Bengal Election 2026: बंगाल चुनाव में एक मां की खामोशी बन गई घर-घर का दर्द, Just for Justice के लिए हर महिला-हर युवती ने दिया साथ, ताकि हर घर की बेटी रह सके सुरक्षित, बीजेपी या कोई भी पार्टी होती, इस बार बदलाव संभव था, बंगालवासियों का छलका दर्द... सुरक्षित नहीं थी हमारी बेटियां, अब बदलाव की उम्मीद और वक्त की जरूरत थी सत्ता का ये परिवर्तन... नहीं किया काम और जरूरत पड़ी तो इसे भी बदल देंगे... अब और नहीं सहेंगे... अब चलेगी हमारी सरकार... पश्चिमी बंगाल में खुशी और आक्रोश साथ-साथ
Bengal Election 2026: बंगाल में भाजपा की जीत और अपने ही घर में ममता बनर्जी की हार महज एक चुनावी कहानी नहीं है। यह एक खामोश मां की पुकार है। चुनाव से पहले जब वो सड़कों पर उतरी, तो उसके हाथ खाली थे, गिनती के लोगों के साथ जब वो कार से उतरी, सफेद साड़ी में लिपटी मायूस मुरझाया चेहरा… जो उनके बेइंतहा दर्द की कहानी कह रहा था। सफेद साड़ी पर काली धारियां और उनके बीच-बीच में 'Just for Abhaya'… Just for Justice…कार से उतरते ही जब वो कॉलोनी की सड़कों पर बढ़ीं तो उस हर महिला की आंखों से आंसू टपक रहे थे, जो उन्हें देखती जा रही थी…, 80 साल की बूढ़ी औरत हो या 20-22 साल की युवती, हर किसी ने जैसे उन्हें स्वीकार किया कि उन्हें न्याय मिलकर रहेगा। नि: शब्द औरतों के आंसू बिना कोई वादा किए जैसे आश्वस्त कर रहे थे, सब अच्छा होगा। बिना किसी नारेबाजी के न्याय की आस में मैदान में उतरी किस्मत की मारी इस मां का साथ देने जैसे हर औरत उठकर साथ चल पड़ी थी। ये अकेले अभया की मां रत्ना देवनाथ के दर्द की कहानी नहीं थी… बल्कि उस हर महिला की आवाज थी, जिन्होने दीदी के राज में भी महिलाओं की दयनीय स्थिति के खिलाफ जैसे ठान लिया था कि…चलो अब हमारी बारी है… अब सरकार हमारी चलेगी…अब अन्याय और नहीं…।
दूसरे मुद्दों से गहरी थी महिला असुरक्षा की चोट...सबसे अहम और बड़ा मुद्दा ही ममता दीदी की अपने ही गढ़ में 15 साल की सियासत को चूर-चूर कर गया। patrika.com ने जब वहां की महिलाओं से उनका हाल जाना तो तस्वीर साफ हो गई, महिला शक्ति को कोई हरा सकता है न कोई दबा सकता है… अगर उसने ठान लिया तो अब दुनिया इधर से उधर हो जाए, वो मुश्किलों से निपट कर रहेगी, न्याय पाकर रहेगी।, हालात बदलकर रहेगी... पढे़ं संजना कुमार की खास रिपोर्ट...
बंगाल में कैसे दिखा महिला सशक्तिकरण: तीन महिलाओं की ऐतिहासिक जीत का उदाहरण बनी बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की ये तस्वीर…
रत्ना देवनाथ आरजीकर मेडिकल कॉलेज में रेप और हत्या का शिकार हुई जूनियर डॉक्टर की मां है। ममता बनर्जी के सीएम रहते उनकी बेटी के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। लेकिन अपने ही घर और ममता दीदी के राज में अपनी बेटी के साथ हुए दर्द और उसे खोने का जख्म भूलकर वो न्याय के लिए सड़कों पर भटकती रही, प्रदर्शन करती रही। खुद को भूल गई कि ममता दीदी न्याय जरूर दिलाएंगी।
स्थानीय निवासी संजीता रॉय बताती हैं कि रत्ना दीदी ने मुंह धोना छोड़ दिया था, बालों में कंघी तक नहीं करती थी। उन्होंने कसम खा रखी थी कि जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक उनका आचरण नहीं बदलेगा। वो ऐसी ही रहेंगी। लेकिन न्याय की आस में वो दर-दर भटकती हुई अब चुनाव में उतरीं। अगर भाजपा नहीं होती, तो कोई और होता, बात पार्टी की नहीं है। लेकिन अब उन्हें न्याय की उम्मीद भी है कि उनके राज्य में रहने वाली हर बेटी की सुरक्षित रहेगी। किसी के साथ वो नहीं होगा जो उनकी बेटी और फिर उन्होंने भी भोगा। हर किसी को न्याय मिलेगा।
बता दें कि बीजेपी ने इस मां को उत्तर 24 परगना जिले की पानीहाटी विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा था। जहां से वे TMC उम्मीद्वार तीर्थंकर घोष को 28,836 वोटों के भारी अंतर से हराकर विजेता बनी हैं। यहां तक कि अन्य पार्टियों में CPI(M) के उम्मीद्वार कलतन दासगुप्ता भी उनसे काफी पीछे छूट गए। कहना होगा कि यह एक चुनावी नहीं बल्कि नैतिकता की लड़ाई है, जो अब बंगाल में शुरू हो चुकी है और जीत की उम्मीद लेकर बीजेपी के साथ आगे भी बढ़ रही है।
रेखा महापात्रा भी एक ऐसा ही नाम है, संदेशखाली गैंगरेप की पीडि़ता को बीजेपी ने टिकट दिया और हिलगंज से ये चुनावी मैदान में उतारा। 2024 के चुनाव में भी बीजेपी ने इन्हें मैदान में उतारा था लेकिन तब वे जीत नहीं पाई थीं। अब TMC के आनंद सरकार को 5421 से हराकर चुनावी मैदान में बाजी मार चुकी हैं।
दूसरों के घरों में बर्तन धोकर घर-परिवार का गुजर-बसर करने वाली कालिता माजी को भी बीजेपी ने ऑसग्राम से चुनावी रण में उतारा। जीत पर खुशी जाहिर करते हुए वे कहती हैं कि अब दूसरे कमजोर लोगों के लिए आवाज उठाएंगी।
बता दें कि बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन ने 206 सीट पर बड़ी जीत हासिल की है। जबकि ममता बनर्जी की TMC केवल 81 सीटों पर सिमट कर रह गई। 15 साल से लोग इन्हें झेल रहे थे, इनके रसूख वालों की जिल्लत और दरिंदगी झेल रहे थे। यह patrika.com नहीं बल्कि वहां की महिलाएं कह रही हैं। जो जश्न मना रही हैं कि 1947 में भारत आजाद हुआ था। लेकिन उन्हें आजादी अब मिली है। वे खुलकर सांस लेने और गर्व से सुनहरे भविष्य की तस्वीर गढ़ रहे हैं। महिला शक्ति की इस तस्वीर ने दिखा दिया है कि अगर अब उन्हें आगे बढ़ने का मौका मिला है, तो वे इसे गंवाएंगी नहीं, भुनाएंगी… अपनी शक्ति को पहचानने वाली इस शक्ति का संदेश यह भी है नई सरकार से बहुत उम्मीदें हैं… क्योंकि परिवर्तन जरूरी था, तानाशाही हम देख चुके थे और अब मौका दे रहे हैं, बेहतर लोकतंत्र का… अगर नई सरकार से नहीं बना काम… जरूरत पड़ी तो इसे भी बदल देंगे… लेकिन अब और नहीं सहेंगे नहीं खोएंगे आत्मसम्मान…
वेस्ट बंगाल पूरा खत्म हो चुका था, इसलिए ये बदलाव होना बहुत जरूरी था, इससे पहले लेफ्ट फ्रंट सरकार थी। तब हमें ममता दीदी से उम्मीद जागी, हमने बदलाव के लिए उन्हें वोट दिया था। लेकिन उन्होंने तो पश्चिमी बंगाल को पूरी तरह से खत्म कर दिया। अब बीजेपी को मौका दिया है, क्योंकि उम्मीद है कि तस्वीर जरूर बदलेगी। महिलाएं खुलकर जी सकेंगी। अभी शाम होने के बाद घर से निकलने में डरते थे। लेकिन अब हालात बदल जाएंगे।
-संजीता रॉय(30), क्लासिकल डांस टीचर, पश्चिमी बंगाल
मैं बहुत खुश हूं कि आखिरकार हमारे यहां सत्ता परिवर्तन हुआ। यह वक्त की जरूरत थी। नई सरकार से सबसे बड़ी उम्मीद महिला सुरक्षा की है, ताकि मेरी बेटी-नातिन और मेरे स्टेट की बच्चियां सुरक्षित रहें। जॉब तो यहां बिल्कुल नहीं है। ज्यादातर बच्चे घर-परिवार से दूर जाकर काम कर रहे हैं। तो कई परिवार अपना ही घर छोड़कर दूसरे राज्यों और देशों में जाने को मजबूर हुए और चले गए। बच्चियों का ब्राइट फ्यूचर चाहती हूं। पार्टी के बहुत सिंडिकेट बन गए थे। जनता बहुत परेशान थी। अब तक जो हुआ सह लिया। अब नई सरकार ने बहुत उम्मीदें हैं। अगर ये सरकार भी कुछ नहीं कर पाई, तो इसे भी बदल देंगे।
-तापुषी रॉय(60), हाउस वाइफ, पश्चिमी बंगाल
बहुत अच्छा हुआ। हमें उम्मीद थी कि इस बार सत्ता परिवर्तन होगा। लेकिन ममता दीदी ऐसे हारेंगी हमें यह पता नहीं था। लेकिन उनकी हार जरूरी थी। वो महिला होकर महिला सुरक्षा को लगातार नजरअंदाज कर रही थीं। महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल बन पड़ा था। पहली बार बेफिक्र और बिना किसी दबाव के वोटिंग की है। अपने गांव में तो वोट भी डर-डर कर डाले। लेकिन अब उम्मीद सब अच्छा होगा। हम बहुत खुश हैं नई सरकार बनी।
-सविता मंडल(41), हाउस वाइफ, पश्चिमी बंगाल-