Climate Crisis India: धरती पर कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। WMO की रिपोर्ट के अनुसार 30 लाख साल में पहली बार ऐसे हालात बने हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु संकट का खतरा बढ़ गया है। जानिए इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा।
Climate Crisis India: दुनिया की हवा में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी जहरीली और गर्मी बढ़ाने वाली गैसें तेजी से बढ़ रही हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ( World Meteorological Organization) की रिपोर्ट के मुताबिक, CO₂,CH4 ,N2O जैसे गैसों का स्तर बढ़ता जा रहा है। 30 लाख सालों में ऐसा कभी नहीं देखा गया। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले बड़े खतरे की चेतावनी है। इंसान अपनी सुविधा के लिए लगातार कोयला, पेट्रोल और डीजल जला रहा है, जिससे ये गैसें और बढ़ रही हैं। इसी वजह से धरती तेजी से गर्म हो रही है और मौसम बिगड़ता जा रहा है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो हालात संभालना मुश्किल हो सकता है।
World Meteorological Organization की ‘ग्लोबल एटमॉस्फियर वॉच’ रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का औसत स्तर 423.9 ppm तक पहुंच गया। इसका मतलब है कि हवा के हर दस लाख कणों में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है, जिसे प्रकृति के लिए संभालना मुश्किल हो रहा है। सिर्फ CO₂ ही नहीं, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी दूसरी खतरनाक गैसों ने भी 2024 में नए रिकॉर्ड बना दिए। साल 1750 यानी औद्योगिक दौर शुरू होने से पहले के मुकाबले आज कार्बन डाइऑक्साइड 52% ज्यादा है, जबकि मीथेन में 166% की बड़ी बढ़ोतरी हुई है। साफ है कि इंसानी गतिविधियों ने प्रकृति का संतुलन बुरी तरह बिगड़ रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले धरती पर कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर इतना ज्यादा था, तब प्लियोसीन युग चल रहा था, करीब 30 लाख साल पहले। उस समय समुद्र का जलस्तर आज से ज्यादा ऊंचा था और धरती का तापमान भी काफी अधिक था। हालात फिर वैसे ही हालात बनने लगे हैं, लेकिन बड़ा फर्क यह है कि तब बदलाव प्राकृतिक था, जबकि आज इसकी बड़ी वजह इंसान की गतिविधियां हैं। इतिहास बताता है कि जब-जब CO₂ बढ़ी है, तब-तब धरती का मौसम और वातावरण बदला है। करोड़ों साल पहले इसका स्तर बहुत ज्यादा था, लेकिन उस समय हालात अलग थे। आज समस्या यह है कि एक तरफ गर्मी बढ़ रही है और दूसरी तरफ ये गैसें धरती की गर्मी को बाहर निकलने से रोक रही हैं। इसी वजह से ग्लोबल वार्मिंग का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
अगर हम ग्रीनहाउस गैसों की बात करें, तो कार्बन डाइऑक्साइड सबसे बड़ी समस्या बन कर उभर रही है। साल 1990 से अब तक धरती पर जितनी गर्मी बढ़ी है, उसमें करीब 81% हिस्सा अकेले इसी गैस का है। हम जो बिजली इस्तेमाल करते हैं, गाड़ियां चलाते हैं और फैक्ट्रियां चलाते हैं, वही इसके बड़े कारण हैं। इंसान जितनी CO₂ हवा में छोड़ रहा है, उसका सिर्फ आधा हिस्सा ही पेड़-पौधे और समुद्र सोख पा रहे हैं। बाकी करीब 48% गैस हवा में ही जमा हो जाती है। यही गैस आने वाले कई सालों तक धरती को और गर्म करती रहेगी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रदूषण का असर तुरंत नहीं दिखता, कई बार उसका असर दशकों बाद सामने आता है। यानी आज जो हम कर रहे हैं, उसका असर आने वाली पीढ़ियों को झेलना पड़ सकता है।
कार्बन डाइऑक्साइड के बाद मीथेन गैस सबसे बड़ी चिंता है। यह गैस CO₂ जितने लंबे समय तक हवा में नहीं रहती,लेकिन गर्मी सोखने के मामले में यह उससे कहीं ज्यादा खतरनाक है। साल 2024 में मीथेन का स्तर 1942 ppb तक पहुंच गया। इसका बड़ा हिस्सा खेती-बाड़ी, पशुपालन और कचरे के ढेर से निकलता है। वहीं, नाइट्रस ऑक्साइड भी खतरनाक गैस है। यह सिर्फ धरती को गर्म नहीं करती, बल्कि ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचाती है, जो हमें सूरज की हानिकारक किरणों से बचाती है। खेतों में ज्यादा रासायनिक खाद के इस्तेमाल और बायोमास जलाने से यह गैस लगातार बढ़ रही है।
जंगल और महासागर ऐसे प्राकृतिक सिस्टम हैं, जो हवा में मौजूद खतरनाक गैसों को सोख लेते हैं। इन्हें ही ‘सिंक’ कहा जाता है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि बढ़ती गर्मी की वजह से इनकी ताकत भी कम होती जा रही है। जंगल और समुद्र पहले जितनी गैसें नहीं सोख पा रहे। अगर पेड़- पौधे और महासागर CO₂ कम सोखने लगे, तो धरती की गर्मी और तेजी से बढ़ेगी, जिसे रोकना बहुत मुश्किल हो सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WHO) की यह रिपोर्ट एक बड़ी चेतावनी है। अगर दुनिया के देश अब भी नहीं संभले और पेट्रोल, डीजल, कोयला जैसे ईंधनों पर निर्भर रहे, तो आने वाला समय और खतरनाक हो सकता है। हालात ऐसे बन सकते हैं कि साफ हवा में सांस लेना भी मुश्किल हो जाए। आम लोगों को भी अपनी आदतों और जीवनशैली में बदलाव लाना होगा, ताकि धरती को बचाया जा सके।