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Myanmar में लोकतंत्र बनाम सेना: सैन्य सरकार बार-बार Aung San Suu Kyi को क्यों भेज देती है जेल ? जानिए भारत से क्या रहा है उनका नाता

Myanmar Aung San Suu Kyi: म्यांमार की मानवाधिकार कार्यकर्ता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) की सजा में एक-छठा हिस्सा कम किया गया। किस आरोप में उन्हें जेल भेजा गया था? वह कब और किन विवादों में घिरी? आइए दुनियाभर में लोकप्रिय नेता आंग सान सू की के बारे में जानते हैं।

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Apr 18, 2026
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Photo: IANS)

Myanmar Aung San Suu kyi Life Story: म्यांमार की सैन्य सरकार ने लोकप्रिय नेता आंग सान सू (Aung San Suu Kyi) की सजा एक-छठा हिस्सा कम कम दिया है। 80 वर्षीय सू की 1 फरवरी 2021 से ही हिरासत में हैं। सू की 27 वर्ष की जेल की साज काट रही है। वह घर में नजरबंद हैं। वह म्यांमार में मिन आंग ह्लाइंग द्वारा किए गए सैन्य तख्तापलट के बाद से ही जेल में हैं। उनपर भ्रष्टाचार, कोविड नियमों का उल्लंघन, चुनावी धोखाधड़ी और राज्य गोपनीयता कानून का उल्लंघन के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। उनके सहयोगियों का कहना है कि उन पर लगाए गए कई आरोप राजनीतिक से प्रेरित थे, ताकि उन्हें सत्ता से दूर रखा जा सके।

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Aung San Suu Kyi Story: बची हुई सजा कहां काटेंगी सू की?

रॉयटर्स न्यूज एजेंसी के अनुसार, म्यांमार सरकार ने पूर्व नेता सू की की सजा में कमी की है। सजा में एक-छठा हिस्सा घटा दिया गया है। हालांकि, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता को अपनी बाकी सजा घर में नजरबंदी के तहत काटने की अनुमति दी जाएगी या नहीं, इस बारे में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है।

सू की समेत 4,335 कैदियों की सजा में कमी

म्यांमार के नए राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग (Min Aung Hlaing) ने 4,335 कैदियों की सजा में माफी को मंजूरी दी है। राष्ट्रपति ने पिछले छह महीनों में तीसरी बार सजा में माफी की घोषणा की है। म्यांमार में आमतौर पर हर साल जनवरी में स्वतंत्रता दिवस और अप्रैल में नववर्ष के अवसर पर इस तरह की माफी दी जाती है।

मिन आंग ह्लाइंग ने सू की सरकार का किया था तख्तापलट

मिन आंग ह्लाइंग ने 2021 में सू की के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ सैन्य तख्तापलट किया था, जिससे देश में उथल-पुथल मच गई। मिन आंग को 3 अप्रैल 2026 को हुए चुनावों में राष्ट्रपति चुना गया। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यहां हुए चुनाव की काफी आलोचना की गई। इस चुनाव को न तो स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष बताया गया।

Aung San Suu kyi's relation with India: सू का भारत से गहरा नाता

आंग सान सू की का जन्म म्यांमार का जन्म देश के एक राजनीतिक परिवार में 19 जून 1945 को म्यांमार की राजधानी यांगून में हुआ था। उनके पिता आंग सान (Aung San) ने म्यांमार की आजादी की लड़ाई को नेतृत्व प्रदान किया। उन्हें देश का 'राष्ट्रपिता' माना जाता है। सू की जब मात्र दो वर्ष की थीं, तब उनके पिता की हत्या कर दी गई। उनकी माता खिन क्यी (Khin Kyi) भी एक सक्रिय राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता थीं। खिन क्यी 1960 में भारत में म्यांमार की राजदूत नियुक्त हुईं। मां की वजह से सू की को भारत में कुछ वर्ष बिताने का अवसर मिला। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कॉलेज लेडी श्री राम कॉलेज से राजनीति शास्त्र में स्नातक की पढ़ाई की।

ब्रिटिश विद्वान से रचाई शादी, दो बेटों की बनी मां

इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (University of Oxford) में दाखिला लिया। यहां से 1967 में उन्होंने दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में कार्य किया। इसी दौरान उनकी शादी माइकल एरिस से हुई। माइकल एक ब्रिटिश विद्वान थे। उन्होंने दो पुत्र पैदा हुए। हालांकि बाद में उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से 1985 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनका पारिवारिक जीवन सामान्य गति से बढ़ रहा था, लेकिन 1988 में उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई। म्यांमार के नए राजनीतिक हालात ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल कर रख दिया।

सैन्य शासन के खिलाफ लिया मोर्चा, सू की ने नई पार्टी का किया गठन

म्यांमार में 1988 में आंग सान सू की ने सैन्य शासन के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन शुरू किया। उसी समय सू की अपनी बीमार माँ की देखभाल के लिए म्यांमार लौटी थीं। देश की स्थिति को देखते हुए उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्णय लिया। उन्होंने लोकतंत्र की स्थापना और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया। इसी दौरान उन्होंने नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) की स्थापना की।

महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरणा पाकर करती रहीं आंदोलन

सू की ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर अहिंसक आंदोलन का मार्ग अपनाया। उनकी लोकप्रियता देश और दुनिया में बहुत तेजी से फैलती गई। उनके नेतृत्व में 1990 के आम चुनावों में उनकी पार्टी ने भारी जीत हासिल की। लेकिन सेना ने सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया और सू की को नजरबंद कर दिया गया। उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक नजरबंदी झेली।

शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलनों के लिए मिला नोबेल शांति पुरस्कार

उनके इस शांतिपूर्ण संघर्ष और लोकतंत्र के प्रति समर्पण के लिए उन्हें 1991 में नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनके अहिंसक आंदोलनों और मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता पर मुहर लगने जैसा था। सेना की सरकार का अत्याचार की पराकाष्ठा यह रही कि उन्हें पुरस्कार समारोह में जाने नहीं दिया गया। उनके बदले उनके परिवार के सदस्यों ने यह पुरस्कार जाकर ग्रहण किया।

2015 में उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय चुनाव में फिर से मारी बाजी

वर्ष 2010 के बाद म्यांमार में राजनीतिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू हुई और इस बीच सू की को रिहा कर दिया गया। उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में जमकर भाग लेना शुरू कर दिया। उनके नेतृत्व में 2015 के चुनावों में उनकी पार्टी को फिर से भारी जीत मिली। वे देश की वास्तविक नेता बनकर उभरीं। हालांकि संवैधानिक प्रतिबंधों के कारण वे राष्ट्रपति नहीं बन सकीं। उन्होंने “स्टेट काउंसलर” के रूप में कार्य किया, जो प्रधानमंत्री के समान पद था।

इस वजह से छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा नुकसान

हालांकि, उनके राजनीतिक जीवन का यह दौर बहुत ज्यादा विवादों से भी भरा रहा। रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर उनकी चुप्पी और सरकार की नीतियों के समर्थन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया। कई देशों और संगठनों ने उनकी आलोचना की और उन पर मानवाधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया। इससे उनकी पहले की लोकतांत्रिक छवि में दरार पड़ गई।

सेना ने तख्तापलट कर सू की को किया गिरफ्तार

2021 में म्यांमार की सेना ने फिर से तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली और सू की को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें विभिन्न आरोपों में 27 वर्ष की सजा सुनाई गई। यह घटना म्यांमार में लोकतंत्र की स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है और यह दर्शाती है कि देश अभी भी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है।

आंग सान सू की का जीवन विरोधाभासों से भरा हुआ है। एक ओर वे लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली नायिका रही हैं, तो दूसरी ओर उनके कुछ निर्णयों ने उन्हें आलोचना के केंद्र में ला खड़ा किया। इन सबके बावजूद यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि उन्होंने म्यांमार की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है और लाखों लोगों को लोकतंत्र के लिए प्रेरित किया।

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