
रांची में जगन्नाथपुर मंदिर के पट खुलते ही भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। दूर-दराज से आए भक्त सुबह से ही लंबी कतारों में खड़े होकर भगवान के दर्शन का इंतजार कर रहे थे। इस दौरान पूरे मंदिर परिसर में 'जय जगन्नाथ' के जयघोष और भक्ति गीतों की गूंज सुनाई देती रही। सुबह 5 बजे से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन के लिए पट खोल दिए गए थे। जबकि दोपहर 2 बजे के बाद दर्शन बंद कर दिए गए।
शाम 5 बजे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भव्य रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान कर गए। हजारों श्रद्धालु रथ की रस्सी खींचते हुए भगवान को मौसीबाड़ी तक पहुंचाएंगे। रथ शाम करीब 6 बजे मौसीबाड़ी पहुंचेगा, जबकि शाम 6:46 से 7 बजे के बीच विग्रहों का प्रवेश कराया जाएगा। इसके बाद रात 8 बजे 108 दीपों से भगवान की मंगल आरती होगी और शयन आरती के साथ दिनभर के धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।
इसके बाद 25 जुलाई को घुरती रथयात्रा निकाली जाएगी, जिसमें भगवान पुनः जगन्नाथपुर मंदिर लौटेंगे। रथयात्रा के साथ ही 10 दिनों तक चलने वाले पारंपरिक रथ मेले की भी शुरुआत हो जाएगी।
रथयात्रा महापर्व के अवसर पर सुबह से ही मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। भक्त पूरे श्रद्धाभाव के साथ पूजा-अर्चना कर भगवान का आशीर्वाद लेते नजर आए। भगवान जगन्नाथ के दर्शन और महाआरती के दौरान पूरा परिसर 'जय जगन्नाथ' और 'हरे कृष्ण' के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने अपने परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
रथयात्रा को लेकर मंदिर को फूलों और रंग-बिरंगी रोशनी से आकर्षक ढंग से सजाया गया है, जिससे पूरे परिसर की भव्यता देखते ही बन रही है। आस्था और उत्साह का अनूठा संगम पूरे आयोजन में दिखाई दे रहा है।
रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर की स्थापना वर्ष 1691 में नागवंशी राजा ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने कराई थी। इसके पीछे एक रोचक धार्मिक कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, राजा एनीनाथ शाहदेव अपने सेवकों के साथ पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए गए थे। वहीं उनके एक सेवक पर भगवान की भक्ति का गहरा प्रभाव पड़ा और वह हर समय प्रभु का नाम जपने लगा। एक रात यात्रा के दौरान सेवक को तेज भूख लगी, लेकिन भोजन की कोई व्यवस्था नहीं थी। उसने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की। लोकमान्यता है कि भगवान स्वयं भेष बदलकर आए और अपने भोग का प्रसाद देकर उसकी भूख मिटाई।
अगली सुबह सेवक ने यह घटना राजा को सुनाई। उसी रात राजा एनीनाथ शाहदेव को भी स्वप्न में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए। भगवान ने उनसे अपने राज्य में भी उनके विग्रह की स्थापना कर मंदिर बनाने का निर्देश दिया। पुरी से लौटने के बाद राजा ने अपने संकल्प को पूरा किया और सभी समाज के लोगों के सहयोग से रांची में जगन्नाथपुर मंदिर का निर्माण कराया। तभी से यहां भी पुरी की परंपरा के अनुरूप भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता आ रहा है।