
Chhattisgarh News: कभी अबूझमाड़ में सरकारी व्यवस्थाओं की कमी का कारण नक्सलवाद को बताया जाता था। लेकिन अब जब क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सामान्य स्थिति की ओर लौट चुका है, तब भी आदिवासी बच्चों के लिए संचालित गारपा बालक आश्रम शाला की बदहाल व्यवस्था कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। पत्रिका की जमीनी पड़ताल में सामने आया कि 46 आदिवासी बच्चों के लिए संचालित इस आश्रम में पिछले एक माह से अधीक्षक नहीं है। बच्चों को प्रतिदिन केवल दाल-चावल परोसा जा रहा है और वे शौचालय, मच्छरदानी, साबुन तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं से वंचित हैं।
जानकारी के अनुसार तुडक़ो में पदस्थ शिक्षक विनोद यादव पिछले सत्र तक अतिरिक्त प्रभार के रूप में अधीक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत में उन्होंने लिखित रूप से यह दायित्व निभाने में असमर्थता जताई। इसके बावजूद आदिम जाति कल्याण विभाग ने नए अधीक्षक की नियुक्ति नहीं की। परिणामस्वरूप आश्रम पिछले एक महीने से बिना अधीक्षक के संचालित हो रहा है। आश्रम में पिछले सत्र का बचा हुआ चावल और दाल ही बच्चों के भोजन का सहारा है। अधीक्षक नहीं होने के कारण नया राशन खरीदा नहीं जा सका। फल, हरी सब्जियां, दूध नहीं दिए जा रहे हैं।
आश्रम में पांच शिक्षक पदस्थ हैं, जिनमें दो शिक्षिकाएं और तीन शिक्षक शामिल हैं। सभी शिक्षक दिन में पढ़ाकर शाम को जिला मुख्यालय लौट जाते हैं। रात के समय बच्चों की सुरक्षा और देखभाल के लिए कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं रहता। आश्रम परिसर में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। बच्चों को रो•ा जंगल में शौच के लिए जाना पड़ता है। 16 जुलाई को शौच के दौरान बच्चों के सामने सांप आ गया, जिससे वे डरकर भागे और बड़ा हादसा टल गया।
नया शिक्षा सत्र 16 जून से शुरू होने के बाद 46 बच्चों ने आश्रम में प्रवेश लिया था। लेकिन भोजन और अन्य सुविधाओं के अभाव में अधिकांश बच्चे अपने-अपने गांव लौट गए। वर्तमान में केवल 10 बच्चे ही आश्रम में रहकर आवासीय शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। सरकार की नियद नेल्लानार योजना के तहत अबूझमाड़ में शिक्षा और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन गारपा आश्रम शाला की बदहाल स्थिति इन दावों की हकीकत उजागर करती है। जब नक्सलवाद अब बहाना नहीं रहा, तब आदिवासी बच्चों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन है?
शिक्षा सत्र शुरू होने पर यहां 46 बच्चों ने प्रवेश लिया था। लेकिन लगातार बिगड़ती व्यवस्था, भोजन की कमी और सुविधाओं के अभाव के कारण अधिकांश बच्चों ने आश्रम छोड़ दिया। आज यहां केवल 10 बच्चे रह गए हैं। यह केवल एक संख्या नहीं बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
आश्रम में पांच शिक्षक पदस्थ हैं, जिनमें दो शिक्षिकाएं और तीन शिक्षक शामिल हैं। सभी शिक्षक दिन में पढ़ाकर शाम को जिला मुख्यालय लौट जाते हैं। रात के समय बच्चों की देखभाल, सुरक्षा और निगरानी के लिए कोई जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी मौजूद नहीं रहता। इस स्थिति से बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है। अभिभावकों का कहना है कि आवासीय विद्यालय में रहने वाले बच्चों के लिए चौबीसों घंटे जिम्मेदार अधिकारी का होना आवश्यक है, लेकिन यहां ऐसा कोई इंतजाम नहीं है।
राज्य सरकार की नियद नेल्लानार योजना के तहत अबूझमाड़ क्षेत्र में शिक्षा और विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन गारपा आश्रम की वास्तविक स्थिति इन दावों की सच्चाई सामने ला रही है। जब क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हो चुकी है और नक्सलवाद अब व्यवस्थागत कमियों का प्रमुख कारण नहीं रहा, तब भी आदिवासी बच्चों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहना पड़ रहा है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इन व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी किसकी है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि आश्रम में बच्चों से काम कराया जाता है तथा कुछ भृत्यों द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। इन आरोपों की जांच की मांग की जा रही है।
गारपा आश्रम में अधीक्षक ने प्रभार संभालने में असमर्थता जताई है। फिलहाल वहां पदस्थ शिक्षक से अस्थायी रूप से कार्य लिया जाएगा। मंडल संयोजक को गारपा भेजा गया है और जो भी समस्याएं हैं, उनका तत्काल निराकरण किया जाएगा।’’
वीरेंद्र बहादुर पंचभाई, अपर कलेक्टर, नारायणपुर
गारपा के सरपंच सन्नू ध्रुव ने बताया कि उन्होंने कई बार सहायक आयुक्त राजेंद्र ङ्क्षसह से नए अधीक्षक की नियुक्ति की मांग की। हर बार जल्द व्यवस्था करने का आश्वासन मिला, लेकिन एक महीने बाद भी कोई अधिकारी नहीं पहुंचा।
एक माह से अधीक्षक का पद खाली
46 बच्चों के लिए केवल दाल-चावल का भोजन
नया राशन नहीं खरीदा गया
शौचालय की सुविधा नहीं
साबुन, तेल और दैनिक उपयोग की सामग्री का अभाव
मच्छरदानियां नहीं, मलेरिया का खतरा
रात में बच्चों की देखरेख के लिए कोई जिम्मेदार अधिकारी नहीं
बच्चों से काम कराने और भृत्यों द्वारा दुव्र्यवहार के आरोप
सुविधाओं के अभाव में 46 में से केवल 10 बच्चे ही आश्रम में रह गए