
Digital Estate Planing Inheritance Law India: हम डिजिटल दुनिया में जीना शुरू कर चुके हैं। आपके ई मेल्स, आपकी गूगल लाइफ, आपकी इनकम का साधन आज यूट्यूब भी है। क्लाउड में रखे दस्तावेज और ऐसी ही कई डिजिटल संपत्तियां आज हर घर की विरासत हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि आज हमारी भौतिक संपत्ति की तरह ही डिजिटल संपत्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी हैं, कि आपको सोचना होगा कि आपके बाद इस पर आपके किस उत्तराधिकारी कौन होगा? इस तर्क पर आज मुझे एक बीमा कंपनी की ये लाइन याद आ गई 'जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी।' लेकिन आज भी हम जीवन के बाद सबसे पहले भौतिक संपत्ति की ही चिंता कर रहे हैं.. हमारा घर, जमीन और बैंक खातों की विरासत किसकी होगी? क्या आपको नहीं लगता कि आपकी डिजिटल संपत्ति आपके बाद भी बनी रहना चाहिए। दरअसल दुनिया के कई देशों ने इन डिजिटल एसेट्स के उत्तराधिकार के लिए कानूनी व्यवस्था विकसित कर ली है, लेकिन भारत में आज भी ऐसा कोई स्पष्ट और समर्पित कानून नहीं है। वहीं इसे लेकर हम यूजर्स भी अभी तक उतने जागरूक नहीं हैं। नतीजा, डिजिटल अकाउंट और ऑनलाइन संपत्तियों के बारे में जानने और उन पर अपना अधिकार पाने के लिए परिवारों को कानूनी और तकनीकी दोनों तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। आइए सिर्फ एक केस से समझें डिजिटल एस्टेट प्लानिंग और विरासत की पूरी तस्वीर…
अमेरिका : यहा ज्यादातर राज्यों में RUFADAA (Revised Uniform Fiduciary Access to Digital Assets Act) लागू है। इस कानून के तहत अदालत या अधिकृत उत्तराधिकारी को कुछ शर्तों के साथ डिजिटल अकाउंट तक पहुंचने की अनुमति दी आसानी से मिल जाती है।
फ्रांस : यह देश अपने नागरिकों को Digital Republic Act (2016) के तहत यह अधिकार देता है कि वे पहले से यह तय कर सकें कि उनके जाने के बाद उनके डिजिटल डेटा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
जर्मनी : 2018 में जर्मनी की सर्वोच्च अदालत भी अक मामले में यह फैसला दे चुकी है कि डिजिटल अकाउंट भी अन्य संपत्ति की तरह विरासत का हिस्सा हैं।
यूरोपीय संघ (EU) : यूरोपीय संघ भी अपने GDPR सदस्य देशों (कुल 27 देशों) को मृत्यु के बाद डेटा प्रबंधन के लिए अपने नियम बनाने की अनुमति देता है।
भारत : अभी तक डिजिटल विरासत या डिजिटल एसेट्स के उत्तराधिकार पर इंडिया में कोई अलग और स्पष्ट कानून नहीं है।
दरअसल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत में अब तक डिजिटल विल या असेट्स नाम का अलग से कोई कानून ही नहीं है। लेकिन ऐसे मामलों को मान्यता जरूर मिली हुई है, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। यदि कोई व्यक्ति अपनी वैध वसीयत में Gmail, YouTube चैनल, डोमेन, डिजिटल वॉलेट, क्लाउड डेटा या अन्य डिजिटल संपत्तियों का उल्लेख करता है, तो उसे सामान्य उत्तराधिकार कानूनों के तहत देखा जा सकता है। लेकिन यहां भी परेशानी आती है, क्योंकि संबंधित प्लेटफॉर्म जैसे Google, Apple, Meta आदि की अपनी नीतियां भी लागू होती हैं। केवल पासवर्ड लिख देने से उत्तराधिकारी को डिजिटल संपत्तियों का स्वतः एक्सेस नहीं मिल जाता।
गूगल (Gmail, Drive, Photos, YouTube)
अगर यूजर ने पहले से Inactive Account Manager सेट किया है, तो तय समय तक अकाउंट इस्तेमाल न होने पर चुने गए व्यक्ति को डेटा मिल सकता है या फिर अकाउंट अपने-आप डिलीट हो सकता है। अगर यह फीचर सेट नहीं है, तो परिवार दस्तावेजों के आधार पर विशेष अनुरोध कर सकता है, जिसकी Google अलग-अलग समीक्षा करता है। लेकिन गुगल का स्पष्ट कहना है कि पासवर्ड या लॉग इन एक्सेस नहीं दिया जाएगा।
एप्पल (iPhone, iCloud)
अगर यूजर ने पहले से Legacy Contact चुना है, तो वही व्यक्ति जरूरी दस्तावेज और एक्सेस की के जरिए डेटा तक पहुंच का अनुरोध कर सकता है। यदि Legacy Contact नहीं है, तो कई मामलों में कानूनी दस्तावेज या कोर्ट के आदेश की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन एप्पल के भी अपने सख्त नियम हैं कि कभी भी Apple ID का पासवर्ड शेयर नहीं किया जाएगा।
मेटा (Facebook)
Facebook अकाउंट को Memorial (स्मृति) अकाउंट में बदला जा सकता है। अगर Legacy Contact पहले से चुना गया है, तो वह प्रोफाइल से जुड़े कुछ सीमित काम कर सकता है। लेकिन पासवर्ड, निजी संदेश और लॉग-इन एक्सेस नहीं दिया जाता।
इंस्टाग्राम
Instagram भी अकाउंट को Memorialized Account में बदलने की सुविधा देता है। लेकिन लॉग-इन एक्सेस या पासवर्ड किसी को नहीं दिया जाता।
X (पहले Twitter)
X के लिए परिवार या अधिकृत व्यक्ति जरूरी दस्तावेज देकर अकाउंट हटाने का अनुरोध कर सकता है। लेकिन पासवर्ड या अकाउंट का लॉग-इन एक्सेस नहीं दिया जाता।
सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबर लॉ एक्सपर्ट डॉ. पवन दुग्गल के मुताबिक, ''हर दिन सैकड़ों गीगाबाइट डिजिटल डेटा हमेशा के लिए लॉक हो जाता है, वो भी इसलिए कि संबंधित मालिक की मौत हो चुकी होती है। इस मामले में कानून तकनीक से 10 कदम पीछे हैं। वे मानते हैं कि जैसे लोग अपनी चल और अचल संपत्ति की वसीयत बनाते हैं, वैसे ही लोगों को अपनी डिजिटल संपत्तियों की भी वसीयत बनानी चाहिए, फेसबुक अकाउंट, आईपेड जैसे अन्य डिजिटल एसेट भी उनकी संपत्ति ही है।''पारंपरिक वसीयत संपत्ति और बौद्धिक संपदा को कवर करती है, लेकिन साइबर संपत्ति के मामले में अकाउंट और पासवर्ड का उल्लेख जरूरी है। वरना उत्तराधिकारियों के लिए उन्हें हासिल करना मुश्किल हो सकता है।''
-सुहैल नाथानी, इकोनॉमिक लॉ प्रैक्टिस, पार्टनर
एडवाया लीगल मैनेजिंग पार्टनर रमेश वैद्यनाथ के मुताबिक, ''किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद इलेक्ट्रॉनिक डाटा के स्वामित्व पर भारत में कोई संहिताबद्ध कानून नहीं है। ऐसे मामलों में उत्तराधिकार के सामान्य सिंद्धांत लागू होते हैं।''पूर्व प्रोडक्ट मैनेजर, एंड्रियास टुर्क ने भी गुगल इनएक्टिव अकाउंट मैनेजर की लॉन्चिंग के समय जानकारी दी थी कि, लोगों को अपने डिजिटल आफ्टरलाइफ की पहले से योजना बनाने का विकल्प मिलना चाहिए, ताकि उनकी गोपनीता को सुरक्षित रखा जा सके, जरूरत पड़ने पर भरोसेमंद लोगों को जरूरी जानकारी मिल सके।''भारत में इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के और उत्तराधिकार कानूनों में डिजिटल वसीयत के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। ऐसे में कानूनी वैधता पर यहां अब भी अनिश्चितता बनी हुई है।''-गुरप्रीत सिंह, अमरजीत एंड एसोशिएट्स मैनेजिंग
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यदि ताजा स्थिति की बात की जाए तो भारत में अदालतें अब डिजिटल डेटा को उत्तराधिकार कानूनों के तहत संपत्ति मानने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन इस विषय पर अलग और व्यापक कानून अब भी नहीं हैं।इस स्टोरी को पढ़कर आप समझ गए होंगे कि जिस तरह आप बैंक, बैलेंस और बीमा की वसीयत बनाते हैं, तो उसी तरह डिजिटल संपत्तियों की योजना बनाना भी अब बेहद जरूरी हो गया है। जब तक भारत में स्पष्ट कानून नहीं बन जाता, तब तक डिजिटल विरासत की सुरक्षा काफी हद तक आपकी पहले से तैयारी और संबंधित प्लेटफॉर्म की नीतियों पर ही निर्भर रहेगी। ये स्पेशल स्टोरी आपको कैसी लगी, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। हमारे साथ जुड़े रहने के लिए पढ़ते रहिए patrika.com.