Patrika Special News

Biodegradable Packaging: भिलाई की रूंगटा यूनिवर्सिटी का नवाचार, अब कचरे से बनेंगी बोतलें व डिब्बे, 170 दिन में ऐसे बन जाएगा खाद

Biodegradable Plastic Alternative: भिलाई की रूंगटा यूनिवर्सिटी ने प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। वैज्ञानिकों ने खेतों के जैविक कचरे से ऐसा बायोकॉम्पोजिट विकसित किया है, जो बोतल, ढक्कन और पैकेजिंग सामग्री बनाने के बाद लगभग 170 दिनों में मिट्टी में मिलकर खाद बन सकता है।

2 min read
Apr 09, 2026
भिलाई की रूंगटा यूनिवर्सिटी का नवाचार (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Biodegradable Packaging: प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या के बीच एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। भिलाई स्थित रूंगटा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने खेतों के जैविक कचरे से ऐसा बायोकॉम्पोजिट विकसित किया है, जो प्लास्टिक का सस्ता, मजबूत और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प बन सकता है।

इस तकनीक से बनी बोतलें, ढक्कन और खाद्य पैकेजिंग सामग्री उपयोग के बाद कुछ ही महीनों में मिट्टी में मिलकर खाद बन जाएंगी। फिलहाल यह तकनीक परीक्षण और पायलट चरण में है। वैज्ञानिक इसे जल्द ही व्यावसायिक स्तर पर लाकर बाजार में उतारने की तैयारी में जुटे हैं।

ये भी पढ़ें

Santosh Gupta Cycling Record India: 24 दिनों में पूरे भारत की यात्रा कर बनाया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड, 70 किमी रोज करते हैं सफर, जानें इनकी प्रेरक कहानी

170 दिनों में 90% तक हो जाएगा जैव-अपघटन

इस परियोजना के प्रमुख, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अग्निवेश सिन्हा के अनुसार, यह मटेरियल लगभग 170 दिनों में 90 प्रतिशत से अधिक जैव-अपघटित हो जाता है। यह न केवल मजबूत और लचीला है, बल्कि नमी और ऑक्सीजन को रोकने की क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि इसे खाद्य पैकेजिंग के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प माना जा रहा है।

स्वदेशी संसाधनों से तैयार नई तकनीक

इस नवाचार में बांस के रेशे, इमली के बीज का पाउडर, स्टार्च और बायोपॉलिमर (पीएलए) का उपयोग कर विशेष बायोकॉम्पोजिट तैयार किया गया है। यह पूरी तरह प्राकृतिक और स्वदेशी सामग्री पर आधारित है। इस प्रोजेक्ट को अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की रिसर्च प्रमोशन स्कीम के तहत 32.56 लाख रुपए का अनुदान मिला है, जिससे इसे व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

पैकेजिंग उद्योग के लिए उपयोगी समाधान

यह तकनीक खासतौर पर पैकेजिंग सेक्टर को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। इसके जरिए बोतलों के ढक्कन, छोटे कंटेनर, खाद्य पैकेजिंग सामग्री जैसे उत्पाद आसानी से बनाए जा सकते हैं। खास बात यह है कि इसे मौजूदा इंजेक्शन मोल्डिंग मशीनों पर ही तैयार किया जा सकता है, जिससे उद्योगों को अतिरिक्त निवेश नहीं करना पड़ेगा। इस नवाचार से प्लास्टिक कचरे में कमी आएगी और भूमि व जल प्रदूषण घटेगा।

ये भी पढ़ें

1999 Naxal Attack Chhattisgarh: पहले धमाका, फिर फायरिंग… पुलिस के हौसले के आगे पस्त हो गए थे नक्सली , जानें 1999 की कहानी

Published on:
09 Apr 2026 01:34 pm
Also Read
View All