
आज यदि सोशल मीडिया का आकलन करें तो देश में अनुशासनहीनता, बिखराव, सत्ता का अहंकार, भ्रष्टाचार, नशा और अपराधों का बोलबाला दिखाई पड़ेगा। अहिंसा, शांति और संवेदनशीलता का भारत दिखाई नहीं देता। मीडिया 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की रट लगाते-लगाते अपने ऊपर कई तमगे लगा बैठा। सरकारी भाषा बोलने वाले भी मौन हो गए। अभिव्यक्ति का संकट दिखाई देने लगा है-चहुंओर। संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा बर्फ की तरह पिघलने लगा है। अनीति-अन्याय-अराजकता और सामान्य औपचारिकताओं तक का अभाव, शिक्षा-स्वास्थ्य- पुलिस जैसे विभागों पर आक्षेप भी अपना अर्थ खो बैठे। शासन-प्रशासन आंखें मूंद कर बैठ गए लगते हैं। न्यायपालिका का डर अब रहा ही नहीं। जनमानस की आवाज कुंद है।
राजनीति झूठ और मुखौटों तथा बदजुबानी का पर्याय बन गई है। मीडिया का साहस टूटने की चर्चा भी है, किन्तु लगता है उसका रूपांतरण हो गया है। अब वह राष्ट्रीय उद्योग नहीं रह गया है। राष्ट्रीय स्तर का व्यापारी हो गया है। सरकार का हिस्सा बन बैठा है। खुद को सेतु नहीं चौथा स्तंभ कहने लगा। स्वयं मीडिया ने घोषणा कर दी कि वह पत्रकारिता का दंभ नहीं भरेगा। सरकार का अंग होगा। सरकार के भ्रष्टाचार को खोलकर झगड़ा मोल नहीं लेगा। बल्कि इसको छिपाकर पेट भरेगा। यानी कि जब जीत नहीं सको तो उनसे मिल जाओ।
आपातकाल एक समय था जब मीडिया पर सरकार ने तोपें चलाई थीं। दो ही अखबार चर्चा में रह पाए थे। एक था इंडियन एक्सप्रेस (अंग्रेजी) और दूसरा था राजस्थान पत्रिका (हिन्दी) जिसकी पाठक-संख्या बहुत बढ़ी थी। सत्य को बनाए रखना साहस का कार्य था। जुनून के तेल से ही सत्य की मशाल जलती है। श्रद्धेय पिताजी कहते थे कि क्या लेकर आया था जो चला जाएगा। जिस निष्पक्षता के लिए अखबार शुरू किया था, वह तो कण-कण में दिखाई देनी चाहिए। व्यक्ति स्वयं से झूठ बोलकर शांत नहीं रह सकता।
पत्रिका को राजस्थान में जब 'काला कानून' के लिए राज्य सरकार से लड़ना पड़ा तो उसके पीछे सत्य को थामे रखने का जुनून ही था। राजस्थान और मध्यप्रदेश की सरकारों को भ्रष्टाचार को संरक्षित करने वाले कानून रद्द करने पड़े।
सत्ता एक नशा है। जहां विवेक पिछली सीट पर बैठा रहता है। अहंकार हावी रहता है। इसमें सूर्य की तेजी रहती है। सत्ता का काल अंतहीन नजर आता है। पूरी उम्र सत्ता को बनाए रखने के प्रयास में सत्ता की दिव्यता को आसुरी जामा पहना दिया जाता है। तब लंका में सब बावन गज के।
आज जो दृश्य देशभर में दिखने लगा है वह अनायास तो नहीं हुआ। पिछले बरसों में लोकतंत्र के तीनों पाये जनता से दूर ही नहीं बल्कि विरोधी नजर आने लगे। कार्यपालिका तो कभी जनता की हुई ही नहीं। ऊपर से पुलिस की भागीदारी ने हर क्षेत्र में माफिया खड़े कर दिए। न्यायपालिका आज तो कार्यपालिका के साथ संवेदनहीन होती जा रही है। न तो पहले जैसे जनहित के मुद्दों पर स्वप्रेरणा बची और न अपने फैसलों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी। अधिकारी सरकार पर भी, और न्यायपालिका पर भी भारी पड़ते जा रहे हैं। दोनों ही पाये 'नख-दंत विहीन सिंह' प्रमाणित हो रहे हैं।
सबसे अनूठा मामला जयपुर के रामगढ़ बांध का है। मुख्यमंत्री ने समारोह में घोषणा की बांध को भरवाने की। स्वयं उच्च न्यायालय ने अतिक्रमण हटाने के लिए कई आदेश पारित किए। रामगढ़ का सूखा पैदा लोकतंत्र के दोनों पायों को मुंह चिढ़ा रहा है। सरकार की लाचारी और अफसरों के आगे समर्पण की अभिव्यक्ति के लिए शब्दकोश में उचित शब्द नहीं रह गया है। ईश्वर की कृपा का बोध ही सुप्त हो गया। उधर, देश में भी कई तरह का शोर सरकारों के विरुद्ध उठने लगा है। इन्दौर में दूषित जल से 35 जनों की मौत, एसआइआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यों का मुद्दा, नशा मुक्ति आंदोलन, गुजरात-बिहार का मद्य निषेध कानून, परिसीमन का मुद्दा, लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव जैसे मुद्दे चर्चाओं में इसलिए बने हुए हैं कि सरकारें मौन हैं। मध्यप्रदेश में दो दशक से बंद पड़ी सरकारी परिवहन सेवा भी पत्रिका के लम्बे अभियान के बाद जाकर शुरू हो पाई।
पहली बार देश के मुख्य न्यायाधीश के बयान विवाद का विषय बन गए। नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दे चर्चा से नहीं गए। राजस्थान में स्थानीय निकायों के चुनाव पूर्व यह अनुमान हो चुका था कि कांग्रेस बराबर की टक्कर पर है। जीत तो सत्तारूढ़ दल की होनी ही थी। भाजपा को लेशमात्र चिंता नहीं हुई कि उनकी स्थिति कमजोर हो गई। देखें-पंचायत चुनाव में क्या होता है! कारण एक ही है, नीतियों का क्रियान्वयन। सरकार बड़े अफसरों से डरती है। भले ही दुबारा नहीं जीते।
राजनीति और भ्रष्टाचार का गठजोड़ आज भी भ्रष्टाचार को वैसे ही हवा दे रहा है जैसे कांग्रेस शासन में देता था। अधिकतर जनप्रतिनिधि या तो आपराधिक प्रवृत्ति के हैं, अथवा बड़े घरानों के दलाल हैं। उनको जनता के दुःख-दर्द से कोई वास्ता नहीं रह गया। आज संसद में भी जिस अशोभनीय भाषा को बोलबाला है, जिस प्रकार से वरिष्ठजनों के प्रति शिष्टाचार तार-तार हो रहा है, वह भारतीय संस्कृति के ललाट पर काला टीका है।
संसद में, विधानसभाओं में सदस्यों के प्रश्नों का समय पर उत्तर ना मिलना संवेदनहीनता की बात है। विभिन्न जांच एजेंसियों की रिपोर्ट-प्रमाणों के बाद भी सरकारों का अभियोजन की स्वीकृति न देना भी 'काला कानून' के समान लोकतंत्र का अपमान ही है। अधिकारियों का निरंकुश व भ्रष्ट होने का यही एक कारण अभय है। आज के अधिकांश जनप्रतिनिधि तो किसी न किसी के संसाधन ही दिखाई पड़ते हैं। उनकी स्वयं की भी जनता में कोई व्यक्तिगत छवि नहीं रह गई है। बिकाऊ बन कर रह गए।
कांग्रेस ने मोदी-मोदी के नारे लगाकर जिस प्रकार नरेन्द्र मोदी को चढ़ाया, ठीक वैसे ही भाजपा ने भी पप्पू-पप्पू कहकर राहुल को राहुल गांधी बना दिया। अब जनता का तीसरा नेत्र भी खुल गया जेन-जेड। इसी की संतान है जेन-अल्फा। आज जनआंदोलन ने जो वातावरण पैदा कर दिया उसमें जबरदस्त शक्ति, जनसमर्थन की जुड़ती दिखाई पड़ती है। एसआइआर और मुख्य चुनाव आयुक्त का मुद्दा तो लगता है लोकसभा की छवि से भी टकरा सकता है। आपातकाल के विपरीत आज सत्ता पक्ष मौन है और विपक्ष मुखर है।
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