Patrika Special News

घाट पर घंटियों की गूंज और चार महीने सन्नाटा, 42 साल पुराने मारुति धाम को अब पुल की आस

Religious Tourist Places: महानदी किनारे सिरसिदा-गुदगुदा संगम पर स्थित मारुति धाम 42 साल से आस्था का केंद्र है। कार्तिक और माघी पूर्णिमा पर मेले में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं, लेकिन बारिश में चार महीने नदी आवागमन रोक देती है।
4 min read
Sep 19, 2026
Chhattisgarh Religious Tourism
35 साल की सेवा से वीरानी बनी हरियाली (Photo Source- Patrika)

Chhattisgarh Religious Tourism: महानदी का शांत किनारा… कल-कल बहता पानी… पेड़ों से छनकर आती रोशनी और मंदिरों से गूंजती घंटियों की आवाज। इस प्राकृतिक माहौल के बीच सिरसिदा और गुदगुदा गांव के संगम पर पिछले 42 वर्षों से आस्था की एक कहानी आकार ले रही है। यह कहानी है मारुति धाम की, जो समय के साथ आसपास के गांवों के लिए केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा और प्रकृति के संगम का केंद्र बन चुका है।

महानदी के किनारे बसे इस धाम की खासियत उसका शांत वातावरण भी है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु पूजा-अर्चना के साथ कुछ समय नदी किनारे पेड़ों की छांव में बिताते हैं। लेकिन इस खूबसूरत धाम तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। सिरसिदा और गुदगुदा से इसकी दूरी करीब दो किलोमीटर है, लेकिन बीच में महानदी रास्ता रोक देती है। गर्मी और सामान्य दिनों में लोग नदी पार कर धाम तक पहुंच जाते हैं, लेकिन बारिश के मौसम में तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है।

नदी बढ़ते ही चार महीने थम जाती है आवाजाही

मानसून के दौरान महानदी का जलस्तर बढ़ने के साथ मारुति धाम तक नियमित आवाजाही लगभग चार महीने तक प्रभावित रहती है। नदी का बहाव तेज होने पर श्रद्धालुओं का पहुंचना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में जिस स्थान पर सामान्य दिनों में घंटियों की आवाज और श्रद्धालुओं की चहल-पहल रहती है, वहां बरसात के महीनों में सन्नाटा पसर जाता है। करीब 42 साल पहले अयोध्या के संत बृजमोहन दास ने यहां मारुति धाम की स्थापना की थी।

शुरुआत में यह स्थान बेहद साधारण था, लेकिन धीरे-धीरे आसपास के ग्रामीणों की आस्था इससे जुड़ती चली गई। समय के साथ यहां मंदिरों का विस्तार हुआ और धाम धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया। आज परिसर में बजरंगबली के मंदिर के साथ दुर्गा, शंकर, विश्वकर्मा और राम-जानकी के मंदिर भी हैं। अलग-अलग समाजों के लिए सामुदायिक भवन भी बनाए गए हैं। पुजारी अश्वनी कुमार यादव प्रतिदिन मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं।

कार्तिक से माघ तक आस्था का अलग रंग

मारुति धाम में सालभर धार्मिक गतिविधियां होती हैं, लेकिन कार्तिक पूर्णिमा और माघी पूर्णिमा के अवसर पर यहां का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। कार्तिक पूर्णिमा पर एक दिन का मेला लगता है, जबकि माघी पूर्णिमा पर नौ दिनों तक यज्ञ, हवन और धार्मिक आयोजन होते हैं। इन आयोजनों में आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान भी परिसर में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। धार्मिक आयोजनों के समय महानदी का शांत किनारा श्रद्धालुओं की भीड़ से गुलजार हो जाता है।

मेले के दौरान हजारों लोगों की आवाजाही होती है। कोई पूजा के लिए पहुंचता है तो कोई परिवार के साथ कुछ समय नदी किनारे बिताने आता है। यहां आने वालों के लिए मंदिर जितना आकर्षण का केंद्र है, उतनी ही खूबसूरत यहां की प्राकृतिक छटा भी है। महानदी का किनारा, पेड़ों की हरियाली और शांत वातावरण इस धाम को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देते हैं।

महानदी की खासियत उसका शांत वातावरण

एक झोपड़ी से शुरू हुई कहानी, आज बना आस्था का केंद्र

मारुति धाम के विकास की कहानी केवल मंदिरों के निर्माण तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वर्षों की सेवा और मेहनत भी जुड़ी है। गुदगुदा निवासी 80 वर्षीय अलीराम साहू पिछले करीब 35 वर्षों से इस धाम की सेवा में जुटे हैं। अलीराम बताते हैं कि शुरुआती दौर में यहां एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां संत रहा करते थे। आसपास का इलाका भी काफी वीरान था। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी और लोगों के सहयोग से मंदिर के निर्माण की दिशा में काम शुरू हुआ।

वर्ष 2001 में दानदाताओं के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया। इसके बाद अलीराम ने मंदिर की सेवा के साथ परिसर को संवारने का काम भी जारी रखा। उन्होंने आसपास पेड़-पौधे लगाए। धीरे-धीरे वीरान दिखाई देने वाली जगह हरियाली से भरती चली गई। आज धाम के आसपास दिखाई देने वाले पेड़-पौधे और हरियाली इसकी पहचान का हिस्सा बन चुके हैं।

नदी से मिला शिवलिंग, स्थानीय आस्था से जुड़ी मान्यता

मारुति धाम परिसर में स्थापित शिवलिंग को लेकर भी स्थानीय लोगों के बीच एक मान्यता प्रचलित है। बताया जाता है कि मछुआरों को महानदी में मछली पकड़ने के दौरान शिवलिंग मिला था। बाद में इसे धाम परिसर में स्थापित किया गया। स्थानीय लोगों के लिए यह घटना भी धाम की आस्था से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यहां आने वाले श्रद्धालु अलग-अलग मंदिरों में पूजा करते हैं और नदी किनारे कुछ समय शांत वातावरण में बिताते हैं। इस तरह धार्मिक आस्था और प्रकृति यहां एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि साथ-साथ दिखाई देती हैं।

बारिश में नदी बन जाती है सबसे बड़ी चुनौती

मारुति धाम की सबसे बड़ी समस्या इसकी पहुंच है। गर्मी और सामान्य मौसम में महानदी पार कर लोग आसानी से धाम तक पहुंच जाते हैं, लेकिन बारिश के दौरान नदी का बढ़ता जलस्तर रास्ता रोक देता है। चार महीने तक आवाजाही प्रभावित होने का असर धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ स्थानीय लोगों की गतिविधियों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि अब यहां स्थायी और सुरक्षित पहुंच मार्ग की जरूरत महसूस की जा रही है।

धाम समिति का कहना है कि यदि यहां सड़क, पुल-पुलिया और अन्य जरूरी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं तो मारुति धाम को धार्मिक पर्यटन के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। इससे श्रद्धालुओं को सालभर सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिल सकेगी और क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनेगी।

आस्था के साथ पर्यटन की भी संभावना

मारुति धाम की सबसे बड़ी ताकत इसकी प्राकृतिक और धार्मिक पहचान का एक साथ मौजूद होना है। एक ओर मंदिरों की घंटियां हैं तो दूसरी ओर महानदी का विस्तृत किनारा। आसपास की हरियाली और शांत वातावरण इसे सामान्य धार्मिक स्थलों से अलग अनुभव देता है। यदि यहां स्थायी पहुंच, सुरक्षित रास्ता, पुल-पुलिया, पेयजल, प्रकाश और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित होती हैं तो यह स्थान आसपास के क्षेत्र के लिए एक बेहतर धार्मिक पर्यटन केंद्र बन सकता है।

आज 42 साल बाद मारुति धाम अपनी पहचान बना चुका है। संत बृजमोहन दास की शुरुआत से लेकर अलीराम साहू की दशकों लंबी सेवा तक, इस धाम ने कई बदलाव देखे हैं। कभी झोपड़ी और वीरानी से शुरू हुआ यह स्थान आज कई मंदिरों, हरियाली और श्रद्धालुओं की आस्था से भरा है। अब जरूरत केवल इतनी है कि महानदी तक पहुंचने का रास्ता भी इस कहानी का हिस्सा बने। ऐसा रास्ता, जो बारिश में आस्था को रोके नहीं और सालभर श्रद्धालुओं को सुरक्षित तरीके से इस शांत, सुंदर और आस्था से भरे धाम तक पहुंचा सके।

Updated on:
19 Sept 2026 01:17 pm
Published on:
19 Sept 2026 01:17 pm