CG News: कभी नौकरी को सुरक्षित भविष्य माना जाता था, लेकिन रायगढ़ जिले के भकुरा गांव के जयकुमार गुप्ता ने उस सोच को बदल दिया। नौकरी छोड़कर उन्होंने प्रकृति का हाथ थामा और प्राकृतिक खेती के जरिए न सिर्फ अपनी आमदनी बढ़ाई, बल्कि सैकड़ों किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण भी जगा दी।
CG News: जब ज़्यादातर युवा सुरक्षित नौकरी की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के एक किसान ने नौकरी छोड़कर खेतों को अपना भविष्य बनाया। लैलूंगा विकासखंड के भकुरा गांव के जयकुमार गुप्ता ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर न सिर्फ रासायनिक खेती की महंगी मार से छुटकारा पाया, बल्कि हर एकड़ से हजारों रुपये की कमाई कर यह साबित कर दिया कि अगर सोच बदल जाए, तो खेती भी किस्मत बदल सकती है।
जयकुमार गुप्ता आज केवल एक किसान नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। बी.ए. तक शिक्षित जयकुमार ने समाज की उस सोच को चुनौती दी, जिसमें खेती को घाटे का सौदा माना जाता है। उन्होंने सुरक्षित नौकरी की राह छोड़कर खेती को ही अपना भविष्य बनाया और यह साबित कर दिया कि अगर खेती प्रकृति के अनुरूप हो, तो मुनाफा भी भरपूर होता है।
जहां एक ओर रासायनिक खेती की बढ़ती लागत किसानों की कमर तोड़ रही है, वहीं जयकुमार गुप्ता ने प्राकृतिक खेती अपनाकर न केवल लागत घटाई, बल्कि आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। उनका मानना है कि खेती में समाधान बाहर नहीं, बल्कि प्रकृति के भीतर छिपा है।
जयकुमार आज भी पशुधन को खेती की आत्मा मानते हैं। उनके पास 3 गायें और 2 बैल हैं, जिनके गोबर और मूत्र से तैयार जैविक घोल उनकी फसलों की ताकत हैं। वे एक ही फसल पर निर्भर न रहकर धान, उड़द, मूंगफली और विभिन्न मौसमी सब्जियों की खेती करते हैं। यह फसल विविधता न केवल आय का स्थायी स्रोत बनी है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण संतुलन भी बनाए रखती है।
जयकुमार की खेती में परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संतुलन साफ नजर आता है। वे जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और हरी खाद का नियमित उपयोग करते हैं। ढैंचा और सनई जैसी फसलों से हरी खाद, फसल अवशेषों से कम्पोस्ट, फेरोमोन ट्रैप, लाइट ट्रैप और ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक उपाय उनकी फसलों को कीट और रोगों से सुरक्षित रखते हैं। इस यात्रा में नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग और कृषि विभाग रायगढ़ का तकनीकी मार्गदर्शन उनके आत्मविश्वास को और मजबूत करता है।
जयकुमार गुप्ता की खेती के आंकड़े हर किसान को सोचने पर मजबूर करते हैं। प्राकृतिक खेती से वे प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी लागत मात्र ढाई हजार रुपये प्रति एकड़ आती है, जबकि शुद्ध मुनाफा लगभग 70 हजार रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच जाता है।
जयकुमार कहते हैं कि खेती में मुनाफा कमाने के लिए भारी खर्च नहीं, बल्कि सही ज्ञान, धैर्य और प्रकृति से तालमेल जरूरी है। प्राकृतिक खेती करके जयकुमार गुप्ता आज अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं।
आज जयकुमार गुप्ता की प्राकृतिक खेती न केवल उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बना रही है, बल्कि आसपास के किसानों को भी रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित कर रही है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि खेती आज भी सम्मान, आत्मनिर्भरता और समृद्धि का रास्ता बन सकती है, बस नजरिया बदलने की जरूरत है।