ओपिनियन

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – कमर कस लें

पत्येक जीव एक ईश्वरीय अवतार है। वह एक निश्चित लक्ष्य, निश्चित स्वरूप लेकर जन्म लेता है। उसी रूप में, उसी कर्म को पूर्ण करना जीवन की सार्थकता है।

4 min read
Feb 05, 2026
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी

पत्येक जीव एक ईश्वरीय अवतार है। वह एक निश्चित लक्ष्य, निश्चित स्वरूप लेकर जन्म लेता है। उसी रूप में, उसी कर्म को पूर्ण करना जीवन की सार्थकता है। जब वह ईश्वरीय इच्छा से कर्म करता है, तब वह प्रयास करता है और कर्म हो जाता है। जब वह स्वयं की इच्छा से कर्म करता है तो बहुत जूझना पड़ता है। बुद्धि उसे अनेक तर्कों से विचलित करती है। मन का संकल्प यदि प्रकृति के संदर्भ में हो, जीवन यदि सृष्टि के लिए पाया मानकर-कर्म हो तो व्यक्ति क्या नहीं कर सकता! इस दृष्टि से कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। मन में कुछ देने की, समाज को लौटाने की, ऋण मुक्ति की कामना हो, बीज बनकर वृक्ष बन जाने का संकल्प हो, तभी तो स्वच्छ-सर्वजनहिताय-समाज का निर्माण हो सकता है।

आज शिक्षा ने हमको जहां बुद्धिमान बना दिया, वहीं स्वयं को सुविधापूर्ण जीवन-भौतिक सुखों के लिए आतुर बना दिया। अपने फल हम स्वयं ही खाना चाहते हैं-भले ही पेड़ न बनें। यही कारण है कि राजनीति में स्वच्छ छवि और अच्छी मंशा तो चुनाव में सफल होते ही भ्रष्ट होने लगती है। सारे वादे छू-मंतर! व्यक्ति इतनी तेज गति से बदलता है कि अल्पकाल में ही वह जनता से पल्ला झाडक़र पार्टी का हो जाता है। दो चुनाव बाद तो वह पार्टी की भी नहीं सुनता। राजस्थान तो साक्षी है, ऐसे उदाहरणों का। स्वयं के लिए कार्य करता है। समय के साथ बहुत से नेता पार्टी को अपनी विरासत मानने लगते हैं अथवा स्वयं पार्टी का पर्याय बन बैठते हैं। कुछ नेता तो स्वयं को पार्टी से ऊपर समझने लगते हैं। अपनी पार्टी के निर्णयों को ही नकारने लगते हैं। इतिहास में ऐसे बहुत से उदाहरण अंकित हैं जिन्हें आने वाली पीढिय़ां पढ़ा करेंगी। इनके अहंकार ने ईश्वर के आशीर्वाद को धूल में मिला दिया। पुण्य को खर्च करना भी सहज नहीं होता।

ये भी पढ़ें

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – कांग्रेस की ऑक्सीजन

देश की जन समस्याएं ज्यों की त्यों खड़ी हैं। इससे बड़ी दुर्दशा €या होगी कि लोगों को पीने का शुद्ध जल नहीं पहुंचा पाए। बल्कि दूषित जल से सरताज बनकर गौरवान्वित होते हैं। ऐसे वातावरण में राजस्थान पत्रिका एक ‘दीया’ बनकर, पिछले कुछ दशकों से, जन सरोकार के कार्यों में लगा हुआ है। हमारे संस्थापक पिताश्री-श्रद्धेय कर्पूरचंद्र कुलिश ने हमें पत्रकारिता के कुछ सूत्र दिए थे जो आज हमारे ‘प्रकाश स्त्भ’ बने हुए हैं। समाज हमारे अस्तित्व का आधार है। हमें भी सदा समाज को कुछ लौटाते रहना चाहिए। पत्रकार, एक संत की भांति, देने के लिए ही जीता है। लोकतंत्र का प्रहरी होने के नाते इसके विकास में भी सदा भागीदार रहना है। देश की संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है, ताकि वह माटी से जुड़ी रहे। सभ्यता और बुद्धिवि कास भ्रमित करने वाले तत्व हैं। ‘नारी स्मान’ ही नई संस्कृति की नींव का आधार है।

यह सारे विषय युग परिवर्तन के आधार हैं। लोकतंत्र का ढांचा आज भ्रष्टाचार की गोद में बैठ गया है। इसके फल इसकी जड़ें सींचने वाले तक नहीं पहुंच पाते। मार्ग में असुरों की बस्ती भी पड़ती है। तब लगता है कि सरकार के बाहर बैठकर भी बदलाव का वाहक €यों नहीं बनना चाहिए! पत्रिका के जन सरोकार पाठक की आत्मा को जाग्रत रखते हैं और पत्रकारिता सामाजिक जीवन की शुचिता के लिए संघर्ष करती है। पाठक स्वयं साक्षी रहे हैं-काला कानून, रामगढ़ बांध, मास्टर प्लान, कन्या भ्रूण-हत्या विरोधी अभियान, नशा मुक्ति, हरयाळो राजस्थान, अमृतं जलम्, एक मुट्ठी अनाज, आतिशबाजों का पुनरुद्धार, जल महल, सलवा जुडुम, चुनावों में जागो जनमत, शपथ-पत्र, रूबरू, मतदान विवेक के अभियान जैसे कार्यक्रमों के लिए जन-गण-मन यात्राएं आयोजित कर लोकतंत्र के प्रति जागरूकता बढ़ाने के अभियानों के। तीनों हिन्दी प्रदेशों में चुनावों में मतदान का प्रतिशत बढ़ा। निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2014 व 2024 में राष्ट्रीय मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया था।

भारतीय संस्कृति-साहित्य के प्रचार से नई पीढ़ी को जोड़ते रहे। संवाद सेतु, दिशाबोध, स्त्री: देह से आगे जैसे कार्यक्रम, साहित्य के पुरस्कार पाठकों को देश की जड़ों से जोडऩे का ही क्रम तो है। लोकतंत्र में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ अच्छे लोगों की भागीदारी बढ़ाना भी आज की आवश्यकता है। इसके लिए पत्रिका के चेंजमेकर, जनप्रहरी जैसे अभियान काफी सफल कहे जा सकते हैं। जागोजनमत, जनादेश यात्रा, जन-गण-मन यात्राएं इसी प्रयास की कड़ी रहे हैं।

जनता का सबसे नजदीक पायदान है पंचायत और नगर निकाय। इनका कार्यक्षेत्र गांव और मोहल्ला क्षेत्र तक फैला होता है। जनता के अधिकांश रोजाना के काम-काज इसी स्तर के होते हैं। इनके चुनाव भी आने को हैं। इनमें भी विश्वासपात्र, ईमानदार, कर्मयोगी पहुंच सकें, अच्छी छवि-अच्छी मंशा के लोग जुड़ सकें, जिनकी कथनी-करनी एक हो। ऐसे लोगों के लिए पुन: पत्रिका का जनप्रहरी कार्यक्रम शुरू होने जा रहा है। चयन और भर्ती प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं। जो लोग जनहित में ईमानदारी से जुडऩा चाहते हैं, वे तैयारी कर लें। पंचायतों में वह जन-सरपंच तथा निकायों में जन-पार्षद कहलाएंगे। अच्छे कार्य करने का स्तर भी यही है। चयन प्रक्रिया के बाद प्रशिक्षण होगा, विश्वास जीतने की शिक्षा, चुनावी रणनीति तथा सोशल मीडिया के सकारात्मक उपयोग की शिक्षा विशेषज्ञों की ओर से दी जाएगी। बस जनता की सक्रियता चाहिए। पत्रिका 5 फरवरी से अभियान-2026 शुरू करने जा रही है। ‘अच्छे लोगों को सक्रिय करने का हमारा एक प्रयास है।’

योग्य-मेहनती-जन केन्द्रित राजनीति-संवेदनशीलता केके धनी आवेदन के लिए कमर कस लें। आगे सहायता और मार्गदर्शन पत्रिका का रहेगा।। हां, आयु 21 वर्ष से अधिक होना अनिवार्य है। उसी राज्य का मतदाता भी होना चाहिए। अच्छी छवि तथा सामाजिक कार्यों से जुड़ाव, समाज में परिवर्तन लाने की उत्कण्ठा उत्तम रहेगी। कोई जातिवर्ण का भेद नहीं रहेगा। राजस्थान पत्रिका की साख आपके साथ जुड़कर देख लेना €या गुल खिलाती है।

ये भी पढ़ें

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख – मनमानी की उड़ानें

Published on:
05 Feb 2026 11:38 am
Also Read
View All

अगली खबर