बीएसएफ शिविर के चार स्तरीय सुरक्षा कवच को भेदकर आतंककारियों का प्रशासनिक भवन तक पहुंचना देश को सकते में डालने के लिए पर्याप्त है।
गनीमत रही कि आतंककारी अपने कुत्सित इरादों में कामयाब नहीं हो पाए अन्यथा मंगलवार की सुबह श्रीनगर के सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) कैम्प में उरी की तरह एक और खूनी मंजर साकार हो सकता था। बीएसएफ शिविर के चार स्तरीय सुरक्षा कवच को भेदकर आतंककारियों का प्रशासनिक भवन तक पहुंचना देश को सकते में डालने के लिए पर्याप्त है। अतिसुरक्षित और संवेदनशील इलाके में सुरक्षा व्यवस्था को भेदते हुए आतंककारियों का शिविर के भीतर तक पहुंच जाना बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
पिछले साल सितम्बर में भी उरी स्थित सेना मुख्यालय पर आतंककारियों के हमले को देश अब तक भूला नहीं है। इस हमले में आतंककारियों ने सेना के सोते हुए १९ जवानों को मौत की नींद सुला दिया था। अंधेरे का फायदा उठाकर आतंककारी न सिर्फ सेना मुख्यालय में घुस गए बल्कि इतने बड़े हमले को भी अंजाम दे डाला। पठानकोट में वायुसेना स्टेशन और कुपवाड़ा के सैन्य शिविर पर हुए हमलों की याद भी अभी धुंधली नहीं पड़ी है।
हालांकि पिछले कुछ अर्से से सेना और बीएसएफ के जवानों ने आतंककारियों को चुन-चुनकर मारा है। इनमें बुरहान वानी और अब्दुल कयूम नजर सरीखे दुर्दांत आतंककारी शामिल हैं। पर अहम सवाल यह है कि तमाम सुरक्षा बंदोबस्तों को आखिर आतंककारी बार-बार भेदने में कामयाब कैसे हो जाते हैं? अक्सर यह देखा गया है कि आतंककारी तडक़े हमला करते हैं। सेना और बीएसएफ के अधिकारियों को इन बिन्दुओं पर भी ध्यान देना चाहिए। आतंककारियों और उनके आकाओं की पूरी तरह कमर तोडऩा सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
आतंकी हमले में सैनिकों का शहीद होना देश के लिए दुखद पहलू है। हमारे जितने सैनिक युद्ध के दौरान नहीं मारे गए उससे अधिक आतंककारी हमलों में शहीद हो चुके हैं। गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने ऐसे हमलों को देश के लिए चुनौती माना है। रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष भी समय-समय पर चिंता जाहिर करते रहे हैं। इसके मायने साफ हैं। और वो ये कि सैन्य शिविरों की सुरक्षा को और चाक-चौबंद बनाने की जरूरत है और अधिक सतर्क रहने की भी। तभी हम आतंकवादियों के नापाक मंसूबों का पूरी तरह खात्मा कर पाएंगे।