LED Lights affects Women fertility: क्या LED लाइट और मोबाइल की रोशनी महिलाओं में इनफर्टिलिटी की वजह बन रही है? जानिए डॉक्टर मेघा .एस. शास्त्री से कैसे नाइट शिफ्ट और ब्लू लाइट बॉडी क्लॉक को बिगाड़कर मेलाटोनिन हार्मोन को रोकते हैं, जिससे पीरियड्स अनियमित होते हैं और एग क्वालिटी खराब होती है। इस गंभीर समस्या, मिसकैरेज के बढ़ते खतरे और इससे बचने के आसान उपायों को जानिए।
LED Lights affects Women fertility: कितना अजीब है ना, आज की मॉडर्न लाइफस्टाइल में हमारा सूरज से नाता कम और आर्टिफिशियल लाइट से ज्यादा हो गया है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हम स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी और घर में लगी चमचमाती एलईडी (LED) लाइट्स के घेरे में रहते हैं। इसके अलावा, बदलते वर्क कल्चर के कारण लाखों महिलाएं आज नाइट शिफ्ट (Night Shift) या रोटेशनल शिफ्ट में काम कर रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रात के समय स्क्रीन और इन LED लाइट्स से निकलने वाली तेज रोशनी आपकी सेहत को सिर्फ थका ही नहीं रही, बल्कि आपके मां बनने के सपने (Fertility) पर भी गहरा असर डाल रही है ?
Light Pollution: हालिया मेडिकल रिसर्च और एक्सपर्ट्स का मानना है कि 'लाइट पोल्यूशन' और 'सर्कैडियन रिदम' (Circadian Rhythm) में गड़बड़ी महिलाओं के रीप्रोडक्टिव सिस्टम यानी प्रजनन क्षमताको सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है। आइए इस आर्टिकल में विस्तार से समझते हैं कि आखिर रात की रोशनी और फर्टिलिटी का क्या कनेक्शन है और इससे कैसे बचा जा सकता है।
जब हम कहते हैं कि LED लाइट्स फर्टिलिटी को प्रभावित करती हैं, तो सबसे पहले मन में यह डर आता है कि क्या इन लाइट्स से कोई खतरनाक रेडिएशन (विकिरण) निकलता है?
आप जब रात 10 बजे के बाद भी तेज LED लाइट में बैठते हैं या मोबाइल स्क्रॉल करते हैं, तो वह ब्लू लाइट आपकी आंखों के रास्ते दिमाग को सिग्नल भेजती है कि अभी दिन है! दिमाग धोखा खा जाता है और मेलाटोनिन का प्रोडक्शन तुरंत रोक देता है। मेलाटोनिन की कमी का सीधा असर अंडों की क्वालिटी पर पड़ता है।
अगर आप अपनी फर्टिलिटी को बेहतर बनाना चाहती हैं, कंसीव (Conceive) करने की प्लानिंग कर रही हैं, या सिर्फ अपने पीरियड्स को रेगुलर रखना चाहती हैं, तो आपको अपनी 'लाइट हाइजीन' बदलनी होगी। इसके लिए कुछ बेहद आसान और प्रैक्टिकल स्टेप्स नीचे दिए गए हैं।
अगर आपकी नौकरी ऐसी है जिसे बदला नहीं जा सकता, तो भी आप कुछ स्मार्ट आदतों से अपने रीप्रोडक्टिव सिस्टम को डैमेज होने से बचा सकती हैं:
आम तौर पर लोग लाइट को सिर्फ सोने-जागने से जोड़कर देखते हैं। क्या रात की आर्टिफिशियल लाइट (ALAN) सच में महिला के रीप्रोडक्टिव हार्मोन्स को प्रभावित कर सकती है?
रात की आर्टिफिशियल लाइट (ALAN) महिला के रीप्रोडक्टिव हार्मोन्स को सीधे प्रभावित करती है। जब रात में तेज एलईडी या मोबाइल की 'ब्लू लाइट' आंखों पर पड़ती है, तो दिमाग का मास्टर क्लॉक धोखा खा जाता है। इससे स्लीप हार्मोन मेलाटोनिन का बनना बंद हो जाता है। मेलाटोनिन सिर्फ सुलाता नहीं, बल्कि प्रजनन प्रणाली (reproductive system) को नियंत्रित करने वाले HPO एक्सिस (Hypothalamic Pituitary Ovarian axis) की रक्षा भी करता है। इसकी कमी से GnRH (गोनाडोट्रोपिन-रिलीज़िंग हार्मोन ) और LH( ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन) हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे ओव्यूलेशन (अंडे का रिलीज होना) रुक सकता है, पीरियड्स अनियमित हो जाते हैं और प्रोजेस्टेरोन का स्तर गिरने से गर्भधारण में मुश्किलें आती हैं।
स्मार्टफोन और LED लाइट्स से निकलने वाली 'ब्लू लाइट' (Blue Light) हमारे स्लीप हार्मोन मेलाटोनिन को कैसे रोकती है? क्या मेलाटोनिन का अंडों की क्वालिटी (Egg Quality) से कोई सीधा संबंध है?
स्मार्टफोन और LED से निकलने वाली शॉर्ट-वेवलेंथ 'ब्लू लाइट' आंखों के रेटिना पर पड़ते ही दिमाग के मास्टर क्लॉक (SCN) को दिन होने का भ्रम देती है। इससे पीनियल ग्लैंड मेलाटोनिन का प्रोडक्शन तुरंत रोक देती है। मेलाटोनिन का अंडों की क्वालिटी (Egg Quality) से बिल्कुल सीधा संबंध है। महिला के अंडाशय के फॉलिक्युलर फ्लूइड में मेलाटोनिन उच्च मात्रा में होता है। यह एक स्ट्रांग एंटीऑक्सीडेंट है जो अंडों को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और फ्री-रेडिकल्स से बचाता है। मेलाटोनिन की कमी से अंडों के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया (ऊर्जा केंद्र) कमजोर हो जाते हैं, जिससे एग क्वालिटी घटती है और भ्रूण बनने में दिक्कत आती है।
जो महिलाएं कंसीव (गर्भधारण) करने की कोशिश कर रही हैं और नाइट शिफ्ट में हैं, क्या उनमें मिसकैरेज (गर्भपात) या इम्प्लांटेशन फेलियर का खतरा डे-शिफ्ट वाली महिलाओं से ज्यादा होता है? इस पर रिसर्च क्या कहती है?
नाइट शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं में मिसकैरेज (गर्भपात) और इम्प्लांटेशन फेलियर का खतरा डे-शिफ्ट वाली महिलाओं की तुलना में 20% से 30% तक ज्यादा होता है। इसकी मुख्य वजह शरीर में प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) हार्मोन की कमी है। जब रात में जागने से सर्कैडियन रिदम बिगड़ता है, तो प्रोजेस्टेरोन का स्तर गिर जाता है। यह हार्मोन गर्भाशय की परत (Uterus Lining) को मजबूत बनाता है ताकि भ्रूण वहां चिपक (Implant) सके। इसके अलावा, रात में मेलाटोनिन (एंटीऑक्सीडेंट) न बनने से अंडों की क्वालिटी कमजोर होती है, जिससे क्रोमोसोमल कमियां आ सकती हैं और शुरुआती हफ्तों में ही गर्भपात का रिस्क बढ़ जाता है।
क्या क्रॉनिक सर्कैडियन डिसरप्शन (लगातार बॉडी क्लॉक बिगड़ना) आगे चलकर PCOS या ओव्यूलेशन न होने (Anovulation) जैसी बड़ी बीमारियों का कारण बन सकता है?
हां, क्रॉनिक सर्कैडियन डिसरप्शन (लगातार बॉडी क्लॉक बिगड़ना) आगे चलकर पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) और एनोव्यूलेशन (Anovulation) का बड़ा कारण बन सकता है। जब शरीर की आंतरिक घड़ी लंबे समय तक डिस्टर्ब रहती है, तो यह केवल रीप्रोडक्टिव हार्मोन्स को ही नहीं, बल्कि मेटाबॉलिज्म को भी बिगाड़ देती है। इससे शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) और कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का स्तर बढ़ जाता है। बढ़ा हुआ इंसुलिन अंडाशय को अधिक एण्ड्रोजन (पुरुष हार्मोन) बनाने के लिए उकसाता है, जो PCOS का मुख्य लक्षण है। नतीजा, ओवरी में सिस्ट बनने लगते हैं, अंडे मैच्योर होकर रिलीज नहीं हो पाते और ओव्यूलेशन पूरी तरह रुक जाता है।
फर्टिलिटी के क्षेत्र में रेड LED लाइट थेरेपी (Photobiomodulation) की काफी चर्चा है। क्या सच में यह अंडों की कोशिकाओं (Mitochondria) को रीचार्ज करने में मदद करती है? भारत में इसका क्या स्टेटस है?
क्या नाइट शिफ्ट वर्कर्स के लिए 'ब्लू-ब्लॉकिंग ग्लासेस' (Blue-blocking glasses) पहनना या दिन में सोते समय मेलाटोनिन सप्लीमेंट्स लेना सुरक्षित और फायदेमंद है?
नाइट शिफ्ट वर्कर्स के लिए ब्लू-ब्लॉकिंग ग्लासेस पहनना और डॉक्टर की सलाह पर मेलाटोनिन सप्लीमेंट लेना दोनों ही सुरक्षित और बेहद फायदेमंद हैं। सुबह घर लौटते समय एम्बर (नारंगी) रंग के ब्लू-ब्लॉकिंग ग्लासेस पहनने से सूरज की तेज रोशनी दिमाग के स्लीप सिग्नल को ब्लॉक नहीं कर पाती, जिससे दिन में सोना आसान हो जाता है। वहीं, दिन में सोने से ठीक पहले मेलाटोनिन सप्लीमेंट की कम डोज (आमतौर पर 1-3 mg) लेने से शरीर को कृत्रिम रात का अहसास होता है। यह कॉम्बिनेशन बायोलॉजिकल क्लॉक को रीसेट करता है, जिससे ओवेरियन हेल्थ सुधरती है और हार्मोनल बैलेंस बना रहता है।