Middle East Crisis and EL Nino: मध्य पूर्व संकट के लगातार जारी रहने और अब बन रहे अल नीनो के हालात से एशियाई देशों के आर्थिक नुकसान में इजाफा की उम्मीद जताई जा रही है। भारत में भी खरीफ फसल की पैदावार 15 फीसदी कम रह सकता है। इसका क्या-क्या और असर पड़ेगा, जानने के लिए पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Middle East Conflict & El Nino Impact: मध्य पूर्व में दो महीने से ज्यादा समय से जारी संघर्ष का प्रभाव एशियाई देशों पर पड़ रहा है। अब एशिया को संभावित अल नीनो परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। अल नीनो के चलते एशियाई देशों में ऊर्जा की मांग बढ़ सकती है। पनबिजली उत्पादन (Hydro Power Production will fall) में कमी आ सकती है और यह फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। आइए जानते हैं कि इसका भारत, पाकिस्तान समेत एशियाई देशों पर क्या असर पड़ सकता है।
भारत में सुपर अल नीनो के चलते मानसून कमजोर होने का खतरा जताया जा रहा है। भारतीय मौसम विभाग ने पहले ही इस साल 8 प्रतिशत मानसून कम रहने की उम्मीद जताई है। भारत में खेती काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। अल नीनो के चलते मानसून के आने में अक्सर देरी होती है। भारत में मानसून का आगमन जून के पहले या दूसरे हफ्ते में हो जाता है। अल नीनो के चलते बारिश में कमी आती है या असमान रूप से बारिश होती है। अगर मानसून में देरी हुई तो देश में धान, सोयाबीन, मक्का जैसी खरीफ फसलें प्रभावित हो सकती हैं।
अल नीनो (El Nino) एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो दुनिया भर में हवाओं, वायुदाब और वर्षा के पैटर्न में बदलाव लाती है। यह प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी भाग के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने पर होती है। इससे हवा के दबाव और वायु प्रणाली बदल जाती है, जिसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। भारत में इसका प्रमुख प्रभाव मानसून की कमजोरी, कम वर्षा और सूखे के रूप में दिखाई देता है। अल नीनो हर दो से सात साल में आता है और इसका पूर्वानुमान समुद्र के तापमान के आधार पर लगाया जाता है।
सुपर अल नीनो (Super El Nino), अल नीनो की तुलना में ज्यादा तीव्र और शक्तिशाली होता है। सुपर अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब समुद्र का तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा (आमतौर पर 2°C या उससे अधिक) बढ़ जाता है। इनके परिणाम बहुत गंभीर देखे जाते हैं। वर्ष 1997–98 और 2015–16 के दौरान सुपर अल नीनो के हालात बने थे। इसके चलते कई देशों में सूखा, बाढ़, हीटवेव के दिनों की संख्या में इजाफा और कृषि नुकसान बढ़ गया था। हालांकि वैज्ञानिक सुपर अल नीनो शब्द का उपयोग नहीं करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की मौसम और जलवायु एजेंसी ने कहा है कि अल नीनो की स्थिति मई से जुलाई के बीच विकसित हो सकती है। अल नीनो की घटना काफी मजबूत हो सकती है, और यही वजह कुछ लोग इसे “सुपर अल नीनो” कह रहे हैं।
अल नीनो के चलते एशिया के कई देशों में लू, सूखा और भारी बारिश की संभावना नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं। यह घटना पारंपरिक मौसम पैटर्न को बदल देती है। मिसाल के तौर पर इंडोनेशिया में सामान्यत: बारिश समुद्र की ओर खिसक जाती है, जिससे वहां सूखा और जंगल की आग का खतरा बढ़ जाता है। ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के जलवायु वैज्ञानिक पीटर वैन रेंश ने एएफपी से बातचीत करते हुए यह कहा है कि अब तक जो समुद्र के नीचे की असामान्यता हम देख रहे हैं, वह काफी मजबूत है। उन्होंने कहा कि यह कुछ हद तक 1997 की घटना जैसा दिख रहा है, जो शायद सबसे शक्तिशाली अल नीनो था। हालांकि, वह अपने ही इंटरव्यू में इस बात की संभावना भी जता रहे हैं कि अल नीनो बिल्कुल भी विकसित ना हो।
वर्ष 1997 के अल नीनो ने गंभीर प्रभाव डाले थे। इस साल इंडोनेशिया को भीषण सूखा और विनाशकारी जंगल की आग का सामना करना पड़ा था। आग के चलते 80-90 लाख हेक्टेयर जंगल जल गया था। जंगल कई महीनों तक धधकते रहे। इनसे उठने वाला धुआं दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों मलेशिया और सिंगापुर तक फैल गया, जिसके चलते लाखों लोगों को सांस की बीमारियां हुईं। देश की अर्थव्यवस्था को 9 से 10 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा था। इंडोनेशिया में इस साल अल नीनों के चलते 30 वर्षों में सबसे कम वर्षा होने की संभावना जताई गई है।
अल नीनो के बारे यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब एशिया ऊर्जा आपूर्ति संकट से जूझ रहा है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत अन्य एशियाई देशों में होर्मुज स्ट्रेट से होकर आयातित होने वाले उर्वरक व अन्य औद्योगिक तथा कृषि आपूर्ति की कमी की आशंका जताई जा रही है। भारत में उर्वरक की कमी से खरीफ की फसलों की पैदावर कम रहने की आशंका बार-बार जताई जा रही है। अल नीनो के चलते सूखा उन देशों के लिए खतरा पैदा करेगा, जो जलविद्युत पर अत्यधिक निर्भर हैं। अधिकांश आसियान देश जलविद्युत पर काफी हदतक निर्भर हैं। नेपाल और मलेशिया के कुछ हिस्सों पर अल नीनो का विशेष रूप से प्रभाव पड़ सकता है। 2022 में चीन में आई हीटवेव के दौरान सिचुआन में जलविद्युत उत्पादन 50 प्रतिशत से अधिक घट गया था। इसका असर घर और उद्योग दोनों पर पड़ा था।
भारत में वर्ष 2024–25 में उर्वरक की मांग 722 लाख टन थी और उपलब्धता 834 लाख टन के करीब। यानी देश में मांग से ज्यादा उर्वरक थी। भारत उर्वरक की अपनी कुल खपत का 77% देश में उत्पादित करता था। हालांकि, मध्य पूर्व संकट के चलते वर्ष 2025–26 में देश में उर्वरक उत्पादन घटकर 64% रह गया। यानी इस वर्ष देश की मांग के अनुसार आयात पर निर्भरता बढ़ानी पड़ेगी। देश में यूरिया की खपत सर्वाधिक होती है। वर्ष 2024–25 में यूरिया की खपत 38.7 मिलियन टन हुई थी, जबकि घरेलू उत्पादन 30.6 मिलियन टन रहा। बाकी 8.1 मिलियन टन यूरिया की जरूरत आयात से पूरी हो पाई थी। वहीं, देश में 2024–2 में फॉस्फेट और पोटाश की खपत 32 मिलियन टन रही, जबकि घरेलू उत्पादन सिर्फ 21 मिलियन टन के आसपास रहा। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे किसान फॉस्फेट और पोटाश की जरूरत का लगभग 30–35% आयात पर निर्भरता रहती है। एक अनुमान के मुताबिक, अल नीनो और यूरिया की कमी के चलते भारत में खरीफ की पैदावर 15 फीसदी तक कम रह सकती है।
अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर 28 फरवरी के हमलों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए वैश्विक व्यापार बहुत ज्यादा बाधित हो रही है। एक ओर उर्वरक से लेकर ऊर्जा की सप्लाई बाधित हो रही है और दूसरी ओर अल नीनो मजबूत होने की स्थिति में दिख रही है तो ऐसे में ऊर्जा तंत्र पर दबाव और ज्यादा बढ़ेगा। भीषण गर्मी से बचने के लिए लोगों को घरों और कार्यस्थलों को ठंडा रखने के लिए बिजली की मांग में इजाफा होगा। जाहिर सी बात है कि जो देश तेल और गैस की आपूर्ति तथा अन्य व्यापार के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भर हैं, वहां आपूर्ति में कमी से ईंधन राशनिंग, मांग प्रबंधन और आर्थिक गतिविधियों में कमी आएगी, जिससे जीडीपी वृद्धि प्रभावित होगी।