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Food Contamination : आबादी 9% लेकिन बीमारियों का बोझ 33%; बच्चों के लिए जानलेवा बन रहा ‘फूड कंटामिनेशन’, बचाव का तरीका जानिए

Food Contamination Health News : विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसको लेकर चिंता जाहिर की है। संगठन के आंकड़ों ने ये सवाल खड़ा किया है कि हमें खानपान को लेकर हाइजीन का पूरी तरह ख्याल रखना चाहिए। एक्सपर्ट से जानिए क्यों 5 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए जानलेवा बन रहा है फूड कंटामिनेशन और कैसे बचाव कर सकते हैं।

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Jun 10, 2026
Food Contimination Who Report Temperature (Personal Hygiene
थाली में 'अदृश्य जहर'!(Photo :AI Generated)

Food Contamination In India : क्या आप जानते हैं कि जिस थाली को आप बड़े चाव से अपने परिवार के सामने परोस रहे हैं, वह देखने में जितनी साफ है, उतनी ही असुरक्षित भी हो सकती है? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट एक डराने वाला सच सामने लाती है। पूरी दुनिया में 5 साल से कम उम्र के बच्चों को असुरक्षित भोजन के कारण बीमार होने का खतरा बड़े वयस्कों की तुलना में तीन गुना अधिक होता है। वैश्विक आबादी का मात्र 9 प्रतिशत होने के बावजूद, ये मासूम बच्चे दुनिया भर में फूड-बोर्न डिजीज (भोजन से होने वाली बीमारियों) के कुल मामलों का एक-तिहाई हिस्सा भुगतते हैं।

भारत जैसे विकासशील और घनी आबादी वाले देश में यह संकट और भी गंभीर हो जाता है। फूड कंटामिनेशन (खाद्य संदूषण) हमारी आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन हमारी रसोई की छोटी सी लापरवाही इसे एक साइलेंट किलर में बदल देती है।

हमारे घरों में छिपा 'अदृश्य खतरा'

भारत में हर साल डायरिया (दस्त), टाइफाइड, पीलिया और फूड पॉइजनिंग के लाखों मामले सामने आते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के अनुसार, भारत में फूड कंटामिनेशन के पैर पसारने की मुख्य वजहें बेहद बुनियादी हैं।

  • गंदे हाथ और बैक्टीरिया का तेजी से फैलना: हमारे हाथों में लाखों सूक्ष्मजीव होते हैं। बिना हाथ धोए सब्जी काटना या खाना परोसना बैक्टीरिया को सीधा निमंत्रण है।
  • अस्वच्छ बर्तन और दूषित पानी: पानी केवल पीने का ही साफ नहीं होना चाहिए, बल्कि सब्जियां धोने और बर्तन साफ करने वाला पानी भी सुरक्षित होना चाहिए। दूषित पानी से बर्तनों पर बैक्टीरिया चिपक जाते हैं।
  • गलत तरीके से रखा गया भोजन: भारतीय रसोई में बचे हुए भोजन को बिना ढके छोड़ देना या लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखना बैक्टीरिया (जैसे E. coli और Salmonella) को कुछ ही घंटों में लाखों की संख्या में बढ़ा देता है।
  • चुनौती और भी बड़ी है: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण बढ़ता तापमान और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR दवाओं का बेअसर होना) इन बैक्टीरिया को और अधिक खतरनाक और जिद्दी बना रहे हैं।

पत्रिका के साथ डॉ. सोनल ढेमला, डाइटिशियन की खास बातचीत

WHO की रिपोर्ट कहती है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों को फूड-बोर्न बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा होता है। भारत के संदर्भ में, हमारी रसोई की ऐसी कौन सी 3 आम आदतें हैं जो बच्चों को सबसे ज्यादा बीमार बना रही हैं?

फूड बोर्न इलनेस (Foodborne Illnesses) मुख्य रूप से उन बीमारियों को कहा जाता है, जो खराब या दूषित भोजन और अशुद्ध पानी के सेवन की वजह से होती हैं। इस दायरे में केवल खराब खाना ही नहीं आता, बल्कि रासायनिक उपचार वाले खाद्य पदार्थ (Chemical Treated Foods) और भोजन में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहने वाले हानिकारक टॉक्सिंस (विषाक्त पदार्थ) भी शामिल हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग 86.6 करोड़ लोग फूड बोर्न इलनेसेस के शिकार हुए हैं, जिनमें से करीबन 15 लाख लोगों की मौत भी हो चुकी है। ये आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को साफ दर्शाते हैं।

अगर हम बच्चों, विशेषकर 5 साल से छोटे बच्चों की बात करें, तो उनमें फूड बोर्न इलनेस का खतरा सबसे अधिक (Maximum) होता है। इसके पीछे दो मुख्य वैज्ञानिक कारण हैं-

  • अपूर्ण प्रतिरक्षा तंत्र (Immunity System): छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम अभी पूरी तरह से विकसित (Fully Developed) नहीं हुआ होता है, जिससे उनका शरीर बैक्टीरिया से प्रभावी ढंग से नहीं लड़ पाता।
  • पेट में एसिड का कम उत्पादन: वयस्कों (Adults) की तुलना में बच्चों के पेट (Stomach) में एसिड का बनना बहुत कम होता है। यह पेट का एसिड भोजन पचाने के साथ-साथ उसमें मौजूद हानिकारक माइक्रोब्स और बैक्टीरिया (जैसे- ई. कोलाई, साल्मोनेला और लिस्टेरिया) को मारने का काम करता है। बच्चों में एसिड कम होने के कारण ये बैक्टीरिया जीवित बच जाते हैं और संक्रमण फैलाते हैं।
  • संक्रमण के बाद की जटिलताएं : छोटे बच्चों में संक्रमण होने के बाद स्थिति बहुत तेजी से बिगड़ती है। वयस्कों के मुकाबले बच्चों की बॉडी में डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) बहुत फास्ट होता है। शरीर छोटा होने के कारण लगातार होने वाले दस्त (Diarrhea) और उल्टी (Vomiting) की वजह से शरीर के जरूरी पोषक तत्व (Nutrients) पानी के साथ बाहर बह (Leech out) जाते हैं। यदि सही समय पर उचित इलाज न मिले, तो यह स्थिति बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।

आमतौर पर बच्चों को दिए जाने वाले कुछ मुख्य आहारों में संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा रहता है

  • दूध (Milk): यदि दूध काफी देर तक फ्रिज से बाहर खुला रखा रहे या वह अनपाश्चराइज्ड (Unpasteurized कच्चा) हो, तो उसमें बैक्टीरियल इंफेक्शन बहुत जल्दी पनपता है।
  • फ्रूट जूसेस (Fruit Juices): यदि जूस ताजा नहीं निकाला गया है या पहले से निकालकर स्टोर करके रखा हुआ है, तो वह बच्चों को बीमार कर सकता है।
  • अधपका या कच्चा भोजन (Raw or Undercooked Food): जैसे पूरी तरह से न पका हुआ अंडा। यह बच्चों के पेट में सीधे संक्रमण पैदा करता है।
  • बिना धुले फल और सब्जियां: बिना अच्छी तरह साफ किए बच्चों को फल या सब्जियां देना सीधे तौर पर हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को आमंत्रण देना है।
  • कच्चे स्प्राउट्स (अंकुरित अनाज): स्प्राउट्स बनाते समय जो नमी होती है, उसमें बैक्टीरियल ग्रोथ बहुत तेजी से होती है। इसलिए बच्चों को कभी भी कच्चे स्प्राउट्स न दें; उन्हें हमेशा स्टीम करके या अच्छी तरह पकाकर ही खिलाएं।

भारतीय घरों में बचे हुए खाने को दोबारा गर्म करके (Reheat) खाने का बहुत चलन है। एक डाइटिशियन के तौर पर, भोजन को सुरक्षित रूप से दोबारा गर्म करने का सही तरीका और समय क्या है?

अक्सर अनजाने में हम अपनी रसोई में कुछ ऐसी छोटी-छोटी गलतियां कर बैठते हैं, जो फूड बोर्न इलनेस (खाद्य जनित बीमारियों) के खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं। भारतीय घरों में आमतौर पर देखी जाने वाली मुख्य गलतियां हैं। जैसे-

  • पके हुए भोजन को लंबे समय तक रूम टेम्परेचर पर रखना : भारतीय किचंस में यह बेहद आम है कि खाना सुबह ही बनाकर रख दिया जाता है और उसका सेवन देर दोपहर या शाम तक होता है। विशेषकर गर्मी के इस मौसम में, जब पके हुए भोजन को इतने लंबे समय तक फ्रिज से बाहर (रूम टेम्परेचर पर) रखा जाता है, तो बैक्टीरिया को पनपने के लिए उनका 'ऑप्टिमम टेम्परेचर' (अनुकूल तापमान) मिल जाता है। इस तापमान पर बैक्टीरिया की ग्रोथ सबसे रैपिड (तेज) होती है, जिससे खाना बहुत जल्दी दूषित हो जाता है।
  • कच्चे और पके हुए भोजन को एक साथ रखना (क्रॉस-कन्टैमिनेशन) : दूसरी बड़ी गलती कच्चे खाद्य पदार्थों (Raw Foods) और पके हुए भोजन को एक ही जगह या साथ-साथ रखना है। जब हम जल्दी खराब होने वाले भोजन (HighlyPerishable Foods) और कम जल्दी खराब होने वाले भोजन (Semi-Perishable Foods) को बिना अलग किए साथ रखते हैं, तो उनके बीच क्रॉस-कन्टैमिनेशन (Cross-Contamination) यानी बैक्टीरिया के एक से दूसरे खाने में ट्रांसफर होने का जोखिम बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
  • एक ही चाकू और चॉपिंग बोर्ड का बार-बार इस्तेमाल करना : अक्सर रसोई में बर्तनों और कटलरी (चाकू, चॉपिंग बोर्ड आदि) को लेकर लापरवाही बरती जाती है। उदाहरण के लिए, जिस चाकू या बोर्ड से नॉन-वेजिटेरियन (मांसाहारी) फूड काटा गया हो, बिना अच्छी तरह धोए उसी से फल और सब्जियां भी काट ली जाती हैं। यह आदत कच्चे मांस के खतरनाक बैक्टीरिया को सीधे फलों और सलाद में पहुंचा देती है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
  • गंदे किचन नैपकिन का उपयोग और हाथों की स्वच्छता की कमी : एक और महत्वपूर्ण पहलू जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता, वह है गंदे किचन टॉवल या नैपकिन का इस्तेमाल। किचन नैपकिन को रोज बदलना और हमेशा धुला हुआ (Fresh & Washed) नैपकिन ही इस्तेमाल करना चाहिए। इसके साथ ही, रसोई में कदम रखने या खाना बनाने/परोसने से पहले हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोने की आदत को कड़ाई से फॉलो किया जाना बेहद जरूरी है।

क्या सब्जियों और फलों पर छिड़के जाने वाले केमिकल/पेस्टिसाइड्स को सिर्फ पानी से धोकर दूर किया जा सकता है? इसके लिए सबसे सुरक्षित घरेलू तरीका क्या है?

सिर्फ सादे पानी से सतह की धूल तो साफ हो सकती है, लेकिन पेस्टिसाइड्स (कीटनाशक) पूरी तरह नहीं हटते। इसके लिए सबसे सुरक्षित और वैज्ञानिक घरेलू तरीका है 'बेकिंग सोडा' (मीठा सोडा) या नमक का पानी। एक लीटर साफ पानी में एक छोटा चम्मच बेकिंग सोडा या साधारण नमक मिलाएं। इस घोल में सब्जियों और फलों को 10 से 15 मिनट या कम से कम 1 घंटा के लिए भिगोकर छोड़ दें। इसके बाद इन्हें बहते हुए साफ पानी से अच्छी तरह रगड़कर धो लें। यह आसान तरीका लगभग 80 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक हानिकारक केमिकल्स को आसानी से बेअसर कर देता है।

वर्किंग कपल्स या बिजी लाइफस्टाइल वाले लोगों के लिए 'मील प्रेप' (पहले से खाना तैयार रखना) कितना सही है? फ्रिज में कटी हुई सब्जियां या गुंथा हुआ आटा कितने दिनों तक सुरक्षित रहता है?

आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और लंबे वर्किंग आवर्स (Working Hours) के बीच 'मील प्रिपरेशन' (Meal Prep) का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है। इसका मतलब है कि पूरे हफ्ते या अगले कुछ दिनों के खाने की तैयारी पहले से करके रख लेना, ताकि ऐन वक्त पर खाना बनाते समय आपका समय बचे और सहूलियत हो। आमतौर पर लोग इसमें सब्जियां पहले से काट कर रख लेते हैं या कुछ खाना एडवांस में बनाकर स्टोर कर लेते हैं। यह तरीका समय तो बचाता है, लेकिन अगर कटी हुई सब्जियों या बने हुए खाने को सही तरीके से स्टोर न किया जाए, तो उसमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं। ऐसा दूषित खाना (Contaminated Food) आपकी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

कटी हुई सब्जियों को स्टोर करने का नियम

  • ओवरनाइट स्टोरेज: यदि आप रात में सब्जियां काटकर रख रहे हैं, तो उन्हें अगले दिन आराम से इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • समय सीमा: सब्जी किस प्रकार की है (जैसे वह जल्दी खराब होने वाली यानी Highly Perishable तो नहीं है), इस आधार पर आप सब्जियों को 1 से 2 दिन पहले भी काट कर रख सकते हैं।
  • सही तरीका: कटी हुई सब्जियों को हमेशा एयर-टाइट कंटेनर (Air-tight Container) में बंद करके फ्रिज (Refrigerate) में ही रखें।
  • हरी पत्तेदार सब्जियां: पालक, मेथी जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों (Green Leafy Vegetables) को भी आप साफ करके 1 से 2 दिन तक फ्रिज में सुरक्षित स्टोर कर सकते हैं।
  • यदि आप आटा गूंध कर फ्रिज में रख रहे हैं, तो कोशिश करें कि उसे 24 घंटे के भीतर ही इस्तेमाल (Utilize) कर लें। गूंधे हुए आटे को बहुत लंबे समय तक फ्रिज में रखने से उसमें हानिकारक बैक्टीरिया और खमीर पनपने लगता है, इसलिए ऐसा करने से बचें।
  • स्टोरेज: बचा हुआ या एडवांस में पका हुआ खाना भी आप 1 से 2 दिन तक एयर-टाइट कंटेनर में रखकर फ्रिज में स्टोर कर सकते हैं।
  • री-हीटिंग (Reheating) का नियम: फ्रिज से निकाले गए भोजन को दोबारा गर्म करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपको जितनी भूख हो या जितना खाना खाना हो, केवल उतना ही हिस्सा अलग निकालकर गर्म करें।

अक्सर एक ही वेंडर उसी हाथ से पैसे लेता है, उसी से पसीना पोंछता है और उसी से प्लेट सजाकर देता है। सिक्कों और नोटों के जरिए होने वाले इस 'क्रॉस-कंटामिनेशन' को रोकने के लिए वेंडर्स को क्या गाइडलाइंस अपनानी चाहिए?

कोविड-19 के दौर ने हमें एक बहुत बड़ा सबक सिखाया है कि बैक्टीरिया और वायरस का ट्रांसफर सिर्फ हवा या आपसी संपर्क से ही नहीं, बल्कि पैसों और करेंसी नोटों के लेन-देन के जरिए भी मुमकिन है। इस बात पर हमारा ध्यान सालों से नहीं गया था, लेकिन आज यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है कि करेंसी नोट और सिक्के भी संक्रमण (Contamination) फैलाने का एक बड़ा जरिया हैं। जब एक ही व्यक्ति पूरे स्टॉल को चलाता है, तो संक्रमण का चक्र कुछ इस तरह काम करता है: वह वेंडर उन्हीं हाथों से ग्राहकों से पैसे लेता है। पैसों को गल्ले या बॉक्स में रखने के लिए बार-बार उस बॉक्स को खोलता और बंद करता है और फिर, बिना हाथ धोए या सैनिटाइज किए उन्हीं हाथों से दोबारा आपके लिए खाना (जैसे गोलगप्पे या चाट) बनाने लगता है।

चूंकि, करेंसी नोटों पर पहले से ही न जाने कितने तरह के हानिकारक बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, इस प्रक्रिया की वजह से खाने में संक्रमण फैलने (Cross-Contamination) के चांसेस बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं।चूंकि यह सीधे तौर पर आम जनता की सेहत से जुड़ा मामला है, इसलिए इसके समाधान के लिए एंड यूजर (यानी ग्राहक) और वेंडर्स दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे।

  • ग्राहक खुद जताएं जागरूकता (End-User Awareness):एक अवेयर ग्राहक होने के नाते, यह आपकी जिम्मेदारी है कि जब आप किसी स्ट्रीट फूड वेंडर के पास जाएं, तो उससे विनम्रतापूर्वक लेकिन स्पष्ट रूप से कहें कि वह अपने हाथ अच्छी तरह धोकर या ग्लव्स पहनकर ही खाना बनाए।
  • डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा (Promote Digital Payments): नोटों के जरिए फैलने वाले बैक्टीरिया से बचने का सबसे बेहतरीन तरीका है कैशलेस या डिजिटल पेमेंट (UPI/QR Code) का इस्तेमाल। जब ग्राहक सीधे स्कैन करके पे करेंगे, तो वेंडर को बार-बार गंदे नोटों और सिक्कों को छूने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
  • स्टाफ का विभाजन (Division of Labor): स्ट्रीट फूड स्टॉल्स पर कम से कम दो लोगों का स्टाफ होना चाहिए। इनमें से एक व्यक्ति का काम सिर्फ पैसे लेने और देने का होना चाहिए, जबकि दूसरे व्यक्ति का काम सिर्फ खाना बनाने और सर्व करने का होना चाहिए। दोनों के काम आपस में मिक्स नहीं होने चाहिए।
  • सर्विंग टूल्स और ग्लव्स का इस्तेमाल: वेंडर्स को बार-बार हाथ धोने (Frequent Hand Washing) की आदत डालनी चाहिए। इसके अलावा, खाना परोसने के लिए सीधे हाथों के बजाय सर्विंग टूल्स (चम्मच, चिमटा) और डिस्पोजेबल ग्लव्स का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही, साफ-सफाई के लिए गंदे कपड़ों के बजाय सिंगल-यूज टिशूज का इस्तेमाल बेहतर विकल्प है।

आजकल कई वेंडर्स प्लास्टिक के ग्लव्स (दस्ताने) पहनने लगे हैं, लेकिन वे उन्हीं ग्लव्स को पहनकर दिनभर हर काम करते हैं। क्या यह 'ग्लव्स कल्चर' वाकई मददगार है?

आजकल कई वेंडर्स ग्लव्स पहनकर खाना सर्व करते हैं, लेकिन इससे कन्टैमिनेशन (संक्रमण) का खतरा कम नहीं होता। जो बैक्टीरिया हाथों से फैलते हैं, वही ग्लव्स के जरिए भी फैलते हैं। ग्लव्स पहनकर भी जब वेंडर बार-बार गंदे नोटों, अलग-अलग सरफेसेज या पसीने को छूते हैं, तो बैक्टीरिया ग्लव्स पर भी जमा हो जाते हैं। इसलिए ग्लव्स पहनने से बेहतर है कि वेंडर समय-समय पर अपने हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं।

खाना बनाने से लेकर खाने तक और घर से लेकर बाहर तक, आपको कुछ भी खाने से पहले हाइजीन का पूरी तरह ध्यान रखना चाहिए। तब जाकर हम इस तरह की बीमारियों से बच सकते हैं।

Published on:
10 Jun 2026 01:10 pm