
Cyberchondria : आज के दौर में जहां स्मार्टफोन हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुका है। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक, हम हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान इंटरनेट पर तलाशते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यही आदत आपको एक गंभीर मानसिक बीमारी का शिकार बना रही है? जी हां, अगर आपको हल्का सा सिरदर्द, थकान या बुखार महसूस होता है और आप डॉक्टर के पास जाने के बजाय सीधे गूगल या एआई (AI) चैटबॉट्स पर बीमारी के लक्षण सर्च करने लगते हैं, तो आप 'साइबरकॉन्ड्रिया' (Cyberchondria) की चपेट में हैं।
हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश में साइबरकॉन्ड्रिया के मामलों में चार गुना तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एआई टूल्स द्वारा बताए गए गंभीर और जानलेवा लक्षणों को सच मानकर लोग इस कदर डर रहे हैं कि वे 'लॉन्ग टर्म मेडिकल ट्रॉमा' का शिकार हो रहे हैं। इस अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण लोगों का वजन तेजी से गिर रहा है, भूख मर रही है और नींद पूरी तरह गायब हो चुकी है।
सरल शब्दों में कहें तो इंटरनेट या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) टूल्स पर बीमारियों के लक्षण खोजकर खुद को किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित मान लेने की मानसिक स्थिति को 'साइबरकॉन्ड्रिया' कहा जाता है। यह 'हाइपोकॉन्ड्रिया' (Hypochondria) का ही एक डिजिटल रूप है। हाइपोकॉन्ड्रिया में व्यक्ति बिना किसी वास्तविक बीमारी के भी खुद को बीमार समझता है, लेकिन साइबरकॉन्ड्रिया में इस डर को बढ़ाने का काम इंटरनेट और एआई टूल्स करते हैं। जब कोई यूजर किसी सामान्य लक्षण (जैसे- हल्का बुखार या सिरदर्द) को सर्च करता है, तो एल्गोरिदम कई बार दुर्लभ और बेहद गंभीर बीमारियों (जैसे- ट्यूमर या कैंसर) की सूची सामने रख देता है। इसे देखकर व्यक्ति पैनिक हो जाता है।
मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी: पहले जहां किसी मनोचिकित्सक के पास महीने में ऐसे सिर्फ 4 से 6 मरीज आते थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 20 से 25 मरीज प्रति माह तक पहुंच चुका है।
प्रभावित वर्ग: इस समस्या से पीड़ित होने वाले लोगों में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं, आईटी और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले प्रोफेशनल्स और उच्च शिक्षित लोगों की है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह वर्ग तकनीक और इंटरनेट का इस्तेमाल सबसे ज्यादा करता है।
आजकल लोग हर छोटे लक्षण के लिए एआई (AI) और गूगल का सहारा ले रहे हैं। एक डॉक्टर के तौर पर आप इस प्रवृत्ति को किस रूप में देखते हैं?
इंटरनेट और एआई (AI) से स्वास्थ्य संबंधी सूचनाएं लेना अपने आप में बुरा नहीं है। इससे लोगों में हेल्थ लिटरेसी (स्वास्थ्य साक्षरता) बढ़ सकती है, मरीज अपने रोग, दवाइयों और मेडिकल टेस्ट के बारे में अधिक जागरूक हो सकते हैं और डॉक्टर-मरीज के बीच सहमति से निर्णय लेना (Shared Decision Making) आसान हो सकती है। लेकिन, समस्या तब शुरू होती है जब हम छोटे-छोटे लक्षणों के बारे में भी बार-बार इंटरनेट सर्च करने लगते हैं। इसके बाद जो जानकारियां सामने आती हैं, उनमें से सही और गलत या सामान्य और गंभीर बातों के बीच अंतर समझ पाना आम इंसान के लिए काफी मुश्किल होता है। इस स्थिति के कारण मरीज का अपने इलाज के प्रति भरोसा कम हो सकता है और डॉक्टर-मरीज के आपसी संबंधों में भी दिक्कत आ सकती है। जब लोग सिम्पटम्स (लक्षण) चेक करते हैं, तो एआई या इंटरनेट टूल्स संभावित गंभीर बीमारियों की एक लंबी लिस्ट दिखा देते हैं या लक्षणों की गंभीरता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। नतीजतन, जिन लोगों में पहले से ही एंग्जायटी ट्रेड्स (Anxiety Traits) या ओसीडी स्पेक्ट्रम (OCD Spectrum) के लक्षण या विशेषताएं होती हैं, उन लोगों में यह आदत अत्यधिक घबराहट और मानसिक तनाव को ट्रिगर कर देती है।
क्या इंटरनेट पर बीमारी सर्च करना वाकई किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार बना सकता है? इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है?
मानव मस्तिष्क (Human Brain) की कार्यप्रणाली कुछ ऐसी होती है कि वह सामान्यत 'कैटैस्ट्रोफिक थिंकिंग' (Catastrophic Thinking - किसी छोटी बात का बेहद बुरा परिणाम सोचना) की ओर प्रवृत्त होता है। यदि हम कहें कि हमारे दिमाग की डिफ़ॉल्ट सेटिंग में एक स्वाभाविक नकारात्मक झुकाव (Natural Negative Bias) होता है, तो गलत नहीं होगा। जब कोई व्यक्ति इंटरनेट पर अपने लक्षणों को सर्च करता है, तो एल्गोरिदम के कारण अक्सर जो प्रमुख सर्च परिणाम सामने आते हैं, उनमें कई दुर्लभ (Rare) और खतरनाक बीमारियों का उल्लेख होता है। ऐसी स्थिति में, मस्तिष्क उन चुनिंदा या सामान्य लक्षणों के आधार पर ही खुद को उस गंभीर बीमारी से जोड़कर देखने लगता है। सर्च के इस दौर में मरीज अक्सर सामान्य या वास्तविक स्थिति (Actual Disease) को समझ नहीं पाता और उसका झुकाव पूरी तरह से नकारात्मकता की ओर हो जाता है।
इसके बाद, इंटरनेट पर बार-बार अपने लक्षणों को खोजना (Frequent Symptom Searching) एक प्रकार का कंपल्सिव बिहेवियर बन जाता है, जिसे 'कम्पल्सिव रीएश्योरेंस सीकिंग' (Compulsive Reassurance Seeking) कहते हैं। इसमें मरीज बार-बार खुद को तसल्ली देने की कोशिश करता है कि 'क्या सच में मुझे यही बीमारी है?' या 'क्या मेरी समस्या इतनी ही गंभीर है?'। धीरे-धीरे यह चक्र एक ओसीडी (OCD Like Negative Reinforcement) की तरह काम करने लगता है, जो व्यक्ति को नकारात्मक विचारों के जाल में और गहरा धकेलता जाता है।
रिपोर्ट्स में सामने आया है कि इस डर की वजह से लोगों का वजन तेजी से गिर रहा है। मानसिक तनाव का शारीरिक वजन और भूख पर यह सीधा असर कैसे होता है?
क्रॉनिक मेंटल स्ट्रेस (Chronic Mental Stress - लंबे समय तक बना रहने वाला मानसिक तनाव) शरीर में एड्रेनालिन (Adrenaline) और कॉर्टिसोल (Cortisol) जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स के स्तर को बढ़ा देता है। ये हार्मोन्स सीधे तौर पर व्यक्ति की भूख (Appetite), पाचन क्रिया (Digestion) और स्लीप पैटर्न पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। हम जानते हैं कि स्ट्रेस के शुरुआती या 'एक्यूट फेज' (Acute Phase) में यह भूख को पूरी तरह से दबा देता है। यह स्थिति शरीर में 'फाइट और फ्लाइट मोड' (Fight-or-Flight Mode) को सक्रिय कर देती है, जिसके चलते व्यक्ति सामान्य से बहुत कम भोजन ग्रहण करता है। इसके अतिरिक्त, यदि वह कुछ खाता भी है, तो तनाव के कारण उसका शरीर भोजन को ठीक से पचा (Digest) नहीं पाता है। यही मुख्य कारण है कि व्यक्ति का वजन तेजी से घटने लगता है (Weight Loss शुरू हो जाता है)। विशेष रूप से एंग्जायटी (Anxiety) की स्थिति में शरीर में इस प्रकार के शारीरिक और जैविक बदलाव प्रमुखता से देखे जाते हैं।
आमतौर पर इंसान को कैसे पता चलेगा कि वह सामान्य तौर पर सचेत (Health Conscious) है या फिर साइबरकॉन्ड्रिया का शिकार हो चुका है? इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं?
जो व्यक्ति वास्तव में हेल्थ कॉन्शियस (स्वास्थ्य के प्रति जागरूक) होते हैं, वे समय-समय पर केवल वैध और विश्वसनीय स्रोतों (Credible Sources) से ही स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां लेते हैं। वे इंटरनेट पर घंटों-घंटों बैठकर लक्षणों को सर्च नहीं करते। इसके अलावा, वे चिकित्सा विज्ञान द्वारा प्रमाणित तरीकों जैसे- रूटीन चेकअप, समय पर वैक्सीनेशन और एक बेहतर लाइफस्टाइल (जिसमें सही डाइट, एक्सरसाइज और पर्याप्त नींद शामिल है) पर ध्यान देते हैं। साथ ही, वे अपने डॉक्टर या कंसलटेंट द्वारा दी गई सलाह को तार्किक रूप से स्वीकार करते हैं। इस संतुलित व्यवहार के कारण बार-बार बीमारी के बारे में सोचने की नौबत नहीं आती और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, सामाजिक रिश्ते तथा व्यावसायिक जीवन (Occupational Life) पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता।
इसके विपरीत, 'साइबरकॉन्ड्रिया' से पीड़ित व्यक्ति किसी एक ही लक्षण को गूगल या एआई (AI) पर बार-बार सर्च करता है। वह लगातार अलग-अलग वेबसाइट्स और अलग-अलग एआई टूल्स पर उसी जानकारी को खंगालता रहता है, जिससे यह आदत एक 'रिपीटेटिव पैटर्न' (एक ही काम को बार-बार दोहराना) बन जाती है। ऐसे लोग छोटी-छोटी शारीरिक समस्याओं को बहुत बड़ी और गंभीर बीमारियों से जोड़कर देखने लगते हैं।
उदाहरण के लिए यदि उन्हें छोटा-मोटा सिरदर्द (Headache) है, तो वे सोचने लगेंगे कि यह कोई ब्रेन ट्यूमर है, या फिर दिल की धड़कन थोड़ी सी बढ़ने पर उसे सीधे हार्ट अटैक मान लेते हैं। उनका पूरा ध्यान हमेशा 'वर्स्ट-केस सिनेरियो' (सबसे खराब स्थिति) पर जाकर ही केंद्रित (Focus) होता है। हैरानी वाली बात यह है कि मेडिकल रिपोर्ट्स नॉर्मल आने के बाद भी उन्हें तसल्ली नहीं होती , उन्हें लगता है कि डॉक्टर से कोई चूक हो गई है या उन्हें सही डायग्नोसिस नहीं मिल पा रहा है। इसी वजह से वे 'डॉक्टर शॉपिंग' (बार-बार डॉक्टर और लैब बदलना) करने लगते हैं। इस मानसिक स्थिति के कारण मरीजों में चिड़चिड़ापन, नींद की कमी और लोगों से बातचीत कम कर देना (Social Isolation) जैसे गंभीर व्यावहारिक बदलाव शुरू हो जाते हैं।
आपके क्लिनिक या अस्पताल में पिछले कुछ समय में ऐसे मामलों में कितनी बढ़ोतरी देखी गई है?
ऐसे मामलों में वाकई बहुत ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है। खास तौर पर 'यंग एडल्ट्स' (युवा मरीज) जो आईटी, टेक फील्ड या अन्य सेक्टर्स में काम करने वाले वर्किंग प्रोफेशनल्स हैं, वे इसके सबसे आसान शिकार बन रहे हैं। ये लोग अपने शारीरिक लक्षणों (Symptoms) को महसूस करते ही तुरंत एआई टूल्स या इंटरनेट सर्च इंजन के माध्यम से खुद ही डायग्नोस करने का प्रयास करते हैं। चूंकि तकनीक के पास क्लीनिकल समझ नहीं होती, इसलिए जब उन्हें इंटरनेट से कोई सटीक या सही जवाब (Proper Response) नहीं मिलता, या फिर वे सर्च के परिणामों में अपनी बीमारी का सही निदान (Diagnosis) नहीं ढूंढ पाते हैं, तो उनका मानसिक तनाव और अधिक बढ़ जाता है। परिणामत यह होता है वे पहले से कहीं ज्यादा चिंतित (Anxious) हो जाते हैं और गहरी मानसिक परेशानी में घिर जाते हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स और एक असली डॉक्टर के डायग्नोसिस (जांच करने के तरीके) में सबसे बड़ा बुनियादी फर्क क्या है?
एआई (AI) से जो डायग्नोसिस होते हैं, वे पूरी तरह से सिम्पटम-बेस्ड (Symptom-based यानी लक्षणों पर आधारित) होते हैं। एआई का डायग्नोसिस एक तय एल्गोरिदम और पैटर्न पर काम करता है। अगर मरीज के बताए लक्षण उस पैटर्न से मैच करते हैं, तो वह संभावित डायग्नोसिस की एक सूची सामने रख देता है। लेकिन वास्तव में, एक असली डॉक्टर जो डायग्नोसिस करता है, उसकी पूरी एक प्रामाणिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया (Proven Process) होती है। इसमें मरीज की मेडिकल हिस्ट्री ट्रैक करना (History Tracking), फिजिकल एग्जामिनेशन (शारीरिक जांच करना जैसे- नब्ज देखना, छूकर जांचना), जरूरी इन्वेस्टिगेशन्स (लैब टेस्ट और स्कैन), और समय-समय पर फॉलो-अप्स (Follow-ups) शामिल हैं। इसके अलावा, एक डॉक्टर मरीज की पर्सनैलिटी, उसके सोशल-कल्चरल कॉन्टेक्स्ट (सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश), उसके बीमारी पेश करने के तरीके (Presentations) और 'ए-टिपिकल प्रेजेंटेशन्स' (असामान्य लक्षण) को भी गहराई से समझता है। डॉक्टर इन सभी पहलुओं को अपने क्लीनिकल जजमेंट (Clinical Judgment) की कसौटी पर कसने के बाद ही किसी अंतिम डायग्नोसिस पर पहुंचता है। यही कारण है कि कई बार एआई द्वारा बताया गया संभावित डायग्नोसिस पूरी तरह से अप्रासंगिक (Not Relevant) साबित होता है। एआई के डायग्नोसिस में कई बार महत्वपूर्ण चीजें मिस (Chances of Error) भी हो जाती हैं, या फिर कई बार एक बेहद सामान्य और साधारण सी शारीरिक समस्या को भी एआई बहुत ज्यादा सीरियस (गंभीर) बनाकर पेश कर देता है।
अगर किसी मरीज की सभी मेडिकल रिपोर्ट्स नॉर्मल आ चुकी हैं, फिर भी वह संतुष्ट नहीं है, तो एक मनोचिकित्सक के तौर पर आप उसका इलाज या काउंसलिंग कैसे करते हैं?
देखिए, ऐसे मामले जहां मरीज की सभी मेडिकल रिपोर्ट्स नॉर्मल हैं, फिर भी वह संतुष्ट नहीं है, तो सबसे पहले हमें उनके असेसमेंट (Assessment - मानसिक मूल्यांकन) पर ध्यान देना होता है। हमें यह देखना होता है कि मरीज जो भी बातें बता रहा है, या जिन लक्षणों के लिए वह बार-बार मेडिकल जाँचें करवा रहा है या डॉक्टरों के पास जा रहा है, वे तार्किक (Relevant) हैं या नहीं। इस स्थिति में मरीज का इवैल्यूएशन (Evaluation) एंग्जायटी स्पेक्ट्रम के तहत किया जाता है, क्योंकि ये लक्षण इलनेस, एंग्जायटी (Illness Anxiety), हेल्थ एंग्जायटी या 'साइबरकॉन्ड्रिया' की तरफ इशारा करते हैं। इसलिए सबसे पहले इवैल्यूएशन बहुत जरूरी है, जिसके बाद मरीज का सही डायग्नोसिस एस्टेब्लिश (निदान निश्चित) किया जाता है।
इसके बाद, मरीज के लिए एक स्पेसिफिक ट्रीटमेंट या मैनेजमेंट प्लान डिसाइड (विशेष उपचार योजना तय) किया जाता है। इस मैनेजमेंट में कुछ थेरेपीज, विशेषकर कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT - Cognitive Behavior Therapy) एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके साथ ही, मरीज को इंटरनेट और एआई (AI) के इस्तेमाल पर बाउंड्रीज सेट करना (सीमित उपयोग करना) सिखाया जाता है। इन चीजों से मरीज को जो मानसिक तनाव हो रहा है, उसे दूर करने के लिए स्ट्रेस मैनेजमेंट (Stress Management) और एक बेहतर लाइफस्टाइल मैनेजमेंट सिखाया जाता है। यदि आवश्यकता हो, तो मरीज को फार्माकोथेरेपी (Pharmacotherapy) के तहत जरूरी दवाइयां भी दी जाती हैं।