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एक पेड़ काटकर 10 लगाना जंगल नहीं बचाता…! टूटते जंगलों के साथ बारिश का भरोसा भी टूट रहा

Forest And Rainfall Connection: पश्चिमी घाट से लेकर पूर्वोत्तर तक, भारत के जंगल तेजी से टूट रहे हैं। वैज्ञानिक से जानिए क्यों वृक्षारोपण पुराने जंगलों का विकल्प नहीं हो सकता और अगर यह क्षरण जारी रहा तो मानसून पर क्या असर पड़ सकता है? patrika.com की 'बारिश का कारखाना' में पढ़ें वैज्ञानिकों की चिंता और चेतावनी...
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Jul 21, 2026
barish ka karkhana forest and rain connection
barish ka karkhana forest and rain connection: भारत के कौन-कौन से जंगलों को खतरा, कैसे कर सकते हैं भारत में मानसून को प्रभावित। (AI creative)

Forest And Rainfall Connection: 'बारिश का कारखाना' में अब तक हमने जाना कि पेड़ बारिश बनाने की प्रक्रिया में किस तरह मदद करते हैं? जंगल सिर्फ बारिश का इंतजार नहीं करते, बल्कि उसे दोबारा आसमान तक पहुंचाने और बरसने में मदद भी करते हैं। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अगर यही जंगल तेजी से खत्म होने लगे तो क्या होगा? क्या बारिश रूठ जाएगी? यह सिर्फ पर्यावरण की कहानी नहीं है, बल्कि खेती, पेयजल, नदियों, बिजली उत्पादन और करोड़ों लोगों के भविष्य का सवाल है। भारत के कई वन क्षेत्र ऐसे हैं जो, पूरे मानसून तंत्र के लिए नमी का इंजन बने हुए हैं। लेकिन उनके गायब होने की खबरें और वैज्ञानिक शोध भी लगातार सामने आते रहते हैं। इसे देखते हुए वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि इन जंगलों का क्षरण ऐसे ही जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में वर्षा का स्वरूप और ज्यादा अनिश्चित हो सकता है।

भारत का सबसे बड़ा बारिश का कारखाना है पश्चिमी घाट

पश्चिमी घाट को भारत का सबसे बड़ा बारिश का कारखाना कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्यों कि अरब सागर से आने वाली मानसूनी हवाओं से सबसे पहले यही टकराता है। यहां के घने जंगल इवेपोट्रांसपिरेशन के जरिए वातावरण में लगातार नमी पहुंचाते हैं। यही अतिरिक्त नमी बादलों को और ज्यादा बारिश करवाने में मदद करती है। यदि इन जंगलों का क्षरण बढ़ता है, तो इसका असर केवल केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दक्षिण और मध्य भारत के वर्षा चक्र पर भी पड़ सकता है।

फैक्ट फाइल

  • पिछले दो दशकों में पश्चिमी घाट में सड़क चौड़ीकरण से लेकर रेलवे परियोजनाएं, जलविद्युत परियोजनाएं, खनन और शहरी विस्तार के कारण वन क्षेत्रों का विखंडन हुआ है। वैज्ञानिक इसे फॉरेस्ट फ्रेगमेंटेशन (Forest Fragmentation) यानी वन विखंडन कहते हैं।
  • इसमें फैला हुआ जंगल लगातार छोटे-छोटे हिस्सों में बंटता जाता है।
  • ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2001-2024 के बीच पश्चिमी घाट के कई हिस्सों खासतौर पर कर्नाटक, केरल और गोवा में लाखों हेक्टेयर ट्री कवर लॉस दर्ज किया गया है।

भारत का ये वन क्षेत्र है मिनी अमेजन फॉरेस्ट

असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और आसपास के जंगलों को दुनिया के सबसे ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल किया जाता है। 2023 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स- नेचर पोर्टफोलियो (Scientific Reports-Nature Portfolio) में प्रकाशित शोध में पूर्वोत्तर भारत को 'मिनी अमेजन' कहा गया है। इस अध्ययन के मुताबिक यहां होने वाली वार्षिक वर्षा का लगभग 45% हिस्सा स्थानीय नमी पुनर्चक्रण (Moisture Recycling) से आता है। यानी जंगल और आर्द्रभूमियां स्वयं वर्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

फैक्ट फाइल

  • पूर्वोत्तर वन क्षेत्रों में झूम खेती (Shifting Cultivation) की परम्परा रही है। पहले भूमि को पुनर्जीवित करने में 15-20 साल का समय मिलता था। लेकिन अब बढ़ती आबादी के कारण यह चक्र काफी छोटा हो गया है।
  • सड़क, बिजली परियोजनाएं, शहर विस्तार के लिए सीमा अवसंरचना और अन्य विकास परियोजनाओं के कारण वनों को नुकसान हुआ है। क्योंकि इससे यहां वनों का विखंडन लगातार बढ़ रहा है।
  • ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच (GFW), फॉरेस्टी सर्वे ऑफ इंडिया (FSI/IFSR) के मुताबिक भारत में ट्री कवर लॉस का सबसे बड़ा हिस्सा पूर्वोत्तर राज्य में दर्ज किया गया है। मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम में 2001 के बाद से अब तक वन आवरण में लगातार कमी देखी गई है।
Tree cover loss: पूर्वोत्तर भारत के टॉप 5 राज्य। (AI Infographic)

इसके प्रभाव से क्या होगा?

साइंटिफिक रिपोर्ट्स (2023) के मुताबिक पूर्वोत्तर भारत में करीब 45 फीसदी सालाना बारिश स्थानीय नमी पुनर्चक्रण से जुड़ी है। शोधकर्ता लगातार चेता रहे हैं कि वन और आद्रभूमियां घटती रहीं तो क्षेत्रीय जलचक्र प्रभावित हो सकता है।

मध्य भारत है मानसून का हरित गलियारा

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के जंगल भारत के सबसे बड़े ऐसे वन क्षेत्र हैं जो आपस में जुड़े हुए हैं। ये जंगल पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर के बीच नमी के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करते हैं। वन क्षेत्र घटने से स्थानीय तापमान बढ़ सकता है, मिट्टी की नमी कम हो सकती है और वर्षा की निरंतरता प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक मध्य भारत के वनों को मानसून स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं।

फैक्ट फाइल

पिछले कुछ सालों में मध्य भारत के मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में कोयला खदानों, रेलवे कॉरिडोर, बिजली परियोजनाओं और औद्योगिक विकास के लिए वन भूमि का डायवर्जन बढ़ा है।

MoEFCC Forest Clearance में प्रकाशित रिकॉर्ड के मुताबिक पिछले दो दशकों में यहां हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र की भूमि विकास परियोजनाओं के लिए स्वीकृत की गई हैं।

इसका असर यह हुआ

  • वन्यजीव गलियारे टूट रहे हैं।
  • मिट्टी में नमी लगातार कम हो रही है।
  • स्थानीय तापमान बढ़ने और बारिश के पैटर्न में बदलाव की आशंका भी बढ़ी है।

सवाल यह भी महत्वपूर्ण- 'भारत में जंगल बढ़ रहे हैं या फिर कम हो रहे हैं?

  • ISFR 2023 रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कुल वन क्षेत्र और वृक्ष आवरण में शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई है। जबकि ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के मुताबिक कई क्षेत्रों में प्राकृतिक जंगलों को नुकसान हुआ है, कई जंगल विखंडित हो चुके हैं।
  • बताते चलें कि ये दोनों आंकड़े एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दरअसल ISFR (Forest Survey of India, भारत सरकार) का 'वन आवरण' मापने का तरीका अलग होता है। ISFR के मुताबिक 1 हेक्टेयर से बड़ा कोई भी क्षेत्र जहां 10% से ज्यादा कैनोपी डेंसिटी हो, चाहे वह प्राकृतिक जंगल हो या प्लांटेशन/बागान, शामिल कर लिया जाता है।
  • वहीं ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच (University of Maryland के सैटेलाइट डेटा पर आधारित, एक स्वतंत्र अमेरिकी संस्था WRI का प्रोजेक्ट) हर साल सिर्फ 'ट्री कवर लॉस' को ही ट्रैक करता है, चाहे वजह जंगल कटाई हो या प्लांटेशन का हार्वेस्ट-चक्र।
  • इसलिए असल में वैज्ञानिकों की चिंता इस बात पर बढ़ी है कि कुल हरियाली भले ही बढ़ रही हो, लेकिन पुराने प्राकृतिक जंगल लगातार घट रहे हैं।

क्या कहते हैं वैज्ञानिक: डॉ. सुभाष सी. पांडे से बातचीत

Scientist Dr Subhash C Pandeyपर्यावरणविद् और वैज्ञानिक डॉ. सुभाष सी पांडे के मुताबिक पेड़ों की संख्या बढ़ाना और पुराने प्राकृतिक जंगलों का सुरक्षित रहना, यह दोनों अपने आप में अलग-अलग विषय हैं। बारिश और जैव विवधता के लिए पुराने प्राकृतिक जंगल ही ज्यादा अहम हैं।

एक पेड़ काटने के बदले 10 नये पेड़ लगाने से क्या हो सकती है जंगल की भरपाई?

-डॉ. सुभाष सी. पांडे कहते हैं कि 100-200 साल पुराने प्राकृति जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते हैं। वे मिट्टी, सूक्ष्म जीवों, पक्षियों, जानवरों, कीड़ों, जल स्रोतों और स्थानीय जलवायु का एक जटिल तंत्र हैं। लेकिन नये पेड़ ऐसे नहीं हो सकते। पुराने जंगल ज्यादा नमी छोड़ते हैं। वे बताते हैं कि बड़े और पुराने पेड़ों की जड़ें जमीन में गहराई तक होती हैं। इसलिए वे नए या छोटे पेड़ों की तुलना में कई गुना ज्यादा पानी को वाष्प के रूप में वातावरण में छोड़ते हैं। इसीलिए वे बादल बनने और वर्षा करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

लेकिन ध्यान दें 'नये पौधे रोंपना जंगल बढ़ाना नहीं'

-डॉ. सुभाष सी. पांडे कहते हैं कि एक परिपक्व प्राकृतिक वन जैसा पारिस्थितिकीय तंत्र विकसित होने में कई दशक से लेकर 100 साल या उससे भी ज्यादा का समय लग सकता है। ऐसे में नये पेड़ रोंपने से वे जंगल नहीं बन जाएंगे और न ही जंगल जैसा फायदा दे सकते हैं।

बारिश पर क्या दिखेगा असर?

-डॉ. पांडे बताते हैं कि कई अध्ययन ऐसे हैं, जो बताते हैं कि प्राकृतिक जंगल नमी पुनर्चक्रण और स्थानीय जलचक्र में वृक्षारोपण क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में एक पेड़ काटकर दस पेड़ लगाना एक पुराने जंगल का विकल्प तो बिल्कुल नहीं है। वृक्षारोपण जरूरी है, लेकिन सबसे बड़ी प्राथमिकता मौजूदा जंगलों का संरक्षण करना उन्हें बचाना होना चाहिए। 10 पेड़ों को लगाकर जंगल बढ़ाना समझने की भूल बिल्कुल न करें।

भारत में ट्री कवर लॉस के प्रमुख कारण क्या हैं?

-डॉ. सुभाष सी. पांडे के मुताबिक भारत में पिछले 24 साल 2001-2025 के दौरान ट्री कवर लॉस की स्थिति के एक नहीं कई कारण सामने आए हैं। वे GFW के 'Drivers of Forest Loss' डेटासेट, 2024 का हवाला देते हुए बताते हैं कि-

  • इसका सबसे बड़ा कारण है झूम खेती- इसका हिस्सा 60 फीसदी तक है
  • स्थायी कृषि विस्तार- 27 फीसदी
  • लकड़ी की कटाई- 8 फीसदी
  • प्राकृतिक आपदाएं- 1.5 फीसदी
  • बस्तियां और इंफ्रास्ट्रक्चर- 1.3 फीसदी तक

भारत के जंगल क्या कह रहे हैं?

भारत सरकार के India State of Forest Report (ISFR) 2023 के अनुसार देश में वन और वृक्ष आवरण का नियमित आकलन किया जाता है। ये आकलन उपग्रह के आंकड़ों और राष्ट्रीय वन सूची के आधार पर किया जाता है। ISFR 2023 रिपोर्ट में बताया गया है कि, जंगल केवल जैव विविधता ही नहीं, बल्कि कार्बन भंडारण, जल संरक्षण और जलवायु संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

barish ka karkhana forest fact file forest and rain connection (AI Generated Infographic)

वैश्विक चेतावनी

Global Forest Watch समेत कई वैश्विक निगरानी प्रणालियां वन क्षरण और भूमि उपयोग परिवर्तन पर लगातार नजर रख रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि बड़े वन क्षेत्रों का विखंडन इसी तरह जारी रहा, तो स्थानीय और क्षेत्रीय वर्षा चक्र दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

बारिश का कारखाना केवल आसमान से नहीं चलता। उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं धरती पर खड़े घने और खूबसूरत जंगल। इसीलिए वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि भारत में पेड़ कम हो रहे हैं। उनकी चिंता है कि वे प्राकृतिक जंगल टूट रहे हैं, जो मानसून, नदियों और जल सुरक्षा की रीढ़ हैं।

Updated on:
21 Jul 2026 05:38 pm
Published on:
21 Jul 2026 05:33 pm