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Eating habits in kids: क्या है सतरंगी थाली का जादू जो बच्चों को बनाएगा सुपर हेल्दी? जानिए

Green Veggies eating habits in kids: क्या आपका बच्चा भी सिर्फ आलू, नूडल्स, ब्रेड खाता है? पैरेंट्स बच्चों को बिना डांटे सब्जियां खाना सिखा सकते हैं, डॉक्टर से समझिए न्यूट्रिशन साइंस।
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Jul 05, 2026
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क्या है सतरंगी थाली का जादू? (Photo :AI)

Eating habits in kids: अक्सर पैरेंटिंग व्हाट्सऐप ग्रुप्स और ऑनलाइन फोरम्स पर माताओं का एक ही चिंता होती है। मेरा बच्चा हरी सब्जियां देखते ही मुंह बना लेता है, उसे बस आलू, नूडल्स, पास्ता या ब्रेड जैसी 'बेज' (Beige) चीजें ही पसंद आती हैं। मैं उसे पालक या ब्रोकली कैसे खिलाऊं? यदि आप भी हर रोज डाइनिंग टेबल पर बच्चे को एक चम्मच सब्जी खिलाने के लिए 'युद्ध' लड़ते हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि बच्चों पर दबाव डालना या उन्हें डांटना इसका समाधान नहीं है। भोजन के साथ बच्चों का रोज का अनुभव कैसा है, यही छोटी-छोटी बातें यह तय करती हैं कि वे बड़े होकर क्या खाएंगे। आइए विस्तार से जानते हैं पीडियाट्रिशियन से कि कैसे बच्चों को रखे सुपर हेल्दी।

Green Veggies: बच्चे सब्जियां खाने से कतराते क्यों हैं?

रिसर्च के अनुसार, बच्चों का मीठे स्वाद के प्रति झुकाव जन्म से ही होता है। यहां तक कि मां के दूध में भी नेचुरल शुगर्स होती हैं, जिससे उसका स्वाद हल्का मीठा होता है। ऐसे में जब अचानक उन्हें सॉलिड्स (ठोस आहार) के रूप में उबला हुआ तीखा या बेस्वाद पालक या कड़वी ब्रोकली दी जाती है, तो उनका पैलेट (Palate) इसे स्वीकार नहीं कर पाता। लेकिन बच्चों की डाइट में फल और सब्जियां शामिल करना बेहद जरूरी है। एक खराब डाइट न केवल उनके शारीरिक विकास को रोकती है, बल्कि उनकी एकाग्रता (Concentration), याददाश्त, व्यवहार और स्कूली प्रदर्शन (Academic Performance) को भी प्रभावित करती है। आजकल बच्चों में मोटापा (Childhood Obesity) तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सीधा संबंध भविष्य की गंभीर बीमारियों से है।

डॉ. शिखा गर्ग के साथ पत्रिका की खास-बातचीत

एक बच्चे में 'नॉर्मल चूजी ईटिंग' (सामान्य नखरे) और 'सेंसरी फूड इश्यू' (यानी खाने के टेक्सचर से गंभीर समस्या होना) के बीच की बारीक लाइन क्या है?

शुरुआती सालों में, खासकर 2 से 5 साल की उम्र के बच्चों में नए खाने को लेकर नखरे करना या मना करना बेहद सामान्य है। यह उनके विकास (Normal Development) का ही एक हिस्सा होता है, जिसे मेडिकल भाषा में 'फूड नियोफोबिया' (Food Neophobia) यानी नए खाने से डरना कहा जाता है। इससे निपटने के लिए जब आप बच्चे को बिना किसी दबाव के, बार-बार एक ही तरह का खाना, सेम टेक्सचर या सब्जियां परोसते हैं, तो धीरे-धीरे उनका यह डर खत्म होने लगता है और वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। बच्चों की इस आदत को बदलने के लिए आप उन्हें ग्रोसरी शॉपिंग (सब्जी/राशन खरीदने) में साथ ले जाएं या खाने की लिस्ट बनाने में शामिल करें। इससे खाने के प्रति उनकी रुचि बढ़ती है। इसके अलावा, जब परिवार के बाकी सदस्य भी उसी खाने को पूरे मन और उत्सुकता के साथ खाते हैं, तो बच्चे पर अच्छा असर पड़ता है। उसे लगता है कि यह कोई स्वादिष्ट चीज है और उसका सामान्य नखरा (Choosy Eating) कम हो जाता है।

सेंसरी फूड इश्यू (Sensory Food Issue) कब होता है?

चिंता की बात तब होती है जब कुछ बच्चे किसी खास टेक्सचर (बनावट), गंध, रंग या तापमान के खाने को देखकर बहुत ज्यादा परेशान हो जाते हैं, उसे पूरी तरह अवॉइड करते हैं या उन्हें उल्टी (Vomiting) जैसा महसूस होने लगता है। अगर इस नखरेपन की वजह से बच्चे का शारीरिक विकास रुक रहा है, उसका वजन कम हो रहा है या उसकी फिजिकल कैपेसिटी (शारीरिक क्षमता) प्रभावित हो रही है, तो इसे हल्के में न लें। यह एक सेंसरी फूड इश्यू हो सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत पीडियाट्रिशियन से मिलकर इसका सही मूल्यांकन (Evaluation) कराना जरूरी है।

माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (जैसे आयरन, जिंक, विटामिन डी) की कमी बच्चों के मानसिक विकास, एकाग्रता (Concentration) और उनके व्यवहार पर कैसा असर डालती है?

बच्चों में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (जैसे आयरन, विटामिन डी और जिंक) की कमी उनके मानसिक विकास और एकाग्रता (Concentration) पर बहुत गहरा असर डालती है। मेडिकल साइंस में इस समस्या को 'हिडन हंगर' (Hidden Hunger यानी छिपी हुई भूख) भी कहा जाता है, जिसमें बच्चे का पेट तो भर जाता है लेकिन उसके शरीर को जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं मिल पाते।

अलग-अलग पोषक तत्वों की कमी से बच्चों में ये लक्षण और बदलाव देखे जा सकते हैं।

  • आयरन (Iron) की कमी: आयरन की कमी से न केवल बच्चे के शरीर में खून की कमी (Anemia) होती है, बल्कि उसमें हर वक्त थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान न लगा पाने की समस्या भी होने लगती है। यदि जीवन के शुरुआती एक-दो सालों में बच्चे के शरीर में आयरन की कमी हो जाए, तो उसके दिमागी विकास पर बुरा असर पड़ता है। शोध बताते हैं कि ऐसे बच्चों का आईक्यू (IQ) लेवल भी कम हो सकता है।
  • विटामिन डी (Vitamin D) की कमी: विटामिन डी न सिर्फ हड्डियों को मजबूत बनाता है, बल्कि हमारे मानसिक स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) के लिए भी बेहद जरूरी है। आजकल बच्चों में विटामिन डी की कमी के कारण उनकी इम्यूनिटी और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। इसे कई गंभीर समस्याओं से भी जोड़ा गया है, जैसे क्रोनिक एलर्जिक डिजीज (लंबे समय तक रहने वाली एलर्जी). यहां तक कि ऑटिज्म (Autism) से पीड़ित बच्चों में भी विटामिन डी का नॉर्मल लेवल मेंटेन रखने की सलाह दी जाती है।
  • जिंक (Zinc) की कमी: जिंक की कमी होने पर बच्चों की भूख मर जाती है और उनकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता (रोग प्रतिरोधक क्षमता) काफी कमजोर हो जाती है।

क्या बचपन में जबरदस्ती खाना खिलाने की आदत आगे चलकर बच्चों में मोटापे (Childhood Obesity) या ईटिंग डिसऑर्डर का कारण बन सकती है?

यह समझना बहुत जरूरी है कि जब बच्चा पैदा होता है, तभी से उसके भीतर भूख (Hunger) और तृप्ति (Satiety पेट भरने का अहसास) के प्राकृतिक संकेत मौजूद होते हैं। बच्चा खुद इन संकेतों को पहचानना जानता है। लेकिन जब पैरेंट्स बचपन से ही बच्चों को जबरदस्ती खाना खिलाना शुरू कर देते हैं, तो इसके बच्चों पर दो बहुत ही नकारात्मक असर पड़ सकते हैं।

  • ओवरईटिंग और मोटापे का खतरा (Overeating & Obesity): जबरदस्ती खिलाने से बच्चों के अंदर भूख और पेट भरने के प्राकृतिक अहसास को पहचानने की क्षमता खत्म हो जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि वे जरूरत से ज्यादा खाने (Overeating) के शिकार हो जाते हैं, जो आगे चलकर बचपन में मोटापे (Childhood Obesity) का एक बड़ा कारण बनता है।
  • भोजन के प्रति एंग्जायटी और ईटिंग डिसऑर्डर (Anxiety & Eating Disorders): जब बच्चों को लगातार दबाव में खिलाया जाता है, तो वे भोजन के साथ एक नकारात्मक संबंध (Negative Association) बना लेते हैं। ऐसे में हर बार डाइनिंग टेबल पर आना या खाना देखना उनके लिए एक तनाव और एंग्जायटी (घबराहट) का कारण बन जाता है। इस तनाव की वजह से आगे चलकर उनमें बहुत कम खाना खाने या खाना खाने से पूरी तरह मना करने जैसी आदतें पनपने लगती हैं, जो भविष्य में गंभीर ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorder) का रूप ले सकती हैं।
  • यह बात समझना माता-पिता के लिए बेहद जरूरी है कि बच्चों में खाने की स्वस्थ आदतें (Eating Habits) तभी से विकसित होने लगती हैं, जब वे पहली बार ठोस आहार (Solids) का स्वाद चखते हैं। शिशु जब 6 महीने की उम्र का होता है, तो हम उसका खाना-पीना शुरू करते हैं। यही वह सही समय है जब पैरेंट्स को सबसे ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
  • इस शुरुआती दौर में बच्चे को खाना खिलाते समय एक पॉजिटिव एनवायरनमेंट (खुशनुमा और सकारात्मक माहौल) देना बहुत आवश्यक है। जब बच्चा बिना किसी तनाव, डर या जबरदस्ती के शांत माहौल में भोजन का अनुभव करता है, तो भोजन के प्रति उसका लगाव बढ़ता है। यही सकारात्मक माहौल आगे चलकर बच्चे के भीतर खाने के प्रति रुचि और खुद से खाने की इच्छा (Appetite) को प्राकृतिक रूप से उत्पन्न करता है, जो जीवनभर उसके साथ रहती है।

पैरेंट्स अक्सर थककर बच्चे को स्क्रीन (मोबाइल/टीवी) दिखाकर खिलाने लगते हैं। एक एक्सपर्ट के तौर पर आप 'स्क्रीन फीडिंग' के क्या नुकसान देखती हैं और इससे कैसे पीछा छुड़ाएं?

आजकल के व्यस्त दौर में, जहां अक्सर माता-पिता दोनों वर्किंग (कामकाजी) हैं और परिवार भी छोटे (Nuclear Families) हो गए हैं, बच्चों को टीवी या मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठाकर खाना खिलाना एक आम चलन बन गया है। पैरेंट्स को लगता है कि इससे उनका समय बच रहा है और बच्चा आसानी से खाना खा रहा है, लेकिन हकीकत में यह आदत बच्चों के भीतर स्वस्थ खान-पान की आदतों (Healthy Eating Habits) को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। स्क्रीन फीडिंग के कारण बच्चों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

  • भूख और तृप्ति का अहसास न होना: स्क्रीन में डूबे रहने के कारण बच्चों का दिमाग यह समझ ही नहीं पाता कि उन्हें कितनी भूख लगी है और कब उनका पेट भर चुका है। वे शरीर के इन प्राकृतिक संकेतों को महसूस नहीं कर पाते।
  • स्वाद और भोजन के प्रति अरुचि: ऐसे बच्चों की भोजन के प्रति कोई स्वाभाविक रुचि नहीं बनती, और न ही वे भोजन के असली स्वाद (Taste) को पहचान पाते हैं।
  • पाचन क्रिया (Digestion) का कमजोर होना: विज्ञान कहता है कि जब हम भोजन को देखते हैं, उसकी सुगंध लेते हैं और उसके रंगों को निहारते हैं, तो हमारे मुंह और पेट में जरूरी पाचक एंजाइम्स (Digestive Enzymes) का रिसाव होता है। स्क्रीन देखने वाले बच्चों में यह प्रक्रिया नहीं हो पाती, जिससे उनका पाचन प्रभावित होता है।
  • साथ बैठकर भोजन करने की आदत (Family Meals): स्क्रीन फीडिंग को रोकने का सबसे पहला और प्रभावी कदम यह है कि पूरा परिवार एक साथ डाइनिंग टेबल पर या जमीन पर बैठकर खाना खाए। जब सभी सदस्य एक साथ बैठते हैं, तो बच्चा दूसरों को देखकर खुद से खाना खाना सीखता है।
  • बच्चों को भोजन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल करना: यदि बच्चे थोड़े बड़े हैं, तो उन्हें खाना परोसने, प्लेट लगाने या टेबल सजाने जैसे कामों में शामिल करें। इसके अलावा, जब आप राशन या सब्जियां खरीदने (Grocery Shopping) जाएं, तो बच्चों को साथ ले जाएं। यदि संभव हो, तो उन्हें कुकिंग (बनाने की प्रक्रिया) में भी छोटे-छोटे सुरक्षित काम सौंपें। इन सब गतिविधियों से बच्चों का भोजन के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और रुचि बढ़ती है।
  • सकारात्मक और संवादात्मक माहौल (Healthy Environment): खाना खिलाते समय घर का माहौल खुशनुमा और तनावमुक्त रखें। स्क्रीन चालू करने के बजाय बच्चे से खुद बातचीत करें, उसे कहानियां सुनाएं या किसी रचनात्मक तरीके से उसे भोजन करने के लिए प्रेरित करें। शुरुआत में यह थोड़ा समय ले सकता है, लेकिन यह एक बहुत ही स्वस्थ आदत की नींव रखता है।

न्यूट्रिशन में एक नियम है 'डिवीजन ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी' (Division of Responsibility)। डाइनिंग टेबल पर माता-पिता और बच्चे के बीच सीमाओं को कैसे तय किया जाना चाहिए?

न्यूट्रिशन साइंस में 'डिवीजन ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी' का नियम यह तय करता है कि खाने की मेज पर माता-पिता और बच्चों की अपनी-अपनी क्या जिम्मेदारियाँ हैं। इस नियम के अनुसार

  • माता-पिता की जिम्मेदारी: यह तय करना कि घर में क्या खाना बनेगा, वह कब परोसा जाएगा और कहां (जैसे डाइनिंग टेबल पर) खाया जाएगा।
  • बच्चे की जिम्मेदारी: यदि बच्चा थोड़ा बड़ा है, तो यह पूरी तरह उसकी जिम्मेदारी है कि परोसे गए भोजन में से उसे क्या खाना है, क्या नहीं खाना है और कितनी मात्रा में खाना है। भारतीय परिवारों में अक्सर यह देखा जाता है कि बच्चे की भूख से ज्यादा, प्यार-प्यार में 'एक और निवाला' (One more bite) खिलाने की आदत होती है, जिसे माता-पिता अपना प्यार मानते हैं। लेकिन साइंटिफिक नजरिए से, बच्चों पर शुरुआत से ही खाना खाने का ऐसा दबाव बिल्कुल नहीं डालना चाहिए।

पैरेंट्स को क्या करना चाहिए?

  • डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह लें: बच्चों की उम्र और उनके वजन के हिसाब से उन्हें हर रोज कितने मिनिमम या मैक्सिमम पोषण (Nutrition) की जरूरत है, इसे समझने के लिए आप डॉक्टर की सलाह लें या किताबें पढ़ें। इससे आप एक सही अंदाजा लगा पाएंगे कि आपके बच्चे की डाइट पर्याप्त है या नहीं।
  • नियमित ग्रोथ चेकअप कराएं: अपने बच्चे का वजन और उसका शारीरिक विकास (Development) नियमित तौर पर डॉक्टर से चेक कराते रहें। अगर बच्चा कम खा रहा है, तो पीडियाट्रिशियन से बात करें ताकि समय रहते माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (सूक्ष्म पोषक तत्वों) की कमी को पकड़ा जा सके।
  • यदि आपका बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ है, खेल-कूद रहा है और उसका वजन सही तरीके से बढ़ रहा है, तो उसे जबरदस्ती खाना खिलाने की कोई आवश्यकता नहीं है। बच्चा अपनी जरूरत के हिसाब से भोजन की मात्रा तय करने में पूरी तरह सक्षम होता है और पैरेंट्स के तौर पर हमें उसके इस फैसले का सम्मान करना चाहिए।
  • कई बार बच्चों में आयरन (Iron) की कमी के कारण भी भूख कम लगती है। ऐसी स्थिति में, खुद से कोई दवा या सप्लीमेंट (Over the counter) खरीदने के बजाय हमेशा डॉक्टर के परामर्श के बाद ही सही डोज में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स देने चाहिए।

अगर बच्चा बिल्कुल भी सब्जी नहीं छू रहा है, तो क्या मल्टीविटामिंस या सप्लीमेंट्स इसका विकल्प हो सकते हैं?

सप्लीमेंट्स क्यों नहीं हैं सही विकल्प?

प्राकृतिक भोजन की जगह सिर्फ मल्टीविटामिन देने के दो बड़े नुकसान हैं:

  • फाइबर्स की कमी: दवाओं या सिरप में वे जरूरी फाइबर्स (Fibers) और अन्य तत्व नहीं होते, जो एक प्रॉपर प्राकृतिक खाने में मौजूद होते हैं।
  • अनिश्चितकालीन उपयोग गलत: हम किसी भी बच्चे को अनिश्चितकाल समय तक सप्लीमेंट्स पर निर्भर नहीं रख सकते। आयरन, विटामिन डी या जिंक जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के सप्लीमेंट्स सिर्फ तब दिए जाने चाहिए, जब मेडिकल जांच में इनकी कमी पाई जाए। यह कमी को पूरा करने का एक अस्थाई जरिया हैं, भोजन का परमानेंट विकल्प नहीं।
  • रेनबो डाइट: लंबे समय के लिए हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि बच्चे को एक संतुलित आहार मिले, जिसे हम 'रेनबो डाइट' (Rainbow Diet - सतरंगी थाली) कहते हैं। इसका मतलब है कि बच्चे की रोजाना की डाइट में कम से कम 5 अलग-अलग रंगों के फल और सब्जियां शामिल होनी चाहिए। यदि बच्चा ऐसी सतरंगी थाली खा रहा है, तो उसमें किसी भी तरह की विटामिन डेफिशिएंसी (कमी) होने की संभावना बहुत कम हो जाती है, और फिर बाहर से कोई भी सप्लीमेंट देने की जरूरत नहीं पड़ती।

माता-पिता के लिए आपका 'गोल्डन मंत्र' क्या है?

सभी माता-पिता के लिए मेरा एक ही 'गोल्डन मंत्र' है - अपने घर में खाना खाने के समय (Mealtime) को एक आनंदमयी और खुशनुमा पारिवारिक समय बनाइए। पैरेंट्स के तौर पर आपका लक्ष्य केवल आज की थाली का खाना खत्म करवाना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य तो बच्चे के भीतर एक ऐसी आदत पैदा करना है, जिससे वह जीवनभर एक हेल्दी ईटिंग (Healthy Eating) की तरफ बढ़ सके। वह अपना पूरा खाना अच्छे से खाए, एक बैलेंस्ड डाइट (संतुलित आहार) ले और भोजन के साथ कोई भी नकारात्मक संबंध (Negative Association) बनाने के बजाय एक सकारात्मक और सुखद रिश्ता विकसित करे।इसके लिए सबसे पहले आपको खुद बच्चे के सामने एक सही रोल मॉडल (आदर्श) बनना होगा। जब आप खुद बच्चे के सामने बैठकर स्वस्थ भोजन करेंगे और खाने के प्रति एक सकारात्मक व्यवहार (Healthy Food Behavior) रखेंगे, तो बच्चा आपको देख-देखकर खुद-ब-खुद अच्छी और सेहतमंद खाने की आदतें अपना लेगा।

Published on:
05 Jul 2026 10:00 am