Sweating More Burn More Fat: क्या ज्यादा पसीना आने का मतलब है बेहतर वर्कआउट और तेज फैट लॉस होता है? चिलचिलाती गर्मी और चिपचिपी उमस के इस मौसम में वर्कआउट करने से पहले पसीने का असली वैज्ञानिक सच जान लें। विस्तार से समझे कैसे अत्यधिक पसीना आपके दिल पर दबाव बढ़ाता है और हीट स्ट्रोक का कारण बन सकता है। एंडोक्राइनोलॉजिस्ट कंसल्टेंट डॉ. हेमा सिंह से जानिए समर फिटनेस के लिए हाइड्रेशन का गोल्डन रूल और सुरक्षित एक्सरसाइज करने के सही तरीके।
Sweating More Burn More Fat: दुनिया में एक पुराना और बेहद आम मिथक है "No Pain, No Gain"। इसी तर्ज पर ज्यादा पसीना यानी ज्यादा फैट बर्न। जिम में ट्रेडमिल पर दौड़ते हुए जब कोई पसीने से पूरी तरह भीग जाता है, तो अक्सर उसे ही सबसे ज्यादा 'मेहनती' और 'फिट' मान लिया जाता है। बहुत से लोग तो सिर्फ इसलिए भारी कपड़े पहनकर या बिना पंखे-एसी के बगैर वर्कआउट करते हैं ताकि उन्हें ज्यादा से ज्यादा पसीना आए। लेकिन क्या विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है? क्या वाकई ज्यादा पसीना बहने का मतलब एक शानदार और हाई-क्वालिटी वर्कआउट है? विशेषकर जब आप भारत की चिलचिलाती गर्मी (Hot) या चिपचिपी उमस (Humid) वाले मौसम में एक्सरसाइज कर रहे हों, तो पसीने का गणित पूरी तरह बदल जाता है। आइए, मेडिकल साइंस और एक्सरसाइज फिजियोलॉजी के नजरिए से समझते हैं कि पसीने और वर्कआउट की क्वालिटी का आपस में क्या संबंध है और इस चिलचिलाते मौसम में आपको किन बातों का खास ख्याल रखना चाहिए।
What is Fat burning process? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि पसीना आना कोई 'फैट बर्निंग प्रोसेस' नहीं है, बल्कि यह आपके शरीर का इंटरनल कूलिंग सिस्टम (AC) है। हमारे शरीर का सामान्य तापमान लगभग 37°C (98.6°F) होता है। जब हम एक्सरसाइज करते हैं, तो हमारी मांसपेशियां (Muscles) बहुत तेजी से काम करती हैं और इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा और हीट (गर्मी) पैदा होती है। शरीर का तापमान बढ़ने पर मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस (Hypothalamus) हिस्सा एक्टिव हो जाता है और त्वचा में मौजूद एक्राइन स्वेद ग्रंथियों (Eccrine Sweat Glands) को सिग्नल भेजता है। ये ग्रंथियां शरीर से पानी और थोड़े से नमक (सोडियम, पोटैशियम) को पसीने के रूप में त्वचा की सतह पर छोड़ती हैं। जब यह पसीना हवा के संपर्क में आकर भाप बनता है (Evaporation), तो आपके शरीर का तापमान कम हो जाता है और अंदरूनी अंग सुरक्षित रहते हैं। यानी, पसीना आना सिर्फ इस बात का सबूत है कि आपके शरीर को गर्मी लग रही है और वह खुद को ठंडा करने की कोशिश कर रहा है।
ज्यादा पसीने का मतलब हमेशा बेहतर वर्कआउट नहीं होता। आपके पसीने की मात्रा कई तरह के फैक्टर्स पर निर्भर करती है, जिनका आपके वर्कआउट की इंटेंसिटी (तीव्रता) या कैलोरी बर्न से कोई लेना-देना नहीं है।
पसीने की मात्रा तय करने वाले मुख्य कारक:
जब आप बाहर या बिना वेंटिलेशन वाले कमरे में वर्कआउट करते हैं, तो दो तरह की स्थितियां बनती हैं। दोनों स्थितियों में आपका शरीर अलग तरह से रिएक्ट करता है:
लोगों में यह धारणा है कि जिम में जितना ज्यादा पसीना बहेगा, वजन उतनी ही तेजी से कम होगा। आप 'वॉटर वेट लॉस' (Water Weight) और 'फैट लॉस' (Fat Loss) के बीच के अंतर को आसान शब्दों में समझाएं?
यह एक बहुत बड़ा मिथक है कि ज़्यादा पसीने का मतलब ज़्यादा फैट लॉस है। एक डॉक्टर के तौर पर मैं इसे बहुत सरल शब्दों में समझाती हूं।
क्या कम पसीना आने का मतलब यह है कि व्यक्ति का मेटाबॉलिज्म (Metabolism) धीमा है, या यह पूरी तरह से जेनेटिक्स और मौसम पर निर्भर करता है?
नहीं, कम पसीना आने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपका मेटाबॉलिज्म धीमा है। पसीना आना मुख्य रूप से आपके शरीर की थर्मल रेगुलेशन (तापमान नियंत्रण) प्रणाली का हिस्सा है, न कि मेटाबॉलिक रेट का। पसीने की मात्रा पूरी तरह से इन तीन कारकों पर निर्भर करती है:
फैट ऑक्सीडेशन" (Fat Oxidation) की आंतरिक प्रक्रिया क्या है और इसका त्वचा से निकलने वाले पसीने से कोई सीधा संबंध क्यों नहीं है?
फैट ऑक्सीडेशन एक पूरी तरह से आंतरिक रासायनिक प्रक्रिया है। जब आप वर्कआउट करते हैं, तो शरीर ट्राइग्लिसराइड्स (Triglycerides) को तोड़कर फैटी एसिड ( Fatty acid) और ग्लिसरॉल (Glycerol) में बदलता है। ये फैटी एसिड्स कोशिकाओं के पावरहाउस यानी माइटोकॉन्ड्रिया ( Mitochondria) में जाकर ऑक्सीजन की मौजूदगी में जलते हैं, जिससे शरीर को ऊर्जा (ATP), कार्बन डाइऑक्साइड CO₂ और पानी मिलता है।इस प्रक्रिया में फैट का लगभग 84% हिस्सा फेफड़ों के जरिए CO₂ के रूप में बाहर निकलता है और बाकी 16% पानी बनता है। त्वचा से निकलने वाला पसीना केवल बाहरी तापमान और एक्सरसाइज की गर्मी से शरीर को ठंडा करने का मैकेनिज्म है। इसलिए, फैट ऑक्सीडेशन का त्वचा के पसीने से कोई सीधा संबंध नहीं है।
जब कोई व्यक्ति बहुत तेज गर्मी या उमस (High Humidity) में भारी वर्कआउट करता है, तो उसके कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम (दिल और रक्त वाहिकाओं) पर क्या प्रभाव पड़ता है?
तेज गर्मी और उमस में वर्कआउट करने से दिल पर दोगुना दबाव पड़ता है। एक्सरसाइज के दौरान मांसपेशियों को ऑक्सीजन के लिए अतिरिक्त खून की जरूरत होती है। साथ ही, शरीर को ठंडा रखने के लिए मस्तिष्क खून के एक बड़े हिस्से को त्वचा (Skin) की तरफ डाइवर्ट कर देता है ताकि पसीने के जरिए गर्मी बाहर निकल सके। यहीं पर दिल के सामने दोहरी चुनौती खड़ी होती है उसे एक ही समय में काम कर रही मांसपेशियों को ऊर्जा देने के लिए और त्वचा को ठंडा रखने के लिए, दोनों तरफ भारी मात्रा में खून पंप करना पड़ता है। इस दोहरे काम को पूरा करने के लिए दिल को बहुत तेजी से धड़कना पड़ता है, जिससे हार्ट रेट (Heart Rate) असामान्य रूप से बढ़ जाती है और ब्लड प्रेशर असंतुलित हो सकता है। उमस में पसीना न सूखने से यह कार्डियोवैस्कुलर तनाव और खतरनाक हो जाता है।
अत्यधिक पसीना आने और जिम के कपड़ों में लंबे समय तक रहने से 'टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस' (Textile Dermatitis) या फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए फैब्रिक का चयन कैसा होना चाहिए?
अत्यधिक पसीने और जिम के कपड़ों में लंबे समय तक रहने से त्वचा पर बैक्टीरिया और फंगस पनपने लगते हैं, जिससे 'टेक्सटाइल डर्मेटाइटिस' या फंगल इन्फेक्शन का खतरा बढ़ता है। इससे बचने के लिए फैब्रिक का चयन ऐसा होना चाहिए:
समर फिटनेस रूटीन को सुरक्षित रखने के लिए 'हाइड्रेशन का गोल्डन रूल' क्या बताना चाहेंगे?