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क्या जंगलों की कटाई बदल रही है बारिश का गणित? वैज्ञानिक शोधों से जानिए असर

Monsoon Rainfall by forests: क्या जंगलों की कटाई से बारिश का पैटर्न पूरी तरह बदल सकता है? इवेपोट्रांसपिरेशन, मॉइश्चर रिसाइक्लिंग, पश्चिमी घाट, मध्य भारत और वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर जंगलों और मानसून का कितना गहरा संबंध? patrika.com की खास रिपोर्ट में वैज्ञानिक शोध से समझें जंगलों का बारिश पर असर
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Jul 20, 2026
Forest Cutting impact on Monsoon rain
Forest Cutting impact on Monsoon rain: क्या जंगल बदल सकते हैं बारिश का गणित? जानें क्या कहते हैं वैज्ञानिक? (AI Generated Creative)

Monsoon Rainfall by forests: क्या कोई जंगल सैकड़ों किलोमीटर दूर होने वाली बारिश को भी प्रभावित कर सकता है? क्या पेड़ों के कम होने से बादल अपना रास्ता बदल सकते हैं? पहली नजर में यह सवाल कल्पना जैसे लग सकते हैं, लेकिन पिछले एक दशक में भारत और दुनिया के कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिए हैं कि जंगल केवल बारिश का परिणाम नहीं हैं, बल्कि वर्षा की पूरी प्रक्रिया के सक्रिय भागीदार भी हैं। इसीलिए जंगलों की कटाई का असर केवल हरियाली तक सीमित नहीं रह जाता। यह संपूर्ण जल चक्र, स्थानीय तापमान, हवा की नमी और मानसून के व्यवहार को भी प्रभावित कर सकता है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि वर्षा में बदलाव के लिए जहां समुद्री तापमान, एल-नीनो, जलवायु परिवर्तन और अन्य वायुमंडलीय कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहीं जंगल भी इस बदलाव के लिए बड़े सहयोगी हैं। 'बारिश का कारखाना' के इस भाग में पढ़ें अमेजन के जंगलों की तरह क्या भारत के जंगल भी प्रभावित कर सकते हैं बारिश का पैटर्न?

पेड़ कटे तो बादलों का ईंधन भी घटता है

भू एवं पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. सुभाष सी. पांडेय बताते हैं कि दरअसल जंगलों के पेड़ों की जड़ें गहराई तक होती हैं। यही पेड़ अपनी जड़ों का उपयोग कर जमीन से पानी खींचकर पत्तियों तक पहुंचाते हैं और पत्तों के जरिये यह पानी वातावरण में छोड़ते हैं। पेड़ों द्वारा इस तरह वातावरण में नमी छोड़ने की प्रक्रिया को इवेपोट्रांसपिरेशन (Evapotranspiration) कहा जाता है। यही नमी हवा में मिलकर बादलों के बनने और उनसे वर्षा कराने की प्रक्रिया को मजबूत करती है। लेकिन जब बड़े पैमाने पर जंगल काट दिए जाते हैं तो, वातावरण में जाने वाली यह अतिरिक्त नमी कम हो जाती है। इससे बादलों के बनने और वर्षा के वितरण पर असर पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इसका प्रभाव केवल उसी जंगल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हवा के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है। लेकिन वे बताते हैं कि यह पेड़ों का बारिश में योगदान को लेकर अमेजन के जंगलों में दशकों से हो रहे शोधों से अवधारणा बनी है कि पेड़ वातावरण में नमी छोड़ते हैं और बारिश बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

Amazon Forest Rainfall system: अमेजन के जंगलों पर दशकों से हुए शोध, तब बनी अवधारणा पेड़ भी बारिश के लिए देते हैं योदगदान। (AI Generated Infographic)

क्या अमेजन के जंगलों जैसा प्रभाव भारत में भी?

अमेजन वर्षा वनों पर दशकों से हुए शोधों में नमी पुनर्चक्रण की अवधारणा सामने आई। जिससे स्पष्ट हुआ कि जंगल केवल बारिश पर निर्भर नहीं होते, बल्कि वे स्वयं भी वातावरण में नमी लौटाते हैं और वर्षा चक्र को मजबूत करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि अमेजन के जंगल स्वयं वातावरण में भारी मात्रा में नमी को वापस भेजते हैं। भारत में भी नमी पुनर्चक्रण पर अध्ययन किए जा रहे हैं। लेकिम अब तक वैज्ञानिक सहमति विकसित नहीं हो पाई है। अब तक उपलब्ध शोध बताते हैं कि भारत में भी वन स्थानीय और क्षेत्रीय वर्षा को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन अमेजन जैसी निर्भरता भारत के जंगलों पर सिद्ध नहीं हुई है।

भारत में क्या कहते हैं शोध?

  • भारत में भी वन स्थानीय और क्षेत्रीय वर्षा को प्रभावित करते हैं।
  • खासकर पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर और मध्य भारत में
  • IIT, IISc, IMD और अन्य संस्थानों के शोध बताते हैं कि जंगलों से उठने वाली नमी मानसून को मजबूत करने में भूमिका निभाती है।
  • लेकिन अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत की वर्षा कितने प्रतिशत तक स्थानीय नमी पुनर्चक्रण पर निर्भर है, ठीक उसी तरह जैसे अमेजन में देखने में आया है।

बारिश केवल समुद्र से नहीं आती, जंगल भी उसका हिस्सा

अक्सर माना जाता है कि भारत का मानसून केवल अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी पर निर्भर है। लेकिन वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि समुद्र से आने वाली नमी की यात्रा के दौरान जंगल भी लगातार वातावरण में जलवाष्प छोड़ते रहते हैं। इसे मॉइस्चर रिसाइक्लिंग (Moisture Recycling) कहा जाता है। इसका अर्थ है वह पानी जो बारिश बनकर जमीन पर गिरता है, उसका एक हिस्सा पेड़ों के माध्यम से फिर हवा में लौटता है और आगे दूसरे क्षेत्रों में वर्षा बनने में योगदान देता है। यदि यह प्राकृतिक चक्र कमजोर पड़ता है तो आगे के क्षेत्रों में वर्षा का स्वरूप भी बदल सकता है।

जंगलों का भूमि उपयोग बदलने से दिखता है मानसून पर असर

आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) के प्रो. सुबिमल घोष, सुपंथा पॉल और उनके सहयोगियों के 2016 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स (Scientific Reports) में प्रकाशित अध्ययन 'जमीन के इस्तेमाल और जमीन पर मौजूद चीजों में बदलाव के कारण भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की बारिश में कमी' (Weakening of Indian Summer Monsoon Rainfall Due to Changes in Land Use Land Cover) में 1987 से 2005 के बीच भारत में भूमि उपयोग में हुए बदलावों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि जहां जंगलों में कृषि या अन्य भूमि उपयोग बढ़ा, वहां इवेपोट्रांसपिरेशन और पुनर्चक्रित नमी में कमी देखी गई।

मॉडलिंग से मिले संकेत

मॉडलिंग से संकेत मिले कि इससे मानसून के पैटर्न पर भी असर पड़ा। कहीं वर्षा कम हुई तो, कहीं अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे केवल जंगलों की कटाई नहीं, बल्कि समुद्री तापमान, जलवायु परिवर्तन, एरोसोल और अन्य वायुमंडलीय कारण भी जिम्मेदार हैं। फिर भी भूमि उपयोग में बदलाव और वनों की कटाई को मानसून में बदलाव के महत्वपूर्ण कारणों में से एक माना गया है।

Forest Cutting Impact: आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर डॉ. सुबिमल घोष ने बताया, जंगलों की कटाई से बारिश कैसे हो सकती है प्रभावित? मीडिया को दिए एक इंटरव्यू के दौरान दी थी जानकारी।

भारत के तीन बड़े 'नमी के केंद्र' कौन से हैं

2023 में वॉटर रिसोर्सेज रिसर्च (Water Resources Research) में प्रकाशित अध्ययन 'भारत में विभिन्न स्थानिक-लौकिक पैमानों पर पुनर्चक्रित वर्षण को समझना (Understanding Recycled Precipitation at Different Spatio-Temporal Scales Over India) के अनुसार भारत के तीन वन क्षेत्र मानसूनी नमी के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मध्य भारत मानसून के दौरान पुनर्चक्रित नमी का प्रमुख स्रोत है। बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी प्रणालियां यहां से गुजरते समय अतिरिक्त नमी प्राप्त करती हैं। पूर्वोत्तर भारत पुनर्चक्रित वर्षा का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता माना गया है। यहां होने वाली वर्षा का बड़ा हिस्सा भारत के अन्य भूभागों से दोबारा वातावरण में पहुंची नमी से जुड़ा है।

forest cutting impact facts: जंगल कितने जरूरी हैं। (AI generated Infographic)

पश्चिमी घाट दक्षिण भारत में जल चक्र का आधार

वहीं पश्चिमी घाट दक्षिण भारत के जल चक्र का महत्वपूर्ण आधार हैं। 2018 के एक अध्ययन के अनुसार पश्चिमी घाट के जंगल तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कई हिस्सों की मानसूनी वर्षा में लगभग 25 से 40 प्रतिशत तक नमी का योगदान देते हैं। सूखे वर्षों में यह योगदान 50 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इन तीनों वन क्षेत्रों को भारत की मानसूनी प्रणाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं।

जंगल कटे तो सूखा भी और बाढ़ भी

सुनने में भले ही यह बात विरोधाभासी लग सकती है कि जंगलों की कटाई से सूखा और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन वैज्ञानिक इसके पीछे स्पष्ट कारण बताते हैं। घने जंगल वर्षा के पानी को रोकते हैं, उसे धीरे-धीरे जमीन में पहुंचाते हैं और लंबे समय तक नदियों तथा भूजल को पानी उपलब्ध कराते रहते हैं। जंगल कम होने पर बारिश का पानी तेजी से बह जाता है। इससे वर्षा के समय बाढ़ का खतरा बढ़ता है, जबकि कुछ समय बाद वही क्षेत्र भूजल की कमी और जल संकट का सामना करने लगता है। इससे स्पष्ट है कि जंगल केवल बारिश लाने में ही नहीं, बल्कि बारिश के पानी को सहेजने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सबसे ज्यादा बारिश वाले इलाके भी यही कहानी बताते हैं

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और मॉइस्चर रिसाइक्लिंग पर प्रकाशित अध्ययनों के मुताबिक भारत में सबसे ज्यादा वर्षा मेघालय के मौसिनराम और चेरापूंजी में होती है। यहां हर साल लगभग 10 से 12 हजार मिलीमीटर तक बारिश दर्ज की जाती है। इस भारी बारिश का सबसे बड़ा कारण बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी और खासी पहाड़ियों की भू-आकृति है। नमी से भरी हवाएं इन पहाड़ियों से टकराकर ऊपर उठती हैं, ठंडी होती हैं और भारी वर्षा का कारण बनती हैं। हालांकि यहां के घने जंगल भी स्थानीय स्तर पर हवा में नमी बनाए रखने, मिट्टी की आर्द्रता बढ़ाने और जल चक्र को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां हम कह सकते हैं कि अगर बारिश का असली इंजन समुद्र और पहाड़ हैं, तो जंगल उस पूरी प्रणाली को लगातार ऊर्जा देने वाला स्रोत हैं। इसीलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि समुद्र, पहाड़ और जंगल मिलकर वर्षा प्रणाली का संचालन करते हैं।

forest cutting scientist warning: AI Generated Infographic

चेतावनी: भारत और दुनिया के कई शोधों से पता चलता है कि बड़े पैमाने पर वनों की कटाई का असर केवल पेड़ों की संख्या तक सीमित नहीं रहता। इससे जल चक्र, स्थानीय तापमान, हवा की नमी और वर्षा का स्वरूप भी प्रभावित हो सकता है। हालांकि किसी एक क्षेत्र में वर्षा कम या ज्यादा होने का कारण केवल जंगल नहीं होते। इसके पीछे समुद्री तापमान, एल-नीनो, जलवायु परिवर्तन और अन्य वायुमंडलीय प्रक्रियाएं भी जिम्मेदार होती हैं। फिर भी वैज्ञानिक मानते हैं कि जंगल इन जोखिमों को कम करने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उनके शोध कुल मिलाकर यही साबित करते हैं कि समुद्र मानसून को नमी देता है, पहाड़ उसे बारिश का स्वरूप देते हैं और जंगल…? जंगल उस नमी और बारिश की पूरी प्रक्रिया को संतुलित बनाए रखने के लिए उसे ऊर्जा देते रहते हैं। इसीलिए जंगलों का संरक्षण केवल जैव विविधता का सवाल मात्र नहीं रह जाता, बल्कि देश की जल सुरक्षा और भविष्य की वर्षा प्रणाली से भी जुड़ा हुआ है। 'बारिश का कारखाना' के अगले भाग में हम जानेंगे भारत के किन-किन जंगलों का बदल रहा रूप, कैसे दिख रहे बदलाव और ये कहीं मानसून के लिए खतरे की घंटी तो नहीं?

Updated on:
20 Jul 2026 04:12 pm
Published on:
20 Jul 2026 04:01 pm