
Chhattisgarh Folk Art: आधुनिक कला, डिजिटल डिजाइन और एआई के दौर में जहां पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के कोंडागांव से एक ऐसी पहल सामने आई है, जो इस विरासत को नए रंगों के साथ भविष्य की ओर ले जा रही है। युवा कलाकार हर्षदीप कौर (रागिनी) अपनी अनोखी 'फोक फ्यूजन' शैली के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक चित्रकला को न सिर्फ संरक्षित कर रही हैं।
बल्कि उसे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा भी बना रही हैं। उनके लिए कला केवल कैनवास पर उकेरे गए रंग नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवित रखने का माध्यम है। आज जब लोग घरों की सजावट के लिए आधुनिक पेंटिंग्स और विदेशी डिजाइन चुन रहे हैं, तब हर्षदीप की पेंटिंग्स यह संदेश देती हैं कि अपनी मिट्टी की कला भी उतनी ही खूबसूरत, समृद्ध और समकालीन हो सकती है। यही वजह है कि उनकी लोक चित्रकला अब केवल प्रदर्शनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि घरों, कार्यालयों और सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बनती जा रही है।
हर्षदीप बताती हैं कि 'फोक फ्यूजन' का अर्थ पारंपरिक कला को बदलना नहीं है। इसका उद्देश्य उसकी आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसे वर्तमान समय की पसंद के अनुरूप प्रस्तुत करना है। उनकी हर पेंटिंग का आधार छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक चित्रकला ही होती है। फर्क केवल इतना है कि वे रंगों के संयोजन, आकर्षक बॉर्डर, संतुलित कंपोजिशन और आधुनिक कैनवास का इस्तेमाल करती हैं, जिससे यह कला युवाओं को भी आकर्षित करे। उनका मानना है कि यदि किसी लोक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, तो उसकी प्रस्तुति में समय के अनुसार बदलाव जरूरी है। परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह समाज के साथ कदम मिलाकर चलती है।
हर्षदीप की कला यात्रा किसी औपचारिक संस्थान से नहीं, बल्कि अपने घर से शुरू हुई। बचपन में ही उन्हें अपने पिता और प्रसिद्ध लोक चित्रकार खेम वैष्णव से लोक चित्रकला की बारीकियां सीखने का अवसर मिला। महज 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार लोक चित्र बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे यह शौक उनकी पहचान और फिर उनका पेशा बन गया। आज वे अपने गुरुजनों से मिली विरासत को नई सोच के साथ आगे बढ़ा रही हैं। उनकी पेंटिंग्स में छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, त्योहार, पारंपरिक रीति-रिवाज, प्रकृति, ग्रामीण परिवेश और सामाजिक संस्कारों की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।
हर्षदीप का मानना है कि छत्तीसगढ़ की लोक चित्रकला को सबसे बड़ा नुकसान उसकी पहचान के अभाव से हो रहा है। अक्सर सरकारी भवनों, सार्वजनिक दीवारों और पर्यटन स्थलों पर वारली आर्ट का उपयोग कर दिया जाता है, जिसे आम लोग छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला समझ लेते हैं।
वे बताती हैं कि दोनों शैलियां पूरी तरह अलग हैं। वारली कला महाराष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, जबकि छत्तीसगढ़ की लोक चित्रकला यहां के लोकजीवन, जन्म से लेकर विवाह और अन्य सामाजिक संस्कारों, कृषि, पर्व-त्योहार और जनजातीय संस्कृति का विस्तृत चित्रण करती है। इसलिए राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर स्थानीय लोक चित्रकला को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
हर्षदीप का उद्देश्य केवल सुंदर पेंटिंग्स बनाना नहीं है। वे नियमित रूप से बच्चों, युवाओं और कला में रुचि रखने वाले लोगों को लोक चित्रकला का प्रशिक्षण भी देती हैं। उनका विश्वास है कि किसी भी लोक कला का संरक्षण केवल संग्रहालयों में नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के हाथों में होता है। उनके प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विद्यार्थी केवल चित्र बनाना नहीं सीखते, बल्कि लोक कला के पीछे छिपे इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को भी समझते हैं। यही कारण है कि उनके कई विद्यार्थी अब स्वयं इस कला को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
हर्षदीप का संदेश युवाओं के लिए भी प्रेरणादायक है। उनका कहना है कि हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई रचनात्मक क्षमता होती है। यदि उसे समय, मेहनत और सही दिशा मिले तो वही शौक जीवन का सबसे बड़ा पेशा बन सकता है। वे कहती हैं, "अपनी हॉबी को कभी मरने मत दीजिए। अगर वही आपका पेशा बन जाए तो इससे बड़ा सौभाग्य कोई नहीं हो सकता। हमारी लोककलाएं हमारी पहचान हैं और इन्हें आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ाना समय की जरूरत है।"
लोक कलाकारों का मानना है कि यदि सरकार योजनाबद्ध तरीके से काम करे तो छत्तीसगढ़ की लोक चित्रकला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकती है। इसके लिए स्कूलों और कॉलेजों में नियमित कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए, ताकि बच्चों का परिचय बचपन से ही अपनी संस्कृति से हो। इसके अलावा सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, पर्यटन स्थलों और सार्वजनिक दीवारों पर स्थानीय लोक चित्रकला को स्थान दिया जाए। इससे कलाकारों को रोजगार मिलेगा और राज्य की सांस्कृतिक ब्रांडिंग भी मजबूत होगी। गांवों के वरिष्ठ लोक कलाकारों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़कर उनकी पारंपरिक जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचाई जा सकती है।
आज जब पूरी दुनिया अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने की कोशिश कर रही है, तब छत्तीसगढ़ की लोक चित्रकला भी ऐसे ही प्रयासों की मांग करती है। हर्षदीप कौर जैसी युवा कलाकार यह साबित कर रही हैं कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
'फोक फ्यूजन' केवल एक कला शैली नहीं, बल्कि यह संदेश है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक दुनिया में नई पहचान बनाई जा सकती है। कोंडागांव से शुरू हुई यह पहल आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की लोक कला को देश-दुनिया में नई पहचान दिला सकती है। यदि समाज, सरकार और नई पीढ़ी मिलकर इस विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लें, तो लोक चित्रकला केवल इतिहास का हिस्सा नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक पहचान भी बनेगी।