सोशल मीडिया पर आज हर किसी की प्रतिष्ठा को फूंक में उड़ा देना मनोरंजन का विषय बन चुका है
फेक न्यूज का सच अब भारत सहित दुनिया भर में उजागर होने लगा है। भ्रम और अफवाह फैलाने वाली खबरों के कारण कई बार दंगे भडक़ जाते हैं। भारत जैसे देश में तो आज रोज एक फर्जी खबर वायरल होती है-दूसरे देशों के वीडियो को कश्मीर का बता दिया जाता है। कभी चोटी काटने की अफवाह फैलाई जाती है तो कभी बच्चों के अपहरण की। कई बार निर्दोष लोग भ्रमित लोगों के आक्रोश का शिकार हो जाते हैं। शेयर बाजार और आर्थिक जगत में तो फेक न्यूज कई बार उठापटक करवा चुकी हैं। यही कारण रहा कि अब परेशान लोगों ने फेसबुक, ट्वीटर आदि की शिकायतें दर्ज करवाना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया के इन प्लेटफॉम्र्स को भी फेक न्यूज से बचने के तरीके अखबारों में विज्ञापन जारी करके समझने पड़ रहे हैं।
अफवाहें फैलाने में सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली फर्जी खबरों की कितनी भूमिका होती है इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही किसी स्थान पर हिंसा या तनाव होता है सबसे पहले सरकारें उस स्थान पर इंटरनेट बंद कर देती हैं ताकि लोग सोशल मीडिया की खबरें नहीं देख पाएं। कैसी विडम्बना है एक तरफ सरकार स्वयं ऑनलाइन लेन-देन को आवश्यक कर रही है वही कई शहरों में इंटरनेट बंद कर सारी आर्थिक गतिविधियां ठप कर दी जाती हैं।
कल्पना कीजिये किसी अस्पताल के हर विभाग में झोला छाप डॉक्टरों को बैठा दिया जाए और उन्हें दवा से लेकर ऑपरेशन करने तक की छूट दे दी जाए। साथ में उन्हें यह अभयदान भी दे दिया जाए कि वे मरीजों का कितना ही नुकसान पहुंचाएं, उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। सोचिए उस अस्पताल का हश्र क्या होगा। हिन्दुस्तान में आज सोशल मीडिया की स्थिति ऐसी ही है। अधकचरा ज्ञान पाकर लाखों लोग विशेषज्ञ बन गए हैं। अधकचरे ज्ञान के आधार पर कुछ भी लिखा और भेज दिया। बिना कोई उत्तरदायित्व ओढ़े। कुछ गलत चला गया तो कह देंगे मैने तो सिर्फ फॉरवर्ड किया था, भेजा तो किसी और ने था। न भेजने वाला कभी पकड़ में आएगा और न फॅारवर्ड करने वाले पर कोई कार्रवाई होगी। दूसरी ओर जिम्मेदार अखबारों में हर पंक्ति ठोक बजा कर लिखी जाती है। लम्बे समय की साख उनसे जुड़ी होती है। अखबार में काम करने वालों को कई प्रकार के कानूनों का ध्यान रखना होता है। अखबार में लिखा हर एक शब्द दस्तावेज होता है।
सोशल मीडिया पर आज हर किसी की प्रतिष्ठा को फूंक में उड़ा देना मनोरंजन का विषय बन चुका है। किसी नेता या दल विशेष से जुड़े चापलूस अपने आकाओं को खुश करने के लिए प्रतिद्वंद्वी दल या उसके नेता के लिए घोर अपमानजनक टिप्पणियां करने में शान समझते हैं।
एक समय था जब मीडिया की पूजा होती थी। आजादी के समय पत्रकारिता की भूमिका की गर्व से चर्चा की जाती थी। अखबारों की क्लिपिंग्स के आधार पर अदालतें प्रसंज्ञान ले लेती थीं। आज के ‘ऑनलाइन’ पत्रकारों के लिए जरा से फायदे या मनोरंजन के लिए किसी की पगड़ी उछाल देना खेल बन गया है।
सोशल मीडिया के माध्यम से आई इस गिरावट से जनता न सिर्फ भ्रमित है बल्कि वह हतप्रभ है। युवापीढ़ी दिग्भ्रमित हो रही है। इस स्थिति का एक ही इलाज है खबरों और सूचनाओं को सही मानने से पहले जांच कर ली जाए कि भेजने वाले की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता कैसी है। अन्यथा ये अधकचरी सूचनाएं कभी भी अनर्थ का कारण बन सकती हैं।