क्या हर मेडिकल रिपोर्ट में दिखने वाली 'गांठ' या 'असामान्यता' का इलाज ज़रूरी है? कभी-कभी इलाज खुद बीमारी से ज़्यादा नुकसानदेह साबित हो सकती है। डॉ. जितेंद्र गोस्वामी से विस्तार से समझिए कि कैसे 'ओवरडायग्नोसिस' आपकी जेब और सेहत दोनों पर भारी पड़ रहा है।
Diagnosis v/s Overdiagnosis: क्या आपने कभी सोचा है कि सेहत की चिंता कहीं आपको बिना ज़रूरत के 'मरीज़' तो नहीं बना रही? अक्सर हम बेहतर स्वास्थ्य के चक्कर में ढेरों मेडिकल टेस्ट करवा लेते हैं, यह सोचकर कि सावधानी ही सुरक्षा है। मगर मेडिकल साइंस कहता है कि शरीर में दिखने वाला हर छोटा बदलाव कोई गंभीर बीमारी नहीं होती। यही वजह है कि आज के समय में डायग्नोसिस और ओवरडायग्नोसिस के बीच के अंतर को समझना हर इंसान के लिए ज़रूरी हो गया है।
डायग्नोसिस का सरल मतलब है किसी मौजूदा बीमारी या तकलीफ की सही पहचान करना। जब आपको शरीर में कोई दर्द, सूजन, या असहजता महसूस होती है, तो डॉक्टर टेस्ट के ज़रिए उसके असली कारण का पता लगाते हैं।
क्यों ज़रूरी है?
यह एकतरह से सही इलाज शुरू करने की पहली सीढ़ी है और इससे बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।
उदाहरण: अगर किसी को सांस लेने में तकलीफ है और टेस्ट में 'अस्थमा' निकलता है, तो यह एक सही डायग्नोसिस है क्योंकि इलाज न होने पर मरीज़ की हालत बिगड़ सकती है।
ओवरडायग्नोसिस तब होता है जब आधुनिक मशीनें शरीर में ऐसी किसी असामान्यता (Abnormality) को पकड़ लेती हैं जो असल में आपको कभी बीमार करती ही नहीं। यह बीमारी शरीर में मौजूद तो होती है, लेकिन यह इतनी धीरे बढ़ती है या इतनी मामूली होती है कि अगर इसका पता न चलता, तो भी आप एक लंबी और स्वस्थ ज़िंदगी जी सकते थे।
अगली बार जब आपका डॉक्टर किसी रूटीन स्क्रीनिंग की सलाह दे, तो उनसे ये सवाल ज़रूर पूछें:
सामान्य तौर पर 'Diagnosis' को जीवन बचाने वाला माना जाता है, लेकिन चिकित्सा जगत में अब 'Overdiagnosis' की चर्चा काफी बढ़ गई है। आप इन दोनों के बीच की महीन रेखा को कैसे परिभाषित करेंगे?
इस सवाल के जवाब में उन्होने बताया, Diagnosis (निदान) चिकित्सा का आधार है। जब कोई बीमारी शरीर को नुकसान पहुंचा रही हो, तो उसका पता लगाकर इलाज करना जान बचाता है। लेकिन Overdiagnosis (अति-निदान) वह स्थिति है जहां हम ऐसी 'असामान्यता' को पकड़ लेते हैं जो व्यक्ति को कभी बीमार नहीं करती। इनके बीच की महीन रेखा 'रोग की प्रकृति' और 'मरीज़ के जोखिम' से तय होती है। अगर टेस्ट में निकली समस्या जीवन के लिए खतरा नहीं है (जैसे बहुत धीमी गति से बढ़ने वाले कुछ ट्यूमर), तो उसका आक्रामक इलाज करना ओवरडायग्नोसिस है। एक डॉक्टर के रूप में हमारी चुनौती यह पहचानना है कि कब इलाज करना ज़रूरी है और कब 'सिर्फ नज़र रखना' (Wait and Watch) ही सबसे बेहतर उपचार है।
क्या आपको लगता है कि आज के दौर में मरीज़ 'Early Detection' और 'Overdiagnosis' के बीच भ्रमित हो रहे हैं?
उन्होने बताया, यह आज के दौर की एक बड़ी हकीकत है। Early Detection का उद्देश्य बीमारी को उस अवस्था में पकड़ना है जहां इलाज सबसे प्रभावी हो और जान बचाई जा सके। लेकिन भ्रम तब पैदा होता है जब लोग हर 'पकड़ी गई' रिपोर्ट को जानलेवा मान लेते हैं। मरीज़ अक्सर यह नहीं समझ पाते कि हर असामान्यता (Abnormality) बीमारी नहीं होती। कई बार स्क्रीनिंग में ऐसी चीज़ें सामने आती हैं जो कभी तकलीफ नहीं देतीं, लेकिन 'कैंसर' या 'ट्यूमर' जैसे भारी शब्दों को सुनकर मरीज़ डर जाते है और तुरंत आक्रामक इलाज की मांग करते है। यही वह बिंदु है जहां 'जल्दी पहचान' का फायदा 'ओवरडायग्नोसिस' के मानसिक और शारीरिक बोझ में बदल जाता है।
आधुनिक मशीनों (जैसे हाई-रेजोल्यूशन MRI या CT स्कैन) की संवेदनशीलता क्या कभी-कभी 'ओवरडायग्नोसिस' का कारण बनती है?
उन्होने बताया, आधुनिक मशीनों की बढ़ी हुई संवेदनशीलता (Sensitivity) ओवरडायग्नोसिस का एक प्रमुख कारण है। आज के हाई-रेजोल्यूशन MRI और CT स्कैन शरीर के उन सूक्ष्म बदलावों या 'इंसीडेंटलोमा' (Incidentalomas) को भी पकड़ लेते हैं, जो सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं और व्यक्ति को कभी कोई तकलीफ नहीं देते। समस्या तब आती है जब इन मामूली निष्कर्षों को 'बीमारी' मान लिया जाता है। पहले की मशीनें इन्हें नहीं देख पाती थीं, जिससे मरीज़ अनावश्यक तनाव से बचा रहता था। लेकिन अब, इन बारीक छवियों के कारण डॉक्टर और मरीज़ अक्सर सुरक्षा के लिहाज से ऐसे टेस्ट या बायोप्सी की ओर बढ़ जाते हैं, जिनकी जरूरत नहीं होती।
क्या 'फुल बॉडी चेकअप' के बढ़ते चलन ने स्वस्थ लोगों को बेवजह 'मरीज़' बना दिया है?
उन्होने बताया, 'फुल बॉडी चेकअप' के बढ़ते चलन ने निश्चित रूप से कई स्वस्थ लोगों को बेवजह 'मरीज़' की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। व्यावसायिक विज्ञापनों और 'प्रिवेंटिव हेल्थ पैकेज' की होड़ के कारण लोग बिना किसी लक्षण के भी जटिल टेस्ट करवाते हैं। अक्सर इन चेकअप्स में शरीर की ऐसी छोटी-मोटी असामान्यताएं सामने आती हैं, जो उम्र के साथ स्वाभाविक हैं और कभी कोई बीमारी नहीं बनतीं। लेकिन एक बार रिपोर्ट में कुछ असामान्य दिखने पर स्वस्थ व्यक्ति मानसिक तनाव (Anxiety) का शिकार हो जाता है और अनावश्यक दवाओं या फॉलो-अप टेस्ट के चक्रव्यूह में फंस जाता है, जिसे हम चिकित्सा जगत में 'ओवरडायग्नोसिस' कहते हैं।
कैंसर स्क्रीनिंग (विशेषकर थायराइड, प्रोस्टेट या ब्रेस्ट कैंसर) के संदर्भ में ओवरडायग्नोसिस कितना सामान्य है?
उन्होने बताया, कैंसर स्क्रीनिंग के क्षेत्र में ओवरडायग्नोसिस एक अत्यंत सामान्य और गंभीर चुनौती बन गई है। विशेष रूप से थायराइड और प्रोस्टेट कैंसर के मामलों में यह अधिक देखा जाता है, जहां कई ट्यूमर इतने धीमी गति से बढ़ते हैं कि वे उम्र भर मरीज़ को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। आधुनिक और संवेदनशील स्क्रीनिंग तकनीकों के कारण ऐसे सूक्ष्म कैंसर सेल्स पकड़ में आ जाते हैं, जो शायद कभी लक्षण पैदा नहीं करते। एक बार पहचान होने पर, डर के मारे मरीज़ सर्जरी या कीमोथेरेपी जैसे आक्रामक इलाज करवा लेता है। ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग (मैमोग्राफी) में भी यह पाया गया है कि कुछ पकड़े गए मामले कभी घातक नहीं होते, लेकिन वे मरीज़ को अनावश्यक शारीरिक और मानसिक पीड़ा की ओर धकेल देते हैं।
क्या ऐसे मामले सामने आते हैं जहां 'इलाज' खुद 'बीमारी' से ज़्यादा नुकसानदेह साबित हुआ हो?
उन्होने बताया, चिकित्सा जगत में ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं जहां 'इलाज' का प्रभाव 'बीमारी' की तुलना में अधिक कष्टकारी( painful ) होता है। इसे 'ओवरट्रीटमेंट' कहा जाता है, जो अक्सर ओवरडायग्नोसिस का परिणाम होता है। उदाहरण के लिए, प्रोस्टेट या थायराइड के कुछ धीमी गति वाले कैंसर मरीज़ को दशकों तक कोई नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन उनकी पहचान होते ही की जाने वाली सर्जरी या कीमोथेरेपी से संक्रमण, या भारी कमजोरी जैसे गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। ऐसे में मरीज़ उस समस्या के इलाज के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से टूट जाता है, जो समस्या उसे कभी परेशान ही नहीं करने वाली थी।
अनावश्यक इलाज (Overtreatment) से मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए अस्पतालों को क्या कदम उठाने चाहिए?
उन्होने बताया, अस्पतालों को 'इलाज से पहले परामर्श' की प्रक्रिया को मजबूत करना चाहिए। सबसे पहले, डॉक्टरों को 'Shared Decision Making' अपनानी चाहिए, जहां मरीज़ को बीमारी के वास्तविक जोखिम और इलाज के खर्च व दुष्प्रभावों की स्पष्ट जानकारी दी जाए। अस्पतालों को अनावश्यक 'प्रिवेंटिव पैकेज' (Preventive package) को बढ़ावा देने के बजाय केवल साक्ष्य-आधारित (Evidence-based) टेस्ट ही अनिवार्य करने चाहिए। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए 'Wait and Watch' या 'सक्रिय निगरानी' (Active Surveillance) जैसे किफायती विकल्पों को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि वे बिना ज़रूरत के महंगे ऑपरेशन या दवाओं के कर्ज के जाल में न फंसें।