
Bastar Forest History: आज इंद्रावती टाइगर रिजर्व का नाम देश के महत्वपूर्ण बाघ संरक्षण क्षेत्रों में लिया जाता है। यहां बाघों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 24 घंटे गश्त, कैमरा ट्रैप, आधुनिक तकनीक और विशेष निगरानी अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन करीब पांच दशक पहले यही जंगल बिल्कुल अलग पहचान रखते थे। उस दौर में बस्तर के घने जंगल देशभर के शिकार प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र थे। वन विभाग की अनुमति लेकर लोग चीतल, सांभर और अन्य वन्यजीवों का शिकार करने आते थे। यह पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया मानी जाती थी।
वर्ष 1972 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम लागू होने और 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद देशभर की तरह बस्तर के जंगलों की भी तस्वीर बदल गई। आज जहां कभी शिकार की गोलियां गूंजती थीं, वहीं अब बाघों की दहाड़ सुनाई देती है और पूरा वन तंत्र संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है।
भोपालपटनम क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिक तमाड़ी राममूर्ति बताते हैं कि 1960 और 1970 के दशक में बस्तर के जंगलों में दूर-दूर से लोग शिकार करने आते थे। वन विभाग से अनुमति लेकर निर्धारित नियमों के तहत शिकार किया जाता था। उस समय जंगलों में चीतल, सांभर, जंगली सूअर और अन्य वन्यजीवों की अच्छी संख्या थी।
स्थानीय लोगों के अनुसार, उस दौर में कई प्रभावशाली लोग और शिकार के शौकीन इन जंगलों तक पहुंचते थे। क्षेत्र में यह भी चर्चा रही कि हिंदी फिल्म अभिनेता शम्मी कपूर भी भोपालपटनम आए थे और कई दिनों तक यहां रुककर आसपास के जंगलों में शिकार पर गए थे। उस समय इसे रोमांच और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था, जबकि आज यही गतिविधि कानूनन अपराध है।
भारत में वन्यजीवों की तेजी से घटती संख्या ने सरकार को सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर किया। इसी के तहत वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 लागू किया गया। इस कानून ने पहली बार देशभर में वन्यजीवों के शिकार पर व्यापक प्रतिबंध लगाया और संरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा को मजबूत किया।
इसके बाद 1973 में शुरू हुए प्रोजेक्ट टाइगर ने बाघ संरक्षण को राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया। इस पहल का उद्देश्य सिर्फ बाघों को बचाना नहीं था, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना भी था। इन दोनों फैसलों ने देश के जंगलों की दिशा बदल दी और बस्तर भी इससे अछूता नहीं रहा।
वन संरक्षण की नीतियों के बाद इंद्रावती क्षेत्र को धीरे-धीरे संरक्षण आधारित प्रबंधन के तहत विकसित किया गया। समय के साथ यह क्षेत्र इंद्रावती टाइगर रिजर्व के रूप में स्थापित हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने लगा। आज यहां वन विभाग की टीमें लगातार गश्त करती हैं। संवेदनशील इलाकों में कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं, जिनकी मदद से बाघों सहित अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से निगरानी पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हुई है।
एक समय था जब जंगलों में भरमार बंदूकें आम थीं। स्थानीय लोगों के मुताबिक किसानों, ग्रामीणों और जमींदारों को जंगली जानवरों से फसलों और पशुधन की सुरक्षा के लिए प्रशासन की अनुशंसा पर भरमार बंदूक के लाइसेंस दिए जाते थे। चुनाव और विशेष परिस्थितियों में इन हथियारों को थानों में जमा कराना अनिवार्य होता था। आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब जंगलों में बंदूक से ज्यादा कैमरा ट्रैप, जीपीएस आधारित मॉनिटरिंग, वायरलेस संचार और नियमित पेट्रोलिंग दिखाई देती है। वन विभाग का पूरा फोकस अवैध शिकार रोकने और वन्यजीवों के सुरक्षित आवास को बनाए रखने पर है।
वन संरक्षण की सबसे बड़ी सफलता स्थानीय समुदाय की भागीदारी मानी जा रही है। पहले जहां कई ग्रामीण शिकार को सामान्य गतिविधि मानते थे, वहीं अब वे वन्यजीव संरक्षण के महत्व को समझने लगे हैं। वन विभाग लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है, जिससे ग्रामीण अवैध शिकार की सूचना प्रशासन तक पहुंचाने में सहयोग कर रहे हैं। कई गांवों में लोग स्वयं भी बाहरी शिकारियों पर नजर रखते हैं। इससे संरक्षण की प्रक्रिया और मजबूत हुई है।
हालांकि संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। अवैध शिकार की कोशिशें, जंगलों पर बढ़ता मानवीय दबाव, प्राकृतिक आवास का सिकुड़ना और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी समस्याएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। वन विभाग, स्थानीय समुदाय और आधुनिक तकनीक के समन्वय से ही वन्यजीव संरक्षण को स्थायी सफलता मिल सकती है।
बस्तर के जंगलों की यह कहानी केवल शिकार से संरक्षण तक की यात्रा नहीं है, बल्कि बदलती सामाजिक सोच और सरकारी नीतियों की भी कहानी है। जहां कभी शिकार करना रोमांच और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था, वहीं आज बाघों और वन्यजीवों की रक्षा करना गर्व का विषय बन चुका है।
इंद्रावती टाइगर रिजर्व इस बदलाव का जीवंत उदाहरण है। आधी सदी पहले जिन जंगलों में शिकार के लिए लोग दूर-दूर से पहुंचते थे, आज वही जंगल जैव विविधता के संरक्षण, बाघों की सुरक्षा और प्रकृति के संतुलन का संदेश दे रहे हैं। यह परिवर्तन बताता है कि समय पर बनाए गए कानून, प्रभावी क्रियान्वयन और समाज की भागीदारी मिलकर प्राकृतिक धरोहरों को नई पहचान दे सकते हैं।