Food Contamination Health News : विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसको लेकर चिंता जाहिर की है। संगठन के आंकड़ों ने ये सवाल खड़ा किया है कि हमें खानपान को लेकर हाइजीन का पूरी तरह ख्याल रखना चाहिए। एक्सपर्ट से जानिए क्यों 5 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए जानलेवा बन रहा है फूड कंटामिनेशन और कैसे बचाव कर सकते हैं।

Food Contamination In India : क्या आप जानते हैं कि जिस थाली को आप बड़े चाव से अपने परिवार के सामने परोस रहे हैं, वह देखने में जितनी साफ है, उतनी ही असुरक्षित भी हो सकती है? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट एक डराने वाला सच सामने लाती है। पूरी दुनिया में 5 साल से कम उम्र के बच्चों को असुरक्षित भोजन के कारण बीमार होने का खतरा बड़े वयस्कों की तुलना में तीन गुना अधिक होता है। वैश्विक आबादी का मात्र 9 प्रतिशत होने के बावजूद, ये मासूम बच्चे दुनिया भर में फूड-बोर्न डिजीज (भोजन से होने वाली बीमारियों) के कुल मामलों का एक-तिहाई हिस्सा भुगतते हैं।
भारत जैसे विकासशील और घनी आबादी वाले देश में यह संकट और भी गंभीर हो जाता है। फूड कंटामिनेशन (खाद्य संदूषण) हमारी आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन हमारी रसोई की छोटी सी लापरवाही इसे एक साइलेंट किलर में बदल देती है।
भारत में हर साल डायरिया (दस्त), टाइफाइड, पीलिया और फूड पॉइजनिंग के लाखों मामले सामने आते हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के अनुसार, भारत में फूड कंटामिनेशन के पैर पसारने की मुख्य वजहें बेहद बुनियादी हैं।
WHO की रिपोर्ट कहती है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों को फूड-बोर्न बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा होता है। भारत के संदर्भ में, हमारी रसोई की ऐसी कौन सी 3 आम आदतें हैं जो बच्चों को सबसे ज्यादा बीमार बना रही हैं?
फूड बोर्न इलनेस (Foodborne Illnesses) मुख्य रूप से उन बीमारियों को कहा जाता है, जो खराब या दूषित भोजन और अशुद्ध पानी के सेवन की वजह से होती हैं। इस दायरे में केवल खराब खाना ही नहीं आता, बल्कि रासायनिक उपचार वाले खाद्य पदार्थ (Chemical Treated Foods) और भोजन में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहने वाले हानिकारक टॉक्सिंस (विषाक्त पदार्थ) भी शामिल हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग 86.6 करोड़ लोग फूड बोर्न इलनेसेस के शिकार हुए हैं, जिनमें से करीबन 15 लाख लोगों की मौत भी हो चुकी है। ये आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को साफ दर्शाते हैं।
अगर हम बच्चों, विशेषकर 5 साल से छोटे बच्चों की बात करें, तो उनमें फूड बोर्न इलनेस का खतरा सबसे अधिक (Maximum) होता है। इसके पीछे दो मुख्य वैज्ञानिक कारण हैं-
आमतौर पर बच्चों को दिए जाने वाले कुछ मुख्य आहारों में संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
भारतीय घरों में बचे हुए खाने को दोबारा गर्म करके (Reheat) खाने का बहुत चलन है। एक डाइटिशियन के तौर पर, भोजन को सुरक्षित रूप से दोबारा गर्म करने का सही तरीका और समय क्या है?
अक्सर अनजाने में हम अपनी रसोई में कुछ ऐसी छोटी-छोटी गलतियां कर बैठते हैं, जो फूड बोर्न इलनेस (खाद्य जनित बीमारियों) के खतरे को कई गुना बढ़ा देती हैं। भारतीय घरों में आमतौर पर देखी जाने वाली मुख्य गलतियां हैं। जैसे-
क्या सब्जियों और फलों पर छिड़के जाने वाले केमिकल/पेस्टिसाइड्स को सिर्फ पानी से धोकर दूर किया जा सकता है? इसके लिए सबसे सुरक्षित घरेलू तरीका क्या है?
सिर्फ सादे पानी से सतह की धूल तो साफ हो सकती है, लेकिन पेस्टिसाइड्स (कीटनाशक) पूरी तरह नहीं हटते। इसके लिए सबसे सुरक्षित और वैज्ञानिक घरेलू तरीका है 'बेकिंग सोडा' (मीठा सोडा) या नमक का पानी। एक लीटर साफ पानी में एक छोटा चम्मच बेकिंग सोडा या साधारण नमक मिलाएं। इस घोल में सब्जियों और फलों को 10 से 15 मिनट या कम से कम 1 घंटा के लिए भिगोकर छोड़ दें। इसके बाद इन्हें बहते हुए साफ पानी से अच्छी तरह रगड़कर धो लें। यह आसान तरीका लगभग 80 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक हानिकारक केमिकल्स को आसानी से बेअसर कर देता है।
वर्किंग कपल्स या बिजी लाइफस्टाइल वाले लोगों के लिए 'मील प्रेप' (पहले से खाना तैयार रखना) कितना सही है? फ्रिज में कटी हुई सब्जियां या गुंथा हुआ आटा कितने दिनों तक सुरक्षित रहता है?
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और लंबे वर्किंग आवर्स (Working Hours) के बीच 'मील प्रिपरेशन' (Meal Prep) का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है। इसका मतलब है कि पूरे हफ्ते या अगले कुछ दिनों के खाने की तैयारी पहले से करके रख लेना, ताकि ऐन वक्त पर खाना बनाते समय आपका समय बचे और सहूलियत हो। आमतौर पर लोग इसमें सब्जियां पहले से काट कर रख लेते हैं या कुछ खाना एडवांस में बनाकर स्टोर कर लेते हैं। यह तरीका समय तो बचाता है, लेकिन अगर कटी हुई सब्जियों या बने हुए खाने को सही तरीके से स्टोर न किया जाए, तो उसमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं। ऐसा दूषित खाना (Contaminated Food) आपकी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
कटी हुई सब्जियों को स्टोर करने का नियम
अक्सर एक ही वेंडर उसी हाथ से पैसे लेता है, उसी से पसीना पोंछता है और उसी से प्लेट सजाकर देता है। सिक्कों और नोटों के जरिए होने वाले इस 'क्रॉस-कंटामिनेशन' को रोकने के लिए वेंडर्स को क्या गाइडलाइंस अपनानी चाहिए?
कोविड-19 के दौर ने हमें एक बहुत बड़ा सबक सिखाया है कि बैक्टीरिया और वायरस का ट्रांसफर सिर्फ हवा या आपसी संपर्क से ही नहीं, बल्कि पैसों और करेंसी नोटों के लेन-देन के जरिए भी मुमकिन है। इस बात पर हमारा ध्यान सालों से नहीं गया था, लेकिन आज यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है कि करेंसी नोट और सिक्के भी संक्रमण (Contamination) फैलाने का एक बड़ा जरिया हैं। जब एक ही व्यक्ति पूरे स्टॉल को चलाता है, तो संक्रमण का चक्र कुछ इस तरह काम करता है: वह वेंडर उन्हीं हाथों से ग्राहकों से पैसे लेता है। पैसों को गल्ले या बॉक्स में रखने के लिए बार-बार उस बॉक्स को खोलता और बंद करता है और फिर, बिना हाथ धोए या सैनिटाइज किए उन्हीं हाथों से दोबारा आपके लिए खाना (जैसे गोलगप्पे या चाट) बनाने लगता है।
चूंकि, करेंसी नोटों पर पहले से ही न जाने कितने तरह के हानिकारक बैक्टीरिया मौजूद होते हैं, इस प्रक्रिया की वजह से खाने में संक्रमण फैलने (Cross-Contamination) के चांसेस बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं।चूंकि यह सीधे तौर पर आम जनता की सेहत से जुड़ा मामला है, इसलिए इसके समाधान के लिए एंड यूजर (यानी ग्राहक) और वेंडर्स दोनों को मिलकर प्रयास करने होंगे।
आजकल कई वेंडर्स प्लास्टिक के ग्लव्स (दस्ताने) पहनने लगे हैं, लेकिन वे उन्हीं ग्लव्स को पहनकर दिनभर हर काम करते हैं। क्या यह 'ग्लव्स कल्चर' वाकई मददगार है?
आजकल कई वेंडर्स ग्लव्स पहनकर खाना सर्व करते हैं, लेकिन इससे कन्टैमिनेशन (संक्रमण) का खतरा कम नहीं होता। जो बैक्टीरिया हाथों से फैलते हैं, वही ग्लव्स के जरिए भी फैलते हैं। ग्लव्स पहनकर भी जब वेंडर बार-बार गंदे नोटों, अलग-अलग सरफेसेज या पसीने को छूते हैं, तो बैक्टीरिया ग्लव्स पर भी जमा हो जाते हैं। इसलिए ग्लव्स पहनने से बेहतर है कि वेंडर समय-समय पर अपने हाथों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं।
खाना बनाने से लेकर खाने तक और घर से लेकर बाहर तक, आपको कुछ भी खाने से पहले हाइजीन का पूरी तरह ध्यान रखना चाहिए। तब जाकर हम इस तरह की बीमारियों से बच सकते हैं।