दिल्ली में बिहार निवास को गिराने के फैसले से बिहार में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। RJD ने सवाल उठाया है कि जब बिहार पहले से ही 3 लाख करोड़ के कर्ज से दबा हुआ है, तो 500 करोड़ की लागत से एक मजबूत और काम करने वाली बिल्डिंग को गिराने की क्या जरूरत है।
बिहार की राजनीति में एक बार फिर दिल्ली स्थित बिहार निवास को लेकर सियासी तूफान खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने राज्य सरकार के उस फैसले पर तीखा हमला बोला है, जिसमें पुराने और मजबूत बिहार निवास को तोड़कर नया भवन बनाने की योजना सामने आई है। RJD का आरोप है कि यह फैसला किसी तकनीकी जरूरत के तहत नहीं, बल्कि राजनीतिक कुंठा, ईर्ष्या और नाम मिटाने की मानसिकता से प्रेरित है।
RJD के मुख्य प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने बयान जारी करते हुए बिहार सरकार से तथ्यात्मक और बिंदुवार जवाब मांगा है। उन्होंने कहा कि बिहार निवास को तोड़ने के पीछे सरकार की कुंठित मानसिकता है और यह फैसला पूरी तरह से तुगलकी फरमान जैसा है। शक्ति सिंह यादव ने याद दिलाया कि वर्ष 1994 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा निर्मित यह भवन आज भी पूरी तरह सुरक्षित, मजबूत और उपयोगी है। हाल ही में इस भवन पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च कर सौंदर्यीकरण कराया गया है। भवन में राज्यपाल और मुख्यमंत्री के लिए बने सुइट आज भी शानदार स्थिति में हैं।
RJD ने सरकार के फैसले को आर्थिक रूप से भी गैर-जिम्मेदाराना बताया है। पार्टी का कहना है कि बिहार पहले से ही तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज में डूबा हुआ है। राज्य का हर नागरिक औसतन करीब 25 हजार रुपये का कर्जदार है। ऐसी स्थिति में 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से नया बिहार निवास बनाना जनता के पैसे की बर्बादी है। शक्ति सिंह यादव ने कहा कि बिहार सरकार रोजाना करीब 62 करोड़ रुपये सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है और सालाना यह आंकड़ा लगभग 28 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। ऐसे में सिर्फ राजनीतिक ईर्ष्या के कारण एक मजबूत और उपयोगी इमारत को तोड़ना कहां का न्याय है?
RJD का दावा है कि बिहार निवास की हालत ऐसी नहीं है कि उसे तोड़ा जाए। भवन की ऊंचाई अधिक होने के कारण वहां जलजमाव की समस्या भी नहीं होती और विशेषज्ञों के मुताबिक यह इमारत अगले 50–60 वर्षों तक मजबूती से खड़ी रह सकती है। इसके बावजूद इसे जमींदोज करने का निर्णय कई सवाल खड़े करता है। शक्ति सिंह यादव का आरोप है कि असली समस्या भवन की मजबूती नहीं, बल्कि पोर्टिको में लगे उस शिलापट्ट से है, जिस पर उद्घाटनकर्ता के रूप में लालू प्रसाद यादव का नाम दर्ज है। उन्होंने कहा कि जब भी सत्ताधारी दल के नेता वहां पहुंचते हैं, तो उस नाम को देखकर उन्हें असहजता होती है। RJD का आरोप है कि सिर्फ उस एक नाम को हटाने के लिए पूरी इमारत को गिराने की साजिश रची जा रही है।
RJD ने यह सवाल भी उठाया कि दिल्ली में मौजूद बिहार भवन, जो बिहार निवास से कहीं ज्यादा पुराना है, उसे क्यों नहीं तोड़ा जा रहा। पार्टी का दावा है कि इसका एकमात्र कारण यह है कि वहां लालू प्रसाद यादव का शिलापट्ट नहीं लगा है। RJD के अनुसार, पूरी कार्रवाई का मकसद इतिहास को मिटाना और अपने पसंदीदा ठेकेदारों को फायदा पहुंचाना है।
RJD ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी तीखा हमला बोला। शक्ति सिंह यादव ने कहा कि सरकार जिस नए बिहार सदन की बात कर रही है, वह पहले से ही टपक रहा है और वहां जाने से लोग कतराते हैं। इसके उलट, लालू यादव के कार्यकाल में बना बिहार निवास आज भी शान से खड़ा है। उन्होंने यह भी तंज कसा कि सरकार ने जल्दबाजी में उसी दीवार पर अपना शिलापट्ट तक लगा दिया है, जबकि जनता के हितों की कोई परवाह नहीं की जा रही। अंत में RJD प्रवक्ता ने कहा कि सरकार चाहे इमारत तुड़वा ले, शिलापट्ट हटा दे, लेकिन लालू प्रसाद यादव द्वारा सामाजिक न्याय और गरीबों के उत्थान के लिए किए गए कार्यों को इतिहास और जनता के दिलों से मिटाया नहीं जा सकता।