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बस्तर में खत्म होती जा रही प्राकृतिक संपदा, हर्रा-बहेड़ा अब दुर्लभ वनौषधि बनने की ओर

Bastar Herbs Decline: बस्तर में हर्रा-बहेड़ा उत्पादन में 90% गिरावट, जंगलों की कटाई और मौसम बदलाव से वनोपज संकट गहराया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर, वनौषधियों के संरक्षण की मांग तेज।
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Forest Produce Decline
बस्तर में खत्म होती प्राकृतिक संपदा (photo source- Patrika)

बस्तर अंचल के जंगलों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाली बहुमूल्य वनौषधियां हर्रा और बहेड़ा गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। पिछले तीन वर्षों से इनकी खरीदी लगभग बंद है और उत्पादन में करीब 90 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। जंगलों में फलन कम होने से वनाश्रित परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है, वहीं आयुर्वेदिक दवाओं का कारोबार भी संकट में आ गया है। विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों की कटाई, अनियमित बारिश और बढ़ता तापमान इसके प्रमुख कारण हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है।

तीन वर्षों से खरीदी बंद, बाजार में भी गहराई कमी

बस्तर अंचल में पिछले तीन वर्षों से हर्रा-बहेड़ा की सरकारी खरीदी लगभग ठप पड़ी है। जंगलों में अपेक्षित मात्रा में फल नहीं मिलने के कारण इन वनोपजों की बाजार में आवक बेहद कम हो गई है। इसका सीधा असर उन हजारों वनाश्रित परिवारों पर पड़ा है, जो हर साल जंगलों से इन उत्पादों का संग्रह कर अपनी आजीविका चलाते थे। खरीदी बंद होने से ग्रामीणों की आमदनी का एक महत्वपूर्ण स्रोत खत्म हो गया है और वन आधारित अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती जा रही है।

जंगलों में घटता उत्पादन, ग्रामीणों की बढ़ी चिंता

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कुछ साल पहले तक जंगलों में हर्रा और बहेड़ा के पेड़ों पर भरपूर फल लगते थे और संग्रहण आसानी से हो जाता था। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। कई इलाकों में पेड़ों पर फल बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। इसके कारण संग्रहण कार्य भी प्रभावित हो रहा है और ग्रामीणों को दूर-दराज के जंगलों तक जाना पड़ रहा है, फिर भी पर्याप्त मात्रा में वनोपज नहीं मिल पा रही है।

मौसम बदलाव और जंगल कटाई बने बड़े कारण

वन विशेषज्ञों के अनुसार हर्रा-बहेड़ा के उत्पादन में आई भारी गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण पर्यावरणीय असंतुलन है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अनियमित बारिश, बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन ने इन वनौषधीय पेड़ों के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है। इससे न केवल उत्पादन घटा है, बल्कि कई स्थानों पर पेड़ों की सेहत भी कमजोर हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में ये वनौषधियां और अधिक दुर्लभ हो सकती हैं।

दरभा, कुरंदी और लोहंडीगुड़ा सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार बस्तर के दरभा, कुरंदी और लोहंडीगुड़ा क्षेत्र हर्रा-बहेड़ा उत्पादन के प्रमुख केंद्र रहे हैं। इन इलाकों में बड़ी संख्या में वनाश्रित परिवार वनोपज संग्रहण पर निर्भर थे। लेकिन उत्पादन में भारी गिरावट के कारण इन परिवारों की आय में लगातार कमी आ रही है। कई परिवारों के सामने वैकल्पिक रोजगार की समस्या भी खड़ी हो गई है।

वन आधारित अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट

हर्रा-बहेड़ा जैसे वन उत्पाद केवल औषधीय महत्व ही नहीं रखते, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं। इन वनोपजों की कमी से जंगल पर निर्भर समुदायों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है। संग्रहण कार्य में कमी आने से स्थानीय बाजारों और व्यापारियों पर भी असर पड़ रहा है, जिससे पूरी आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है।

संरक्षण और पौधरोपण की उठी मांग

स्थिति को देखते हुए वन विभाग और सामाजिक संगठनों द्वारा हर्रा-बहेड़ा के संरक्षण और पौधरोपण की मांग तेज हो गई है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि जंगलों में इन प्रजातियों का वैज्ञानिक तरीके से रोपण किया जाए और संरक्षण पर ध्यान दिया जाए, तो आने वाले वर्षों में उत्पादन को फिर से बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए ठोस सरकारी योजना की आवश्यकता बताई जा रही है।

आयुर्वेद में अहम भूमिका, त्रिफला से जुड़ी परंपरा

हर्रा और बहेड़ा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। आंवला के साथ मिलकर बनने वाला त्रिफला चूर्ण पाचन तंत्र को मजबूत करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कई बीमारियों के उपचार में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा इनका उपयोग विभिन्न आयुर्वेदिक दवाओं, चूर्ण, तेल और स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों के निर्माण में भी किया जाता है। ऐसे में इन वनौषधियों का संरक्षण न केवल पर्यावरण, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा के लिए भी जरूरी हो गया है।

इन पेड़ों की भी विलुप्त होने की संभावना

बस्तर और मध्य भारत के घने जंगलों में हर्रा-बहेड़ा जैसी कई अन्य औषधीय और उपयोगी वृक्ष प्रजातियां भी तेजी से घट रही हैं और कुछ तो विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। इनमें सबसे प्रमुख साल, चार, आंवला और पलाश जैसे पेड़ शामिल हैं, जो कभी जंगलों की पहचान और ग्रामीण आजीविका का बड़ा आधार थे। साल वृक्ष (शाल) भी गंभीर दबाव में है, जिसकी कटाई और जंगलों के सिकुड़ने से इसकी प्राकृतिक वृद्धि प्रभावित हो रही है। वहीं चार (चारोली) और आंवला जैसे फलदार और औषधीय वृक्ष भी अब पहले जैसी मात्रा में नहीं मिल रहे हैं।

वन विशेषज्ञों के अनुसार इन प्रजातियों पर जंगल कटाई, अनियमित वर्षा, तापमान वृद्धि और मानवीय हस्तक्षेप का सीधा असर पड़ा है। यदि समय रहते संरक्षण और पुनरोपण पर ध्यान नहीं दिया गया तो ये वृक्ष आने वाले समय में दुर्लभ या विलुप्त भी हो सकते हैं, जिससे न केवल पर्यावरण बल्कि वनाश्रित समुदायों की आजीविका भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी।

ग्रामीणों पर पड़ सकता है गंभीर असर

पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है, क्योंकि इन वनोपजों का उपयोग केवल बिक्री के लिए ही नहीं, बल्कि घरेलू जरूरतों और पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है। सबसे गंभीर असर यह होता है कि कर्ज और पलायन की स्थिति बढ़ सकती है। आय कम होने पर परिवार कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं और कुछ लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगते हैं। इसके अलावा, जंगलों पर निर्भर महिलाओं की आर्थिक भागीदारी भी घटती है, क्योंकि वनोपज संग्रहण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कुल मिलाकर, वन उत्पादों में गिरावट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण जीवन, आजीविका और सामाजिक ढांचे पर भी सीधा असर डालने वाला गंभीर संकट बन जाता है।

Updated on:
30 May 2026 12:22 pm
Published on:
30 May 2026 12:22 pm