
पंचपर्वा विश्व में पृथ्वी-चन्द्रमा-सूर्य ये तीन पर्व दिखाई पड़ते हैं। चौथा तत्व अव्यक्त है। इन चारों से ही विश्व का निर्माण होता है- तीन भाव व्यक्त, एक भाव अव्यक्त। चारों तत्वों से ही मानव का स्वरूप निर्माण हुआ है। तीन व्यक्त पर्वों से क्रमश: शरीर-मन-बुद्धि का भाग प्राप्त होता है। अव्यक्त के अंश से आत्मा आता है। यही प्राणात्मक आत्मा 'मनु’ कहलाता है। चारों की समन्वित अवस्था का नाम 'मानव’ है।
गीता के अनुसार 'यो बुद्धे: परतस्तु स:’ - (3/42) मानवता का एकमात्र आधार एकमात्र अव्यय पुरुषात्मा ही है। जब तक उस आत्मभाव से आप अपने जीवभाव को समन्वित नहीं कर लेते अर्थात् शरीर-मन-बुद्धि तीनों तत्व आत्मभाव से समन्वित नहीं हो जाते, आपको मानव तो नहीं कहा जा सकता। आत्मस्वरूप अभिव्यक्ति ही एकमात्र मानवता का मापदण्ड है, मानवता का मूल बीज है।
मानव योनि आत्मा के स्तर पर कार्य करने में समर्थ है। अव्यय मन-अव्यक्त में ही ब्रह्म और माया का मूल स्थान है। क्षर सृष्टि - स्थूल शरीर का सीधा कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता। अत: शरीर-मन-बुद्धि प्रधान प्राणी अव्यक्त में गति नहीं पाते। मानव ही सृष्टि की मूल संरचना में परिवर्तन लाने में समर्थ होता है। मानव योनि में नर-नारी दोनों ही आते हैं। अत: दोनों में ही शरीर-मन-बुद्धि और आत्मा चारों पर्व हैं। इस दृष्टि से दोनों का ही स्वरूप समान है, किंतु सूर्य और चन्द्रमा के संवत्सर के आधार पर दोनों की इस समानता में विभिन्नता भी रहती है। शरीर की दृष्टि से मानव अग्निप्रधान और मानवी सोमप्रधान है, जबकि शुक्र और शोणित की दृष्टि से मानव सोमप्रधान व मानवी अग्निप्रधान है। आग्नेय मानव में बुद्धि की तथा सौम्या नारी में मन की प्रधानता होती है। सौर और चान्द्र संवत्सर स्वरूप मानव-मानवी की समन्वित अवस्था से यह संवत्सर पूर्णता को प्राप्त होता है। यही भारतीय दाम्पत्य जीवन की मौलिक परिभाषा है। परस्पर पूरक भाव ही इस संबंध का मूल आधार बनता है।
द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति शुष्कं चेवाद्र्रं च।
यच्छुष्कं तदाग्नेयं, यदाद्र्रं तत् सौम्यम्। (शत. १.६.३.२३)
सृष्टि में मानव को ब्रह्म का तथा मानवी को कर्म का पर्याय कहा गया है। माया कर्म का पर्याय होने से उसे ही यह सुविधा प्राप्त है कि ब्रह्म को नई योनियों में प्रवेश करा सके। ब्रह्म के कर्मों को पूर्व नियोजित सृष्टिक्रम में आगे बढ़ा सके। कर्म के कई रूप हैं। शरीर ही कर्म का माध्यम है। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् कहा गया है। हमारे मन, बुद्धि और आत्मा की अभिव्यक्ति शरीर के माध्यम से ही होती है। शरीर के कर्म को श्रम कहते हैं, प्राणों के कर्म को तप कहते हैं। बुद्धि के कर्म से शिल्प बनता है। मन कलाओं का आश्रय है। मन जब कर्म से जुड़ता है तब सारा श्रम कला रूप में परिवर्तित हो जाता है। बिना मनोयोग के कला पैदा ही नहीं होती। मन की एकाग्रता कर्म को पूजा अथवा ध्यान का रूप प्रदान कर देती है। कला स्वयं ईश्वर का गुण है। आत्मा को षोडशकल कहा है। अत: कला आत्मा को मन और इन्द्रियों सहित ब्रह्म की ओर मोड़ती जान पड़ती है। कलाकार अपनी कला में सदा लीन ही दिखाई देता है। यही भक्ति का स्वरूप है। मूल में सिद्धान्त यही है कि कर्म ही बान्धता है, कर्म ही बान्धा जाता है और कर्म की ही कर्मान्तर से ग्रन्थि पड़ती है। कर्म और ग्रन्थि दोनों मरणशील हैं। जैसे वेगवान् वायु जल में (बुद्बुद रूप) पूरी तरह बान्ध दिया जाता है, फेन रूप भासित होता है, उसी तरह ब्रह्म में कर्म का बन्धन ही विश्व रूप है। बाहर कर्म है, भीतर ब्रह्म है।
माया एक अद्भुत तत्त्व है। है भी है और नहीं भी है। ऊर्जा है, जिसकी कोई आकृति होती नहीं है। ब्रह्म की कामना है। सृष्टि में ब्रह्म अव्यय, अक्षर, व क्षर भेद से त्रिविध रूपों में विद्यमान रहता है। इस दृष्टि से कामना को इच्छा का पर्याय नहीं माना जा सकता। यहां कामना शुद्ध भाव है अत: अव्यय मन में ही कामना उठती है। ईश्वरीय भाव से जुड़ी यह कामना सत्व गुण से युक्त स्थिर प्रज्ञावान मन की सहज प्राकृतिक इच्छा है। यह इच्छा अपने आप उठती है। अत: इसे उत्थिताकांक्षा (ईश्वरीय कामना) कहा जाता है। जबकि इच्छा मूलत: जीव से जुड़ी रहती है। इसी कारण इस इच्छा तंत्र को अक्षर प्रधान कहा जाता है। विचिकित्सा (विपरीत भाव की इच्छा) तंत्र क्षरप्रधान है। रज और तम गुणों से युक्त अस्थिर प्रज्ञान युक्त मन की वैकारिक इच्छा उत्थाप्याकांक्षा (जीव की इच्छा) है। जो लालसा, एषणा, लिप्सा आदि भावों से जुड़ी होती है, अत: इच्छा के दो भेद हैं—कामना और वासना।
कामना की भी कोई आकृति नहीं होती। ऋत भाव में केन्द्र या मन होता ही नहीं है। मन के अभाव में कामना कैसी? कामना को मन का बीज कहा है—कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेत: प्रथमं यदासीत। (ऋ. १०.१२९.४) सृष्टि की शुरुआत कामना-बीज से ही होती है। कामना का आधार स्वयं का प्रसार-ब्रह्म रूप में-सृष्टि रूप में। कर्म का आरंभ भी कामना ही है। ब्रह्म के मन की कामना पूर्ति माया करती है। अधिकारी-तत्त्व है। ब्रह्म तो अमृतलोक का स्थायी भाव है। ब्रह्म का विवर्त यानी अस्थायी भाव, जो बनता जाए और मिटता भी जाए अर्थात् जहां मृत्यु भी हो। हर सृष्टि में सारे तत्व उपलब्ध भी रहे और मृत्यु के साथ नष्ट भी नहीं होने चाहिए। प्रत्येक सृष्टि में ब्रह्म केन्द्र में ही रहे। माया आकृति दे। परा प्रकृति और अपरा प्रकृति इस कार्य में निमित्त और उपादान कारण बने रहें। ये दोनों सूक्ष्म और स्थूल शरीर का निर्माण करें।
माया व्यष्टि भाव में भी कार्य करती है एवं समष्टि भाव में भी समान भाव में कार्य करती है। सच तो यह है कि चारों युगों के आरंभ में माया चारों युगों के कर्म-फल एवं अवधि निश्चित कर देती है। सृष्टि उसी अनुरूप आगे बढ़ती है। सृष्टि क्रम में कुछ परिवर्तन मनुष्य योनि की जीवेच्छा और तदनुरूप फलों से आता है। जीवात्मा अक्षर रूप-हृदय के साथ रहता है। कर्म स्थूल शरीर तथा ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से करता है। एक ओर पुराने कर्मों का क्षय होता है, तो दूसरी ओर नए कर्मों के बन्धन तैयार होकर कारण शरीर में संचित होते रहते हैं। जब तक ये दोनों क्रम चलते रहते हैं, तब तक विश्व भी बना रहता है। कर्म के फल भोगने के लिए जीव चौरासी लाख योनियों में विचरण करता रहता है।
पुरुष में कर्ता भाव नहीं होता। उसके मन में कामना मात्र उठती रहती है। कामना में कर्म नहीं होता। ब्रह्मांश ही बीज रूप केन्द्र में रहता है - अहंकृति रूप में। चन्द्रमा से त्रिगुणात्मक प्रकृति बनती है और पंच महाभूतात्मक पृथ्वी से विभिन्न आकृतियां बनती हैं। चूंकि मनु तत्व (केन्द्रस्थ सत्य) का नाम ही मानव कहलाया, अत: सभी पदार्थ इस मनु तत्व की ही सन्तति कहलाए। मानव के इतर (अन्य) जड़-चेतन पदार्थों में क्योंकि यह मनु तत्व स्वतन्त्र केन्द्र रूप में प्रतिष्ठित अर्क रूप में या अशनाया- रश्मि भाव में प्रतिष्ठित रहती है, अत: वे मनु से साक्षात रूप से उपकृत नहीं हैं। पुरुष में मनु स्वतंत्र उक्थ रूप में प्रतिष्ठित है। यही मानव की परिपूर्णता या सर्वश्रेष्ठता है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com