पटना

35 की उम्र में बने थे सबसे युवा GP, अब बिहार के एडवोकेट जनरल पद से दिया इस्तीफा; कौन हैं पीके शाही?

Bihar Advocate General PK Shahi Resigns: बिहार सरकार के एडवोकेट जनरल पीके शाही ने अचानक अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। शाही के नाम पटना हाई कोर्ट के इतिहास में सबसे कम उम्र में सरकारी वकील (GP) बनने का रिकॉर्ड है। नीतीश कैबिनेट में शिक्षा और पर्यावरण जैसे अहम विभागों के मंत्री रह चुके शाही, जनवरी 2023 से दूसरी बार इस संवैधानिक पद की जिम्मेदारी निभा रहे थे।

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Jun 14, 2026
bihar advocate general pk shahi
बिहार के एडवोकेट जनरल पीके शाही

PK Shahi Resignation: बिहार के सबसे बड़े कानूनी अधिकारी एडवोकेट जनरल प्रशांत कुमार शाही (पीके शाही) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वो कई सालों से पटना हाई कोर्ट में बिहार सरकार का पक्ष मजबूती से रख रहे थे। पीके शाही को पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद कानूनी सलाहकारों में से एक माना जाता है। ऐसे में अचानक उनके इस्तीफे ने कई तरह की अटकलों को जन्म दिया है। हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर सब कुछ ठीक चलने के बावजूद उन्होंने यह कदम क्यों उठाया। लेकिन आखिर कौन हैं पीके शाही और क्यों उनका सफर इतना ऐतिहासिक रहा है?

BHU से की लॉ की पढ़ाई

3 जुलाई 1955 को जन्मे प्रशांत कुमार शाही का कानूनी क्षेत्र में शानदार सफर शुरू से ही उल्लेखनीय रहा है। पढ़ाई-लिखाई और जनसेवा के प्रति गहरी रुचि के कारण उन्होंने प्रतिष्ठित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के लॉ फ़ैकल्टी में दाखिला लिया। उन्होंने 1979 में अपनी लॉ की डिग्री पूरी की। इसके कुछ समय बाद 1980 में वे बार काउंसिल में शामिल हुए और पटना हाई कोर्ट में वकालत शुरू की। अपनी स्पष्ट सोच, बेहतरीन वाक-पटुता और कानून की गहरी समझ के कारण, वे जल्द ही कानूनी बिरादरी में एक चमकते सितारे के तौर पर उभरे।

35 साल की उम्र में रचा इतिहास, बने सबसे युवा GP

साल 1990 में में पीके शाही को पटना हाई कोर्ट में बिहार सरकार का सरकारी वकील (Government Pleader) नियुक्त किया गया। वे महज 35 साल की उम्र में इस पद पर पहुंचने वाले पटना हाई कोर्ट के इतिहास के सबसे युवा सरकारी वकील बने, जो अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है। इस कार्यकाल के दौरान राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने शासन, लोक प्रशासन और संवैधानिक कानून से जुड़े कई अहम मामलों को कुशलतापूर्वक संभाला।

देश की बड़ी अदालती लड़ाइयों में सरकार का रखा पक्ष

जैसे-जैसे पीके शाही की कानूनी प्रतिष्ठा बढ़ी, वैसे-वैसे उनकी वकालत का दायरा भी बढ़ता गया। उन्होंने अदालत में कई प्रतिष्ठित संस्थानों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी संगठनों का प्रतिनिधित्व किया। 2001 में उनकी काबिलियत और ईमानदारी को देखते हुए उन्हें भारत सरकार का सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त किया गया। इस भूमिका में उन्होंने केंद्र सरकार से जुड़े कई बड़े कानूनी मामलों में मुख्य भूमिका निभाई। साथ ही उन्हें भारतीय रेलवे के लिए सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल की जिम्मेदारी भी सौंपी गई, जहां उन्होंने देश के सबसे बड़े संगठन का प्रतिनिधित्व करते हुए कई जटिल मामलों में निष्पक्षता और स्पष्टता के साथ पक्ष रखा।

नीतीश कुमार की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे

पीके शाही और पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बीच दशकों पुराना खास रिश्ता रहा है। जब 2005 में नीतीश कुमार पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने पीके शाही पर भरोसा जताते हुए उन्हें 25 नवंबर 2005 को राज्य के सर्वोच्च कानूनी अधिकारी यानि एडवोकेट जनरल के पद पर नियुक्त किया। 24 नवंबर 2010 तक चले इस शुरुआती कार्यकाल के दौरान, उन्होंने राज्य की कानूनी रणनीतियों के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया और यह सुनिश्चित किया कि सरकारी नीतियां अदालत में मजबूती से टिकी रहें।

कैबिनेट में संभाली अहम विभागों की जिम्मेदारी

पीके शाही की गिनती बिहार के उन चुनिंदा कानूनी दिग्गजों में होती है जिन्होंने न केवल अदालत में बहस की, बल्कि एक नीति-निर्माता के तौर पर राज्य के लिए नीतियां भी बनाईं। वे 2010 में नीतीश कैबिनेट में शामिल हुए। शुरुआत में उन्हें शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी गई, जहां उन्होंने बिहार के शैक्षिक ढांचे को मजबूत करने के लिए कई नीतियां लागू कीं।

साल 2013 और 2014 में उनकी प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें एक साथ तीन भारी-भरकम विभागों शिक्षा, पर्यावरण एवं वन और योजना विकास विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। 24 नवंबर 2015 तक कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य करने के बाद, उन्होंने जनवरी 2016 में सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया और वापस वकालत की दुनिया में लौट आए, जहां उन्होंने सफलता के नए आयाम छुए।

दूसरी बार बने महाधिवक्ता

वकालत में लौटने के बाद उनके अनुभव का लाभ उठाने के लिए नीतीश सरकार ने 16 जनवरी 2023 को उन्हें दोबारा बिहार का महाधिवक्ता नियुक्त किया। उनकी नियुक्ति तत्कालीन महाधिवक्ता ललित किशोर के इस्तीफे के बाद हुई थी। अपने दूसरे कार्यकाल में भी उन्होंने राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को कानूनी रूप से सुगम बनाने में बेजोड़ भूमिका निभाई।

पीके शाही का करियर

1990 – सिर्फ़ 35 साल की उम्र में पटना हाई कोर्ट के सबसे युवा सरकारी वकील (GP) बने।
2001 – भारत सरकार और भारतीय रेलवे के लिए सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त किए गए।
2005–2010 – नीतीश कुमार के पहले कार्यकाल के दौरान पहली बार बिहार के एडवोकेट जनरल के तौर पर काम किया।
2010–2015 – नीतीश कैबिनेट में शिक्षा, पर्यावरण और वन, तथा योजना और विकास मंत्री के तौर पर काम किया।
2013 – JDU के टिकट पर महाराजगंज लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव लड़ा, लेकिन RJD के प्रभुनाथ सिंह से हार गए।
16 जनवरी 2023 – तत्कालीन एडवोकेट जनरल ललित किशोर के इस्तीफ़े के बाद दूसरी बार बिहार के एडवोकेट जनरल बने।

नए AG की तलाश शुरू

पीके शाही के अचानक इस्तीफ़े के बाद अब मुख्य सवाल यह है कि बिहार का अगला एडवोकेट जनरल कौन होगा? भारतीय संविधान के अनुच्छेद 165 के तहत राज्य के मुख्य कानूनी सलाहकार यानी एडवोकेट जनरल की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है। सूत्रों के अनुसार, राज्य का कानून विभाग नए एडवोकेट जनरल की नियुक्ति की प्रक्रिया में तेज़ी ला रहा है। पटना हाई कोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों के नामों पर शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा है।

Published on:
14 Jun 2026 02:37 pm