US-Israel-Iran War: अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध खींचता जा रहा है। इसके चलते ना सिर्फ अमेरिका, इजराइल और ईरान की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि दुनिया के ज्यादातर मुल्कों में तेल, गैस समेत खुदरा वस्तुओं की महंगाई बढ़ रही है। पर्यावरण को भी गंभीर स्तर पर नुकसान पहुंच रहा है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
US-Israel-Iran War 2026: अमेरिका और ईरान के बीच 24 दिनों से चल रहे संघर्ष के चलते जानमाल की काफी तबाही हो रही है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के अनुसार ईरान के हमलों में 800 मिलियन डॉलर का सैन्य ढांचा तबाह हो चुका है। इस युद्ध के चलते इतना ज्यादा खर्च हो रहा है कि पेंटागन ने पिछले सप्ताह अमेरिकी कांग्रेस से 200 अरब डॉलर की मांग की है। अमेरिका समेत दुनिया के मुल्कों में महंगाई दर में भी इजाफा दर्ज किया जा रहा है।
इस युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसलिए भी असर पड़ रहा है क्योंकि इजराइल और ईरान दोनों ही एक-दूसरे के गैस और तेल के उत्पादन के ठिकानों पर भी लगातार हमले कर रहे हैं। इन हमलों के चलते तेल और गैस के उत्पादन पर भी रोक लगाना पड़ रहा है। इसके अलावा ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते तेल और गैस की सप्लाई पर भी रोक लगा रखी है। यही वजह है कि इस युद्ध का सिर्फ अमेरिका, ईरान और इजराइल की अर्थव्यवस्था पर ही नहीं बल्कि दुनिया की इकोनॉमी पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के बारे में सीएसआईएस की रिपोर्ट बताती है कि यह युद्ध केवल सैन्य टकराव नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक, रणनीतिक और वैश्विक संकट में बदल चुका है। इस रिपोर्ट में खास तौर पर तीन स्तरों पर नुकसान को समझाया गया है- सैन्य लागत, वैश्विक आर्थिक प्रभाव और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक परिणाम।
सीएसआईएस के अनुसार इस युद्ध की शुरुआत से ही अमेरिका पर भारी सैन्य खर्च का दबाव पड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि शुरुआती 100 घंटों में ही अमेरिका को लगभग 3.7 अरब डॉलर खर्च करने पड़े, यानी करीब 900 मिलियन डॉलर प्रतिदिन। इसके अलावा युद्ध के पहले 6 दिनों में कुल लागत लगभग 12.7 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जिसमें सिर्फ हथियार पर ही 11 अरब डॉलर से अधिक खर्च हो गया। अगर दोनों खर्च को जोड़ दिया जाए तो अमेरिका को ईरान के साथ युद्ध चलाने के लिए लगभग 2-3 अरब डॉलर हर रोज खर्च करना पड़ रहा है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस युद्ध की लागत इतनी तेजी से इसलिए बढ़ रही है क्योंकि इसमें आधुनिक हथियारों, जैसे प्रिसीजन-गाइडेड मिसाइल, ड्रोन और स्टील्थ बॉम्बर्स का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है। ये हथियार अत्यधिक महंगे होते हैं और तेजी से खर्च होते हैं, जिससे युद्ध की लागत पारंपरिक जमीनी युद्ध की तुलना में कहीं अधिक हो जाती है। इस युद्ध में अब तक हुई बर्बादी को केवल बम, मिसाइल और सैनिक खर्च तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसमें तेल बाजार, व्यापार, इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण और मानव जीवन से जुड़ी व्यापक क्षति भी शामिल है।
सबसे पहले यदि हम सीधे सैन्य खर्च की बात करें, तो अमेरिका इस युद्ध में हर दिन भारी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। विभिन्न आकलनों के अनुसार, शुरुआती कुछ दिनों में ही अमेरिका ने लगभग 10–12 अरब डॉलर खर्च कर दिए थे। यदि इसे भारतीय मुद्रा में बदलें, तो यह करीब 90,000 करोड़ से 1 लाख करोड़ रुपये के बीच बैठता है। युद्ध आगे बढ़ने के साथ ही साथ यह खर्च भी बढ़ता जा रहा है। वर्तमान अनुमान के अनुसार, अमेरिका प्रतिदिन लगभग 2-3 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। अभी युद्ध के 24 दिन गुजर चुके हैं। इसका मतलब 48-72 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। यह केवल हथियार, ईंधन, सैनिकों की तैनाती और सैन्य ऑपरेशन का खर्च है। युद्ध में हो रही तबाही के पुनर्निर्माण पर कितना खर्च होगा, यह तो युद्ध थमने के बाद ही आकलन लगाया जा सकेगा।
ईरान पर पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए हैं जिसके चलते उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर स्थिति में थी। युद्ध के कारण उसकी स्थिति और बिगड़ेगी। इजरायल ने ईरान के साउथ पार्स समेत कई आर्थिक केंद्रों पर हमले किए हैं। इसके अलावे ईरान के सैन्य ठिकानों और शहरी इलाकों पर हमलों से उसे भारी नुकसान हुआ है। ईरान के रेड क्रिसेंट के प्रमुख पीरहोसिन कोलिवंद ने कहा कि नवीनतम जमीनी आकलन के आधार पर क्षतिग्रस्त नागरिक स्थलों की कुल संख्या 81,365 तक पहुंच चुकी है। यह बताया जा रहा है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा नुकसान को जोड़ दें तो ईरान को अब तक सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है।
ईरान की आय का मुख्य स्रोत तेल निर्यात है। युद्ध के कारण यदि तेल उत्पादन या निर्यात बाधित होता है, तो देश की आय में भारी गिरावट आती है। इससे न केवल सरकार की वित्तीय स्थिति बिगड़ती है, बल्कि आम जनता को भी महंगाई, बेरोजगारी और आवश्यक वस्तुओं की कमी का सामना करना पड़ता है। ईरान के ऊर्जा मंत्री अब्बास अलीबादी ने कहा, 'संयुक्त राज्य अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए आतंकवादी और साइबर हमलों के बाद देश के महत्वपूर्ण जल और बिजली के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।'
ईरानी रेड क्रिसेंट मानवीय संगठन के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-इजराइल के ईरान पर लगातार हमले से कार्बन डाइऑक्साइड CO₂ का उत्सर्जन हो रहा है, जो लंबी अवधि तक देश के लिए परेशानी का सबस बनेगा। यह युद्ध पर्यावरण के लिए एक आपदा है, क्योंकि यह 84 देशों के संयुक्त रूप से वैश्विक कार्बन बजट को खत्म करने की तुलना में कहीं अधिक तेजी से वैश्विक कार्बन बजट को समाप्त कर रहा है। पहले 14 दिनों में ही 50 लाख टन CO₂ उत्सर्जन हुआ है। पहले 14 दिनों में विमानों, सहायक जहाजों और वाहनों द्वारा 150 मिलियन से 270 मिलियन लीटर ईंधन की खपत हुई, जिससे कुल 529,000 टन CO₂ का उत्सर्जन हुआ।
मध्य पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। फारस की खाड़ी में स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते दुनिया को कुल 20 फीसदी ऊर्जा आपूर्ति कराई जाती है। युद्ध के चलते पिछले 24 दिनों से जारी हमलों और प्रतिबंधों के कारण शिपिंग लगभग ठप हो गई। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, समुद्री यातायात में 95% तक गिरावट आई है। वहीं एक और अनुमान के अनुसार, 7-10 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) तेल उत्पादन प्रभावित हुआ। कुछ आकलनों में इसे 'इतिहास का सबसे बड़ा सप्लाई शॉक' तक बताया गया है।
अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में तेज़ और असामान्य वृद्धि देखी गई है। युद्ध की शुरुआत के तुरंत बाद ही तेल कीमतों में 10–15% की शुरुआती बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। इसके बाद जैसे-जैसे संघर्ष बढ़ा और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा आई, कीमतों में तेजी और बढ़ गई। शुरुआती हफ्तों में तेल की कीमतें 30% तक बढ़ गईं। कुछ आकलनों के अनुसार, अब तक तेल की कीमतों में वैश्विक स्तर पर कुल बढ़ोतरी 40% से अधिक हो चुकी है। वहीं पाकिस्तान में इस युद्ध के चलते 200 फीसदी तक की बढ़ गई। वहां की सरकार ने हाई-ऑक्टेन फ्यूल पर शुल्क को 100 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये प्रति लीटर करने का फैसला किया है। पिछले दिनों भारत में इसमें 2-2.35 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई थी। पाकिस्तान अपने पेट्रोलियम आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मिडिल ईस्ट से मंगाता है।