Patrika Special News

BPD : छोटी-छोटी बातों पर मचती है चिढ़, अक्सर घेर लेती है उदासी तो इसे ना करें इग्नोर, जानिए इस बारे में क्या कहते हैं मनोचिकित्सक

BPD: क्या आप भी बार-बार मूड स्विंग्स और अस्थिर रिश्तों से परेशान हैं? मनोचिकित्सक डॉ. सुनील शर्मा से जानें बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD) के लक्षण और इससे उबरने के तरीके।

12 min read
Apr 25, 2026

BPD : बढ़ते मानसिक तनाव के बीच हम अक्सर छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़े हो जाते हैं या उदास महसूस करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भावनाओं का यह उतार-चढ़ाव किसी गंभीर मानसिक स्थिति का संकेत भी हो सकता है? बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (Border Personality Disorder) एक ऐसी ही स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में असमर्थ महसूस करता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर BPD क्या है और यह कैसे किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करता है।

ये भी पढ़ें

Mental Exhaustion: क्या आपकी बैटरी भी हमेशा लो रहती है? कहीं यह ‘मानसिक थकान’ तो नहीं!

What is BPD : क्या है बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD)?

BPD एक गंभीर मानसिक बीमारी है जो व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और दूसरों से जुड़ने के तरीके को प्रभावित करती है। इसे 'इमोशनल डिसरेगुलेशन' (Emotional Dysregulation) की स्थिति भी कहा जाता है। इसमें व्यक्ति की भावनाओं में इतनी तीव्रता होती है कि उसे संभालना उसके लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

Symptoms of BPD : बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर के प्रमुख लक्षण

  • अकेलेपन का अत्यधिक डर (Fear of Abandonment): BPD से जूझ रहा व्यक्ति हमेशा डरा रहता है कि उसके करीबी उसे छोड़कर चले जाएंगे। इस डर की वजह से वे कभी-कभी सामने वाले को खुद से दूर कर देते हैं।
  • अस्थिर रिश्ते (Unstable Relationships): देखा गया है कि आज के रिश्ते अक्सर 'लव-हेट' के बीच झूलते रहते हैं। एक पल में वे किसी को अपना आदर्श मानते हैं, तो अगले ही पल उन्हें अपना दुश्मन समझने लगते हैं।
  • पहचान का संकट (Unstable Self-Image): ऐसे लोगों को अपनी पहचान को लेकर स्पष्टता नहीं होती। वे अक्सर अपने करियर, लक्ष्य और पसंद-नापसंद को अचानक बदल लेते हैं।
  • आवेगी व्यवहार (Impulsive Behavior): बिना सोचे-समझे पैसे खर्च करना, असुरक्षित ड्राइविंग, नशा करना या अचानक नौकरी छोड़ देना इसके उदाहरण हैं।
  • आत्मघाती विचार (Self-Harm): गंभीर मामलों में व्यक्ति खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है या आत्महत्या के विचार मन में लाता है।
  • मूड में तेजी से बदलाव (Mood swing) : कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक चलने वाला अत्यधिक गुस्सा, चिंता या उदासी।
  • खालीपन का अहसास (Chronic Emptiness): व्यक्ति को हमेशा ऐसा लगता है जैसे उसके जीवन में कुछ कमी है।
  • गुस्से पर नियंत्रण की कमी (Anger issue): छोटी सी बात पर आपा खो देना और बहुत ज्यादा हिंसक या आक्रामक हो जाना।

Causes of BPD: बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर की वजह

BPD का कोई एक निश्चित कारण नहीं है, बल्कि यह कई कारकों का मिश्रण हो सकता है।

  • अनुवांशिकता (Genetics): यदि परिवार में किसी को व्यक्तित्व विकार (Personality Disorder) रहा हो, तो इसका खतरा बढ़ जाता है।
  • मस्तिष्क की संरचना: शोध बताते हैं कि BPD से पीड़ित लोगों के मस्तिष्क के उन हिस्सों में बदलाव होता है जो भावनाओं और आवेगों (Impulses) को नियंत्रित करते हैं।
  • बचपन का वातावरण (Childhood Atmosphere) : बचपन में किसी प्रकार का ट्रॉमा, शारीरिक या मानसिक शोषण, या माता-पिता से अलगाव BPD के विकास में बड़ी भूमिका निभाता है।

डिजिटल दुनिया के चलते भी BPD के बढ़ रहे मरीज

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया ने BPD की चुनौती को और बढ़ा दिया है

  • इंस्टेंट वैलिडेशन ( Instant Validation) : सोशल मीडिया पर लाइक्स और कमेंट्स की कमी व्यक्ति के आत्म-सम्मान को तुरंत गिरा सकती है।
  • तुलना का दौर ( Comparison) : दूसरों की 'परफेक्ट लाइफ' देखकर खालीपन का अहसास और गहरा हो जाता है।
  • साइबर बुलिंग ( Cyber bulling) : आलोचना के प्रति संवेदनशीलता अधिक होने के कारण नकारात्मक कमेंट्स इनके मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।

निदान और उपचार (Diagnosis & Treatment)

अच्छी खबर यह है कि सही समय पर उपचार से BPD के मरीज एक सामान्य और खुशहाल जीवन जी सकते हैं। हालांकि BPD के लिए कोई विशिष्ट दवा नहीं है, लेकिन डॉक्टर अक्सर डिप्रेशन, एंग्जायटी और मूड स्विंग्स को कम करने के लिए दवाएं लिखते हैं।

अपनों की मदद कैसे करें?

  • धैर्य रखें: उनके गुस्से या व्यवहार को व्यक्तिगत रूप से न लें।
  • सुनें और समझें: उन्हें यह महसूस कराएं कि उनकी भावनाएं वैध हैं।
  • मदद के लिए प्रोत्साहित करें: उन्हें किसी अच्छे मनोवैज्ञानिक (Psychologist) या मनोचिकित्सक (Psychiatrist) से मिलने की सलाह दें।

BPD की लिए थेरेपी (Psychotherapy)

DBT (Dialectical Behavior Therapy): यह BPD के लिए सबसे प्रभावी थेरेपी मानी जाती है। यह मरीज को भावनाओं को नियंत्रित करना और रिश्तों में सुधार करना सिखाती है। यह BPD के लिए 'गोल्ड स्टैंडर्ड' उपचार माना जाता है। इसे विशेष रूप से उन लोगों के लिए विकसित किया गया था जो तीव्र भावनाओं और आत्मघाती विचारों से जूझते हैं।

  • माइंडफुलनेस: यह व्यक्ति को वर्तमान क्षण में रहना सिखाती है।
  • इमोशन रेगुलेशन: भावनाओं की तीव्रता को कम करने और उन्हें मैनेज करने की तकनीक।
  • डिस्ट्रेस टॉलरेंस: संकट या तनाव की स्थिति में बिना खुद को नुकसान पहुंचाए उसे झेलने की शक्ति विकसित करना।
  • इंटरपर्सनल इफेक्टिवनेस: दूसरों के साथ स्वस्थ रिश्ते बनाए रखना और अपनी बात स्पष्टता से कहना।

कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT)

CBT (Cognitive Behavioral Therapy) का मुख्य उद्देश्य उन नकारात्मक सोच के पैटर्न (Thought Patterns) को पहचानना और बदलना है जो गलत व्यवहार को जन्म देते हैं। यह नकारात्मक सोच के पैटर्न को बदलने में मदद करता है।

  • यह व्यक्ति को सिखाती है कि कैसे उसके विचार उसकी भावनाओं और कार्यों को प्रभावित करते हैं।
  • यह आत्म-छवि (Self-image) में सुधार करने और समाज में घुलने-मिलने के डर को कम करने में मदद करती है।

स्कीमा-फोकस्ड थेरेपी (Schema focused Therapy)

  • यह थेरेपी मानती है कि BPD के लक्षण बचपन की उन जरूरतों के पूरा न होने से पैदा होते हैं जो व्यक्ति के दिमाग में गहरे 'स्कीमा' (नकारात्मक धारणाएं) बना देते हैं।
  • यह थेरेपी लंबे समय तक चलती है और बचपन के ट्रॉमा को ठीक करने पर ध्यान देती है।
  • इसका लक्ष्य व्यक्ति को 'स्वस्थ वयस्क' (Healthy Adult) मोड में लाना है।

मेंटलाइजेशन-बेस्ड थेरेपी (MBT) : यह एक प्रकार की टॉक थेरेपी है जो व्यक्ति को यह समझने में मदद करती है कि उसके और दूसरों के मन में क्या चल रहा है। BPD में अक्सर व्यक्ति दूसरों के इरादों को गलत समझ लेता है। MBT उसे यह सोचने की क्षमता देती है कि "सामने वाला ऐसा क्यों व्यवहार कर रहा है। इससे रिश्तों में गलतफहमी कम होती है।

ट्रांसफेरेंस-फोक्स्ड साइकोथेरेपी (TFP) : इसमें मरीज और थेरेपिस्ट के बीच के रिश्ते का उपयोग किया जाता है। मरीज अपनी भावनाओं को थेरेपिस्ट पर प्रोजेक्ट करता है, जिससे थेरेपिस्ट को यह समझने में मदद मिलती है कि मरीज असल दुनिया में दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करता है और उसे वहां कैसे सुधारा जाए।

BPD: 18 से 25 वर्ष तक की आयु में सबसे ज्यादा संभावना

BPD के लक्षण सबसे अधिक 18 से 25 वर्ष की आयु के बीच (Early Adulthood) उभरते हैं।

यह वह दौर होता है जब व्यक्ति अपने करियर, पहचान और गंभीर रिश्तों की शुरुआत कर रहा होता है।

अच्छी बात यह है कि उम्र बढ़ने के साथ (30 और 40 के दशक में), कई लोगों में इसके लक्षणों की तीव्रता अपने आप कम होने लगती है।

'चाइल्डहुड ट्रॉमा' के शिकार लोगों में

BPD के सबसे ज्यादा मामले उन व्यक्तियों में मिलते हैं जिनका बचपन संघर्षपूर्ण रहा हो। इसमें शामिल हैं:

  • भावनात्मक उपेक्षा: जब बचपन में बच्चे की भावनाओं को 'नाटक' कहकर खारिज कर दिया गया हो।
  • दुर्व्यवहार: शारीरिक, मानसिक या यौन शोषण का इतिहास।
  • अलगाव: माता-पिता का तलाक या किसी करीबी की मृत्यु का गहरा प्रभाव।

बीपीडी के बारे में लैंगिंक नजरिया

सांख्यिकीय रूप से, अस्पतालों और क्लीनिकों में दर्ज होने वाले BPD के मामलों में से लगभग 75% महिलाएं होती हैं।
महिलाओं में यह स्थिति अक्सर आंतरिक रूप से (जैसे उदासी, आत्म-घृणा, और खुद को नुकसान पहुंचाना) व्यक्त होती है, जिससे वे मदद के लिए डॉक्टर के पास जल्दी पहुंचती हैं।

इसके विपरीत, पुरुषों में BPD अक्सर 'गुस्से' या 'असामाजिक व्यवहार' के पीछे छिप जाता है, जिसे कभी-कभी गलत तरीके से 'एंटी-सोशल डिसऑर्डर' समझ लिया जाता है।

बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD) से जूझ रही लड़कियों में यौन सरोकार (Sexual Concerns) और भावनात्मक उथल-पुथल को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि समाज अक्सर इसे गलत नजरिए से देखता है। एक लड़की के संदर्भ में इसे हम कुछ स्थितियों और उदाहरणों से समझ सकते हैं

  • प्यार और सुरक्षा की तलाश में यौन संबंध (Sex as a Tool for Validation) : BPD से पीड़ित लड़कियों में 'रिजेक्शन' का डर बहुत गहरा होता है। मान लीजिए एक लड़की है जिसे महसूस होता है कि उसका बॉयफ्रेंड उससे दूर जा रहा है। उसे लगता है कि अगर वह शारीरिक संबंध बनाने के लिए मना करेगी, तो वह उसे छोड़ देगा। यहां वह अपनी खुशी के लिए नहीं, बल्कि रिश्ते को बचाने और पार्टनर को खुश रखने के लिए सेक्स का सहारा लेती है। इसे 'Compliance' (दबाव में सहमति) कहा जा सकता है।
  • खालीपन भरने के लिए आवेगी व्यवहार (Impulsivity & Emptiness) : जब मन के भीतर बहुत ज्यादा खालीपन (Chronic Emptiness) महसूस होता है, तो उसे भरने के लिए लड़कियां कभी-कभी शॉर्ट-कट अपनाती हैं। उदाहरण: ब्रेकअप के तुरंत बाद या किसी बड़े झगड़े के बाद, वह लड़की अपनी भावनाओं को सुन्न करने के लिए किसी अजनबी के साथ संबंध बना सकती है। यह उसके लिए प्यार नहीं, बल्कि उस समय के मानसिक दर्द से ध्यान भटकाने (Distraction) का एक तरीका होता है।
  • सेल्फ-वर्थ' (Self-worth) और शारीरिक छवि BPD में लड़कियां अक्सर अपनी बॉडी इमेज को लेकर बहुत असुरक्षित होती हैं। उन्हें लग सकता है कि वे तभी 'वैल्यूएबल' हैं जब कोई उन्हें शारीरिक रूप से पसंद करे। इस वजह से वे ऐसे रिश्तों में भी फंसी रहती हैं जहाँ उनका शोषण (Exploitation) हो रहा होता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे इससे बेहतर की हकदार नहीं हैं।

बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD) से जूझ रही किसी लड़की के संदर्भ में 'पैरा-सुसाइड' (Para-suicide) को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह अक्सर उसके दर्द को बयां करने का एक तरीका होता है।

भावनाओं को 'सुन्न' करने का जरिया (Emotional Regulation) : BPD से पीड़ित लड़कियों को जब बहुत ज्यादा मानसिक दर्द होता है, तो वे उसे संभाल नहीं पातीं। उदाहरण: ब्रेकअप या किसी बड़ी बहस के बाद, वह लड़की अपनी कलाई पर कट लगा सकती है या नींद की गोलियों का ओवरडोज ले सकती है। यहाँ उसका मकसद मरना नहीं है, बल्कि वह चाहती है कि शारीरिक दर्द के जरिए उसका 'मानसिक दर्द' (Mental Pain) दब जाए। वह 'मरना' नहीं चाहती, बस उस 'पल' से छुटकारा चाहती है।

  • मदद के लिए एक पुकार (Cry for Help)

पैरा-सुसाइड अक्सर अपनों का ध्यान खींचने या अपनी गंभीरता को समझाने का एक तरीका बन जाता है।
उदाहरण: अगर उस लड़की को महसूस होता है कि कोई उसकी बात नहीं सुन रहा या उसे अकेला छोड़ रहा है, तो वह ऐसा कोई कदम उठा सकती है जिससे लोग उसके पास आएं। इसे समाज 'इमोशनल ब्लैकमेल' कह देता है, लेकिन मनोवैज्ञानिक इसे 'मदद की पुकार' मानते हैं क्योंकि वह लड़की अपनी भावनाओं को शब्दों में नहीं कह पा रही है।

मनोचिकित्सक डॉ. सुनील शर्मा के साथ पत्रिका की खास बातचीत

अक्सर लोग मूड स्विंग्स को ही BPD समझ लेते हैं, सामान्य मूड स्विंग्स और BPD में बारीक अंतर क्या है?

पत्रिका से बात करते हुए उन्होंने ने कह दरअसल, मूड स्विंग्स और BPD में अंतर को हम तीन पैमानों पर माप सकते हैं: तीव्रता (Intensity), अवधि (Duration) और कारण (Trigger)।

इसे इस तरह समझिए:

तीव्रता और प्रतिक्रिया (Intensity of Reaction): सामान्य मूड स्विंग में अगर आपको गुस्सा आता है, तो आप शायद थोड़ी देर चुप रहेंगे या चिल्ला देंगे। लेकिन BPD में यह गुस्सा 'इमोशनल बवंडर' जैसा होता है। व्यक्ति अपना आपा पूरी तरह खो सकता है, चीजें तोड़ सकता है या खुद को नुकसान पहुंचा सकता है। यहां प्रतिक्रिया, कारण के मुकाबले बहुत ज्यादा बड़ी होती है।

रिश्तों पर असर (Impact on Relationships): सामान्य मूड स्विंग्स से आपके रिश्ते स्थायी रूप से खराब नहीं होते। लोग समझ जाते हैं कि 'आज मूड खराब है'। लेकिन BPD में मूड स्विंग्स रिश्तों को तबाह कर देते हैं। इसमें व्यक्ति एक पल में अपने पार्टनर को दुनिया का सबसे अच्छा इंसान मानता है (Idealization) और अगले ही पल उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझने लगता है (Devaluation)

पहचान और खालीपन (Sense of Self): सामान्य मूड स्विंग्स के दौरान आपको पता होता है कि आप कौन हैं। लेकिन BPD में मूड स्विंग्स के साथ-साथ एक 'क्रॉनिक खालीपन' (Chronic Emptiness) का अहसास होता है। व्यक्ति को लगता है कि उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है।

स्थिरता (Duration): एक सामान्य व्यक्ति का मूड खराब है, तो वह कुछ घंटों या एक दिन में ठीक हो जाता है। BPD में मूड बहुत तेजी से बदलता है। एक ही दिन में कई बार और यह पैटर्न सालों साल चलता रहता है। यह कोई अस्थायी दौर नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है।

क्या BPD को पूरी तरह से 'ठीक' किया जा सकता है, या इसे केवल 'मैनेज' (Manage) किया जा सकता है?

इस सवाल में उन्होनें कहा इसे समझने के लिए हमें 'ठीक होने' (Cure) और 'रिकवरी' (Recovery) के बीच के अंतर को समझना होगा। हां, बिल्कुल BPD को पूरी तरह से 'ठीक' किया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे 'रेमिशन' (Remission) कहा जाता है।

इसकी सच्चाई को हम इन तीन बिंदुओं में देख सकते हैं:

  • लक्षणों का कम होना (Symptom Remission): अध्ययनों से पता चला है कि सही उपचार (खासकर DBT और MBT थेरेपी) के साथ, 10 साल के भीतर लगभग 80% से 90% मरीज इतने बेहतर हो जाते हैं कि उनमें BPD के मुख्य लक्षण (जैसे खुद को नुकसान पहुँचाना या तीव्र गुस्सा) पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। वे अब इस डिसऑर्डर के 'क्राइटेरिया' में फिट नहीं बैठते।
  • 'मैनेज' करना ही 'ठीक' होना है: BPD कोई बुखार नहीं है जो दवा लेने से गायब हो जाए। यह व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। इलाज का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति की भावनाएं खत्म हो जाएंगी, बल्कि इसका मतलब यह है कि व्यक्ति अब अपनी भावनाओं का ड्राइवर खुद बन जाता है। वह भावनाओं के तूफान में बहने के बजाय उन्हें 'मैनेज' करना सीख जाता है। जब कोई मरीज बिना किसी बड़े ड्रामे के अपने रिश्तों को निभाने लगता है, तो हम उसे 'रिकवर्ड' मानते हैं।
  • उम्र के साथ सुधार: यह देखा गया है कि BPD के लक्षण उम्र के साथ (आमतौर पर 35-40 साल के बाद) अपने आप कम होने लगते हैं। परिपक्वता और अनुभव व्यक्ति को अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से संभालने में मदद करते हैं।

समाज में इसे अक्सर 'अटेंशन सीकिंग' व्यवहार कहा जाता है, एक डॉक्टर के तौर पर आप इसे कैसे देखते हैं?

समाज का यह नजरिया न केवल गलत है, बल्कि मरीज के लिए बहुत खतरनाक भी है। एक डॉक्टर के तौर पर मैं इसे 'अटेंशन सीकिंग' नहीं, बल्कि 'कनेक्शन सीकिंग' (Connection Seeking) या 'सपोर्ट सीकिंग' (Support Seeking) कहता हूं।इसे हमें तीन स्तरों पर समझना होगा:

  • असहनीय मानसिक दर्द (Excruciating Pain): कल्पना कीजिए कि किसी के शरीर पर 'थर्ड-डिग्री बर्न' (गहरी जलन) है। उसे ज़रा सा छूने पर भी असहनीय चीख निकलती है। BPD का मरीज 'भावनात्मक' रूप से वैसा ही होता है। उसे छोटा सा रिजेक्शन भी इतना दर्द देता है कि वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता। जब वह चिल्लाता है या खुद को नुकसान पहुंचाता है, तो वह 'अटेंशन' नहीं मांग रहा होता, बल्कि वह उस दर्द को कम करने की कोशिश कर रहा होता है।
  • संवाद की कमी (Lack of Communication Skills): BPD के मरीजों ने अक्सर बचपन से यह सीखा होता है कि सामान्य तरीके से अपनी बात कहने पर उनकी कोई नहीं सुनता। इसलिए, उनका मन अनजाने में यह सीख जाता है कि 'जब तक मैं कुछ बड़ा या खतरनाक नहीं करूँगा, कोई मेरी तकलीफ को गंभीरता से नहीं लेगा।' यह व्यवहार जानबूझकर किया गया नाटक नहीं, बल्कि मदद मांगने का एक बिगड़ा हुआ तरीका है।
  • 'अटेंशन' एक बुनियादी जरूरत है: हम सबको ध्यान और प्यार की जरूरत होती है। यदि कोई अपनी जान जोखिम में डालकर अटेंशन मांग रहा है, तो सोचिए कि वह भीतर से कितना अकेला और टूटा हुआ होगा। क्या हम किसी डूबते हुए इंसान को इसलिए नहीं बचाएंगे क्योंकि वह 'अटेंशन' के लिए हाथ-पैर मार रहा है? बिल्कुल नहीं। उसी तरह, BPD का मरीज भी अपनी भावनाओं के समंदर में डूब रहा होता है।

डेटा कहता है कि महिलाओं में इसके केस ज्यादा हैं, इसके पीछे बायोलॉजिकल कारण ज्यादा हैं या सामाजिक दबाव?
उन्होनें बताया महिलाओं में केस ज्यादा हैं इसके पीछे दो कारण हैं

  • सामाजिक और परिवेशीय दबाव (Social Factors) महिलाओं में इसके अधिक निदान का सबसे बड़ा कारण 'सामाजिक ढांचा' है। महिलाओं को बचपन से अपनी भावनाओं को दबाने या दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव झेलना पड़ता है। साथ ही, महिलाओं में बचपन के ट्रॉमा और शोषण (Physical/Sexual Abuse) के मामले सांख्यिकीय रूप से अधिक पाए जाते हैं, जो BPD का एक मुख्य ट्रिगर है। इसके अलावा, समाज महिलाओं के 'इमोशनल' होने को स्वीकार करता है, इसलिए वे मदद के लिए डॉक्टर तक जल्दी पहुंचती हैं।
  • बायोलॉजिकल कारण (Biological Factors) हार्मोनल बदलाव (जैसे एस्ट्रोजन का उतार-चढ़ाव) भावनाओं के नियमन (Emotion Regulation) को प्रभावित कर सकते हैं। शोध यह भी बताते हैं कि मस्तिष्क का वह हिस्सा जो डर और भावनाओं को नियंत्रित करता है (Amygdala), वह महिलाओं में अधिक संवेदनशील हो सकता है।

अगर किसी में 'पैरा-सुसाइड' (खुद को नुकसान पहुंचाना) के लक्षण दिख रहे हैं, तो परिवार को उस वक्त तुरंत क्या करना चाहिए?

इस सवाल में उन्होनें बताया जब कोई खुद को नुकसान पहुंचाने (Para-suicide) की कोशिश करती है, तो परिवार के लिए 'पहला घंटा' (The Golden Hour) सबसे महत्वपूर्ण होता है।

  • शारीरिक सुरक्षा और फर्स्ट एड: सबसे पहले उसकी चोट का उपचार करें। अगर स्थिति गंभीर है, तो बिना बहस किए तुरंत अस्पताल ले जाएं। कमरे से सभी धारदार चीजें, दवाइयां और ज्वलनशील पदार्थ हटा दें।
  • प्रतिक्रिया को नियंत्रित करें (No Judgement): उस पर चिल्लाएं नहीं और न ही "यह क्या नाटक है" जैसे शब्दों का प्रयोग करें। आपकी नाराजगी उसे और अधिक असुरक्षित महसूस कराएगी। शांत रहकर उसे महसूस कराएं कि वह सुरक्षित है।
  • भावनाओं को मान्यता दें (Validation): उसे यह न कहें कि तुम्हें सब कुछ तो दिया है, फिर यह क्यों? इसके बजाय कहें मैं देख सकता हूं कि तुम बहुत गहरे दर्द में हो, हम साथ मिलकर इसे ठीक करेंगे।
  • अकेला न छोड़ें: अगले 48 घंटों तक उस पर निरंतर निगरानी रखें। उसके साथ बैठें, भले ही वह बात न करना चाहे। आपकी उपस्थिति उसे 'अकेलेपन के डर' (Abandonment) से बचाएगी।
  • प्रोफेशनल मदद: इसे 'उम्र का जोश' समझकर टालें नहीं। तुरंत किसी मनोचिकित्सक (Psychiatrist) से संपर्क करें। यह व्यवहार एक गंभीर मानसिक पुकार है जिसे केवल विशेषज्ञ ही सुलझा सकते हैं।

युवा लड़कियों में 'असुरक्षित यौन व्यवहार' और BPD के संबंध को आप कैसे परिभाषित करेंगे?

युवा लड़कियों में बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD) और असुरक्षित यौन व्यवहार का गहरा संबंध है, जिसे मनोविज्ञान में 'इमोशनल रेगुलेशन' की विफलता के रूप में देखा जाता है।

  • खालीपन को भरना (Chronic Emptiness): BPD से जूझ रही लड़कियां अक्सर भीतर एक असहनीय खालीपन महसूस करती हैं। असुरक्षित या कई लोगों के साथ यौन संबंध बनाना उनके लिए उस 'शून्य' को अस्थायी रूप से भरने और खुद को 'जीवित' महसूस कराने का एक तरीका बन जाता है।
  • अकेलेपन का डर (Fear of Abandonment): इन लड़कियों में पार्टनर को खोने का डर इतना तीव्र होता है कि वे उसे रोकने के लिए अपनी सीमाओं (Boundaries) से समझौता कर लेती हैं। वे प्यार और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 'यौन संबंधों' को एक सौदे या हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगती हैं।
  • आवेग (Impulsivity): BPD का एक प्रमुख लक्षण है बिना सोचे-समझे काम करना। तीव्र भावनात्मक तनाव के क्षणों में, वे भविष्य के खतरों (जैसे बीमारी या बदनामी) को नजरअंदाज कर तात्कालिक राहत के लिए जोखिम भरे यौन निर्णय ले लेती हैं।

DBT (डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी) इस बीमारी में 'रामबाण' क्यों मानी जाती है? यह दिमाग पर कैसे काम करती है?

डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी (DBT) को बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर (BPD) के उपचार में 'रामबाण' इसलिए माना जाता है क्योंकि यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए डिजाइन की गई है जो भावनाओं की Impulsivity को संभाल नहीं पाते। साधारण टॉक-थेरेपी के विपरीत, DBT एक बदलाव का व्यावहारिक फॉर्मूला है जो दो विपरीत विचारों 'स्वीकार्यता' (Acceptance) और 'बदलाव' (Change) के बीच संतुलन बनाना सिखाती है। इसका अर्थ यह है कि मरीज पहले यह स्वीकार करना सीखता है कि उसकी भावनाएं वैध हैं, लेकिन साथ ही वह उन्हें बदलने के वैज्ञानिक तरीके भी सीखता है। यह थेरेपी मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिकी है माइंडफुलनेस (वर्तमान में रहना), संकट सहिष्णुता (तनाव को बिना खुद को नुकसान पहुंचाए झेलना), भावनात्मक विनियमन (गुस्से या उदासी की तीव्रता कम करना) और पारस्परिक प्रभावशीलता (रिश्तों में अपनी बात मजबूती से रखना)।

क्या दवाइयों के बिना केवल टॉक-थेरेपी से BPD का इलाज संभव है?

चिकित्सा विज्ञान में BPD के लिए कोई विशेष 'BPD की दवा' नहीं बनी है। डॉक्टर दवाइयां केवल तब देते हैं जब

  • मरीज को अत्यधिक डिप्रेशन या एंग्जायटी हो।
  • नींद की गंभीर समस्या हो।
  • मूड स्विंग्स बहुत ही हिंसक या असहनीय हो रहे हों।
  • यहां दवाइयां केवल 'ब्रेक' का काम करती हैं ताकि मरीज का दिमाग इतना शांत हो सके कि वह थेरेपी में सिखाई गई बातों को समझ और अपना सके।
Also Read
View All