Karpoor Chandra Kulish birth centenary: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूरचंद्र कुलिश का जीवन एक निरंतर बहती नदी की तरह था। निडरता, सच्चाई और कड़े संघर्ष के बल पर उन्होंने पत्रकारिता में जो मुकाम हासिल किया, जानिए उनकी वह अनसुनी और प्रेरक कहानी।
Karpoor Chandra Kulish birth centenary: पत्रकारिता के पुरोधा कर्पूरचंद्र कुलिश जी का जीवन एक नदी की तरह था। नदी हमेशा बहती रहती है। वह रास्ते की रुकावटों से नहीं डरती। कुलिश जी भी ऐसे ही थे। उनका जीवन भी हमेशा आगे बढ़ता रहा। उन्होंने अपनी जीवनी का नाम 'धाराप्रवाह' रखा था। इसका मतलब ही है, बिना रुके बहना। यह लेख उनके उसी धाराप्रवाह जीवन की कहानी है। उनका जन्म 20 मार्च 1926 को सोडा गांव में हुआ था। गांव के लोग उन्हें बहुत प्यार करते थे। सब उन्हें प्यार से 'कोका' बुलाते थे। बचपन में कुलिश जी बहुत निडर थे। एक बार गांव में 'भरभरी माई' नाम की एक महिला आई। लोग उसे डायन मानते थे और उससे डरते थे। लेकिन कुलिश जी के पिता ने छोटे कुलिश को उसके हाथों में दे दिया। उसने बड़े प्यार से बच्चे को खिलाया और कुछ बुरा नहीं हुआ। इस तरह अंधविश्वास को न मानने की उन्हें बचपन में ही सीख मिल गई।
कुलिश जी को बचपन से ही चीजों को ध्यान से देखने की आदत थी। गांव में एक तेली था। वह घाणी से तेल निकालता था। बैल गोल-गोल घूमता था। छोटा कुलिश वहां बैठकर घंटों इस काम को देखता रहता था। उन्हें यह सब किसी फिल्म जैसा लगता था। बचपन में वह बहुत साफ बात करते थे। मन में जो आता, वह बोल देते थे। एक बार गांव के ठाकुर गोपालकरणजी उनके घर आए। कुलिश जी ने उन्हें देखा। ठाकुर जी के दांत बहुत बड़े थे। कुलिश जी ने हंसते हुए कह दिया, "कितने बड़े-बड़े दांत हैं!"। सब लोग डर गए। लेकिन ठाकुर जी बहुत अच्छे थे। उन्होंने बुरा नहीं माना।
बचपन में उन्हें दीपावली और मकर संक्रांति का बहुत इंतज़ार रहता था। दीपावली पर वे मिट्टी की 'हीड़' जलाकर पूरे गांव में घूमते थे। मकर संक्रांति पर 'दड़ी-घोटा' नाम का खेल खेला जाता था। यह खेल हॉकी की तरह होता था। कुलिश जी को यह खेल बहुत पसंद था। बचपन में वे खेतों में काम करने वालों के लिए रोटी लेकर जाते थे। रास्ते में ताजा सब्जियां तोड़ कर खाते थे।
पढ़ाई के लिए कुलिश जी को मालपुरा भेजा गया। वहां वे अपने मामा के घर रहे। मामा और मामी ने उन्हें बहुत प्यार दिया। वहां से वे आगे की पढ़ाई के लिए जयपुर आए। जयपुर में वे अपनी बुआ के घर रुके।
जयपुर में उनके साथ एक बड़ी घटना हुई। रास्ते में एक आदमी मीठी-मीठी शकरकंदी बेचता था। कुलिश जी का मन शकरकंदी खाने का हुआ। उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने बुआ के बेटे के कुर्ते से दो पैसे निकाल लिए। दो पैसे में बहुत सारी शकरकंदी आ गई। अगले दिन उन्होंने फिर ऐसा किया। घर में सबको पता चल गया। पिताजी को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कुलिश जी की बहुत पिटाई की। उन्हें जयपुर से वापस मालपुरा बुला लिया गया। कुलिश जी को अपनी गलती का बहुत अहसास हुआ। उन्होंने इस घटना से बड़ी सीख ली। मालपुरा में उन्होंने मास्टर बजरंग प्रसाद जी से पढ़ाई की। मास्टर जी ने उन्हें बहुत अच्छी हिंदी सिखाई। कुलिश जी पहले अपना नाम 'कपूर' लिखते थे। मास्टर जी ने कहा कि यह नाम अधूरा है। उन्होंने इसे 'कर्पूर' कर दिया।
कुलिश जी को नाटक करने का भी शौक था। एक बार वे नाटक में द्रोणाचार्य और उत्तरा दोनों बने। वे नाटक करते-करते इतने थक गए कि मंच के नीचे ही सो गए। रात को मां उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचीं। तब जाकर वे घर आए।
कुलिश जी ने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश शुरू की। पहले उन्होंने मालपुरा में क्लर्क की नौकरी की। वहां उन्हें 33 रुपये महीने मिलते थे। फिर वे दिल्ली चले गए। वहां उन्हें 108 रुपये महीने की नौकरी मिली। वे अपने खर्च कम रखते थे और बचे हुए पैसे गांव में पिताजी को भेज देते थे। भाई की शादी के लिए उन्होंने अपनी बचत से सस्ता और अच्छा सामान खरीदा।
कुलिश जी खाली बैठना पसंद नहीं करते थे। उनकी सोच थी कि "बैठे रहने से बेगार भली"। जब भारत का बंटवारा हुआ, तो बहुत से सिंधी परिवार जयपुर आए। उन्हें हिंदी नहीं आती थी। कुलिश जी ने उन सिंधी बच्चों को बिना पैसे लिए हिंदी पढ़ाना शुरू किया। मशहूर फिल्म अभिनेता असरानी भी बचपन में कुलिश जी से हिंदी पढ़ने आते थे।
कुछ समय बाद उन्होंने खुद का काम करने की सोची। वे बिना बिजली के चलने वाली आटा चक्की का इंजन लेने बम्बई गए। वहां से इंजन खरीद कर लाए। एक आदमी ने वह इंजन खरीदा, लेकिन पैसे नहीं दिए। इंजन की गारंटी कलकत्ता वाले एक सेठ ने ली थी। सेठ को जब यह बात पता चली, तो उसने तुरंत नकद पैसे दे दिए। सेठ की इस अच्छाई का कुलिश जी पर बहुत गहरा असर पड़ा। उन्होंने भी जीवन में ऐसा ही अच्छा इंसान बनने की ठानी।
वे पत्रकारिता में आ गए। वे 'राष्ट्रदूत' अखबार में काम करने लगे। वहां उन्होंने बहुत मेहनत की। वे दिन में 18-18 घंटे काम करते थे। कुलिश जी को किसी के दबाव में काम करना पसंद नहीं था। एक बार ख्रुश्चेव और बुल्गानिन जयपुर आए। उनके रुकने के लिए जयपुर के महाराजा के महल में सरकारी पैसे से काम करवाया गया। कुलिश जी को यह बात गलत लगी। उन्होंने अखबार में इसके खिलाफ लिखा। अखबार के मालिक पर दबाव आया। कुलिश जी ने तय किया कि वे दबाव में नहीं लिखेंगे। उन्होंने 'राष्ट्रदूत' की नौकरी छोड़ दी।
नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अपना अखबार निकालने की सोची। ऐसा अखबार जो पूरी तरह स्वतंत्र हो। इस तरह 'राजस्थान पत्रिका' का जन्म हुआ। उनके दोस्त एल.आर. पेंढारकर ने इसका लोगो बनाया। इसमें एक मशाल और गेहूं की बालियां थीं। अखबार शुरू करना आसान नहीं था। पैसे की बहुत कमी थी। उनके एक दोस्त कन्हैयालाल जी ने उन्हें 500 रुपये दिए। उन पैसों से टाइप मशीन का इंतजाम हुआ। दो कुर्सियां और एक टेबल खरीदी गई। एक छोटे से बरामदे में अखबार का दफ्तर खुला।
शुरू के कई साल बहुत परेशानी वाले थे। अखबार छापने के लिए पैसे नहीं होते थे। कई बार मशीनें बदलनी पड़ीं। लेकिन कुलिश जी ने कभी हार नहीं मानी। वे हर मुश्किल का हल निकाल लेते थे। जब चीन ने भारत पर हमला किया, तो कुलिश जी ने अपने अखबार में बहुत ही निडरता से लिखा। उनकी बातों से लोगों को बहुत हिम्मत मिली।
कुलिश जी कहते थे कि जीवन में संघर्ष नहीं, तप होता है। बुरे दिन असल में अच्छे दिनों को लाने वाले होते हैं। उनका जीवन सचमुच एक साफ और तेज बहने वाली नदी की तरह था। उनका जीवन गाथा हमेशा हमें सच्चाई और निडरता से आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहेगी।
(यह आलेख श्री कर्पूरचंद्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)