IPS Vikas Vaibhav: बिहार के लोकप्रिय अधिकारियों में शुमार आईपीएस विकास वैभव ने हाल ही में एक यूट्यूब पॉडकास्ट में अपने करियर के सबसे खौफनाक ऑपरेशनों की कहानी साझा की है। उन्होंने बताया कि कैसे मौत के बेहद करीब होने के बावजूद उन्होंने और उनकी टीम ने हौसला नहीं खोया।
IPS Vikas Vaibhav:बिहार के सबसे जाने-माने IPS अधिकारियों में से एक विकास वैभव ने हाल ही में एक इंटरव्यू में एक ऐसे नक्सल-विरोधी ऑपरेशन की पूरी कहानी बताई, जिसने राज्य के इतिहास की दिशा ही बदल दी। यह कहानी रोहतास की कैमूर पहाड़ियों की है, जहां कभी माओवादियों (नक्सलियों) का पूरी तरह से राज चलता था और वहां पुलिस भी कदम रखने से हिचकिचाती थी। विकास वैभव ने बताया कि कैसे चारों तरफ से बरसती गोलियों के बीच, उन्होंने और उनकी टीम ने दो दिन के मुठभेड़ के बाद आखिरकार उस किले को आजाद कराया था जहां करीब तीन दशकों से तिरंगा नहीं फहराया गया था।
साल 2008 का जिक्र करते हुए विकास वैभव ने बताया कि रोहतास का ऐतिहासिक किला पूरी तरह से माओवादियों का सबसे सुरक्षित और अभेद्य मुख्यालय बन चुका था। साल 1980 के बाद से वहां की स्थिति इतनी भयावह थी कि किसी भी पुलिसकर्मी या प्रशासनिक अधिकारी की हिम्मत वहां जाने की नहीं होती थी। नक्सली हर राष्ट्रीय पर्व पर वहां देश के झंडे का अपमान करते हुए काला झंडा फहराते थे और जंगलों के भीतर अपनी समानांतर सरकार चलाते थे। जब भी पुलिस बल पहाड़ों पर जाने की कोशिश करता, उसे भारी नुकसान उठाना पड़ता था। कई वरिष्ठ अधिकारी और जवान वहां शहीद हो चुके थे।
अगस्त 2008 में जब विकास वैभव ने रोहतास के एसपी (SP) के रूप में पदभार संभाला, तो उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने बताया, 'उस समय विभाग और आसपास के कुछ लोगों की यह राय थी कि उस क्षेत्र में मत जाइए, चीजें अपने आप बदलेंगी या सिर्फ अपना बचाव कीजिए। लेकिन मेरे मन में यह साफ था कि जब तक हम खुद प्रयास नहीं करेंगे, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।' विकास वैभव ने अपनी टीम के साथ मिलकर नक्सलियों के सफाए के लिए एक रणनीति बनाई, जिसे ऑपरेशन विध्वंस का नाम दिया गया।
पॉडकास्ट में आईपीएस अधिकारी ने बताया कि सुबह के करीब 5 बजे थे और पहली किरण के साथ ही उनकी टीम कैमूर की पहाड़ियों पर नक्सलियों के ठिकाने के बेहद करीब पहुंच चुकी थी। लेकिन वे लोग उस कठिन भौगोलिक क्षेत्र से पूरी तरह वाकिफ नहीं थे। तभी अचानक घने जंगलों के बीच से पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई।
विकास वैभव ने बताया, 'सुबह के वक्त चारों तरफ घना जंगल था और हमें यह बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि दुश्मन किस तरफ छुपा है। चारों तरफ से गोलियां चल रही थीं और मेरे शरीर को छूते हुए दर्जनों गोलियां निकली होंगी। कोई भी साधारण चूक हमारा सत्यानाश कर सकती थी।' अंधाधुंध फायरिंग के बावजूद विकास वैभव और उनके 100 से अधिक जवानों की टुकड़ी पीछे नहीं हटी। सभी ने तुरंत अपनी-अपनी पोजीशन ली और नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देना शुरू किया।
यह मुठभेड़ कोई साधारण झड़प नहीं थी, बल्कि रुक-रुक कर यह सिलसिला दो दिनों तक चलता रहा। पहाड़ी इलाकों में लॉजिस्टिक्स और भोजन की भारी किल्लत के बीच पुलिस लगातार आगे बढ़ती रही। जब नक्सलियों के पैर उखड़ने लगे और वे पीछे भागे, तब पुलिस ने वहां उनके द्वारा संचालित एक बड़े ठिकाने को अपने कब्जे में लिया।
तलाशी के दौरान पुलिस को तीन सरकारी राइफलें, सैकड़ों जिंदा कारतूस और भारी मात्रा में मेडिकल उपकरण बरामद हुए। विकास वैभव ने बताया कि नक्सलियों ने वहां बकायदा एक आधुनिक मेडिकल कैंप स्थापित कर रखा था, जिसमें उनका इलाज करने और उनकी विचारधारा का प्रचार करने के लिए झारखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़ से भी डॉक्टर्स और लोग आते थे।
दो दिनों तक चले मुठभेड़ में नक्सलियों को खदेड़ने के बाद 26 जनवरी 2009 को पूरे 29 साल बाद रोहतास किले की प्राचीर पर प्रशासनिक स्तर पर तिरंगा झंडा पूरी शान से फहराया गया। विकास वैभव ने कहा कि जिस क्षेत्र में कभी गोलियों की गूंज से सुरक्षाबलों का स्वागत होता था, आज वहां शांति है और जब पुलिस वहां जाती है तो ग्रामीण फूलों से उनका स्वागत करते हैं।