। साहस का एक नया रूप उभरकर आने लगा है। सम्बन्ध बनाना अब व्यक्तिगत क्षेत्र का अधिकार बनता जा रहा है। माता-पिता चाहें तो विवाह की व्यवस्था कर दें या छोड़ दें। बौद्धिक स्तर के बढ़ने से संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व बोध में उतार आया है। व्यक्तिगत सुविधा महत्वपूर्ण हो गई।

उधर भारतीय मानसिकता पुत्र-प्रधान ही बनी हुई है। उस पर कोई मर्यादा अथवा अंकुश लागू नहीं होता। वह तो हर हाल में 'हीरा' ही है। उसको मर्यादा-संस्कार सिखाने की भी कोई मानसिकता परिवारों में दिखाई नहीं देती। अतः उसके भीतर का स्त्रैण भाग कच्चा ही रह जाता है।

…और लाठी भी नहीं टूटे

वह स्त्री के गुणों से पूरी तरह ओत-प्रोत ही नहीं हो पाता। वह केवल पौरुषीय उष्णता और आक्रामकता से ही परिचित होता है। आज समाज का नया स्वरूप ऐसा ही बनता जा रहा है। ब्लड़का शरीर प्रधान जीवन पर आकर ठहरने लगा है। उसे भीतर का बोध ही नहीं है। उसे यह एक और सुविधा भी प्राप्त है कि विवाह के बाद घर नहीं छोड़ना है। जबकि स्त्री को नहीं मालूम कि उसे किस परिवार में और किस शहर में रहना पड़ेगा। वह अपनी प्राकृतिक विभूतियों के आधार पर अन्तर्ज्ञान, परोक्षभाव, बहुत कार्य एक साथ करने की शक्ति, भविष्य पर आंख, निर्माण, पोषण करने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु को संस्कार देना आदि से स्वयं पुरुष की शक्तिरूपा बनी हुई है। शिक्षा ने उसका स्त्रैण छीनकर उसे 'शक्ति' मांगने वाला बना दिया। जबकि वह पुरुष की निर्मात्री है। आज पुरुष के विरुद्ध ही बिगुल बजा रही है। पुरुष के मुकाबले कई गुणा शक्ति सामर्थ्य रखने के बाद अबला हो गई। क्योंकि शिक्षा ने उसकी ईश्वरीय शक्तियों को विस्मृत कर दिया। उसने पुरुष को सन्तान रूप में संस्कारित करना छोड़ दिया। वह भी स्वच्छन्द जीने को उतावली है। शब्द ब्रह्म और अर्थ ब्रह्म (अन्न ब्रह्म) दोनों हथियार नीचे डाल दिए। जैसे अर्जुन ने धनुष गिरा दिया था, कुरुक्षेत्र में। महिला का जीवन भी महाभारत है। उसे पलायन नहीं करना चाहिए। वरना, मार पूरी उम्र उसको ही खानी पड़ेगी।

अभी तक भारत में स्त्री का सम्मान सुरक्षित है। 'सम्मान' एक नाजुक स्थिति है, कीमत मांगती है। पाने के लिए खोना भी पड़ता है। पिछले दिनों में जो आग सड़कों पर शुरू हुई है, उससे खेलना भारी पड़ जाएगा। पश्चिम आज भी इसके दंश भोग रहा है। पुरुषों के दिलों में स्त्रियों के प्रति एक असहनीय प्रतिक्रिया का वातावरण तैयार होता दिखता है। वह बिना शादी किए ही स्त्री सुख को भोगना चाहता है। सुविधानुसार बदल देना चाहता है। परिवार तो वह बसाना ही नहीं चाहता। परिस्थिति विस्फोटक हो उसके पहले ही हमें आवश्यक कदम उठाने चाहिए। काम ऐसा हो कि सांप मरे और लाठी भी नहीं टूटे। आज बड़े घरों में मां-बाप बच्चों के संस्कारों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। जिस प्रकार हम अपने घर का वातावरण देखना चाहते हैं, उसमें किन कारणों से कमी रह जाती है। पुत्र और बहू के व्यवहार में हमें निष्पक्षता रखनी पड़ेगी। हमें नजर आ जाएगा कि लड़के के संस्कारों में कमी रह गई है। नए सिरे से संवाद शुरू करने पड़ेंगे। महिला का सम्मान जीवन एवं राष्ट्रीय संस्कृति की अनिवार्यता है। मूल में तो यह संस्कार गर्भकाल में ही दिए जाते हैं।

बेटियों के विकास में भी यदि करुणा-वात्सल्य-सेवा जैसे गुण छूट रहे हों, पुरुष की तरह आक्रामक होने लगी हो, दूसरों का ध्यान न रखती हो, तो मां का दायित्व है कि उसे स्त्रियोचित ज्ञान दे। प्रसव-शिशु की प्रारम्भिक देख-रेख, गर्भस्थ अवस्था में संस्कार देने की अनिवार्यता उसे समझाए। वह खूब पढ़े, आगे बढ़े, किन्तु अच्छे भारतीय स्त्रैण गुणों के साथ। तभी देश को अच्छे नागरिक मिलेंगे। देश का गौरव बढ़ेगा। सन्तान समाज की सम्पत्ति है। मां-बाप की नहीं। पेड़ अपने फल नहीं खाता।

gulabkothari@epatrika.com