
Eating habits in kids: अक्सर पैरेंटिंग व्हाट्सऐप ग्रुप्स और ऑनलाइन फोरम्स पर माताओं का एक ही चिंता होती है। मेरा बच्चा हरी सब्जियां देखते ही मुंह बना लेता है, उसे बस आलू, नूडल्स, पास्ता या ब्रेड जैसी 'बेज' (Beige) चीजें ही पसंद आती हैं। मैं उसे पालक या ब्रोकली कैसे खिलाऊं? यदि आप भी हर रोज डाइनिंग टेबल पर बच्चे को एक चम्मच सब्जी खिलाने के लिए 'युद्ध' लड़ते हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि बच्चों पर दबाव डालना या उन्हें डांटना इसका समाधान नहीं है। भोजन के साथ बच्चों का रोज का अनुभव कैसा है, यही छोटी-छोटी बातें यह तय करती हैं कि वे बड़े होकर क्या खाएंगे। आइए विस्तार से जानते हैं पीडियाट्रिशियन से कि कैसे बच्चों को रखे सुपर हेल्दी।
रिसर्च के अनुसार, बच्चों का मीठे स्वाद के प्रति झुकाव जन्म से ही होता है। यहां तक कि मां के दूध में भी नेचुरल शुगर्स होती हैं, जिससे उसका स्वाद हल्का मीठा होता है। ऐसे में जब अचानक उन्हें सॉलिड्स (ठोस आहार) के रूप में उबला हुआ तीखा या बेस्वाद पालक या कड़वी ब्रोकली दी जाती है, तो उनका पैलेट (Palate) इसे स्वीकार नहीं कर पाता। लेकिन बच्चों की डाइट में फल और सब्जियां शामिल करना बेहद जरूरी है। एक खराब डाइट न केवल उनके शारीरिक विकास को रोकती है, बल्कि उनकी एकाग्रता (Concentration), याददाश्त, व्यवहार और स्कूली प्रदर्शन (Academic Performance) को भी प्रभावित करती है। आजकल बच्चों में मोटापा (Childhood Obesity) तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सीधा संबंध भविष्य की गंभीर बीमारियों से है।
एक बच्चे में 'नॉर्मल चूजी ईटिंग' (सामान्य नखरे) और 'सेंसरी फूड इश्यू' (यानी खाने के टेक्सचर से गंभीर समस्या होना) के बीच की बारीक लाइन क्या है?
शुरुआती सालों में, खासकर 2 से 5 साल की उम्र के बच्चों में नए खाने को लेकर नखरे करना या मना करना बेहद सामान्य है। यह उनके विकास (Normal Development) का ही एक हिस्सा होता है, जिसे मेडिकल भाषा में 'फूड नियोफोबिया' (Food Neophobia) यानी नए खाने से डरना कहा जाता है। इससे निपटने के लिए जब आप बच्चे को बिना किसी दबाव के, बार-बार एक ही तरह का खाना, सेम टेक्सचर या सब्जियां परोसते हैं, तो धीरे-धीरे उनका यह डर खत्म होने लगता है और वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। बच्चों की इस आदत को बदलने के लिए आप उन्हें ग्रोसरी शॉपिंग (सब्जी/राशन खरीदने) में साथ ले जाएं या खाने की लिस्ट बनाने में शामिल करें। इससे खाने के प्रति उनकी रुचि बढ़ती है। इसके अलावा, जब परिवार के बाकी सदस्य भी उसी खाने को पूरे मन और उत्सुकता के साथ खाते हैं, तो बच्चे पर अच्छा असर पड़ता है। उसे लगता है कि यह कोई स्वादिष्ट चीज है और उसका सामान्य नखरा (Choosy Eating) कम हो जाता है।
सेंसरी फूड इश्यू (Sensory Food Issue) कब होता है?
चिंता की बात तब होती है जब कुछ बच्चे किसी खास टेक्सचर (बनावट), गंध, रंग या तापमान के खाने को देखकर बहुत ज्यादा परेशान हो जाते हैं, उसे पूरी तरह अवॉइड करते हैं या उन्हें उल्टी (Vomiting) जैसा महसूस होने लगता है। अगर इस नखरेपन की वजह से बच्चे का शारीरिक विकास रुक रहा है, उसका वजन कम हो रहा है या उसकी फिजिकल कैपेसिटी (शारीरिक क्षमता) प्रभावित हो रही है, तो इसे हल्के में न लें। यह एक सेंसरी फूड इश्यू हो सकता है। ऐसी स्थिति में तुरंत पीडियाट्रिशियन से मिलकर इसका सही मूल्यांकन (Evaluation) कराना जरूरी है।
माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (जैसे आयरन, जिंक, विटामिन डी) की कमी बच्चों के मानसिक विकास, एकाग्रता (Concentration) और उनके व्यवहार पर कैसा असर डालती है?
बच्चों में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (जैसे आयरन, विटामिन डी और जिंक) की कमी उनके मानसिक विकास और एकाग्रता (Concentration) पर बहुत गहरा असर डालती है। मेडिकल साइंस में इस समस्या को 'हिडन हंगर' (Hidden Hunger यानी छिपी हुई भूख) भी कहा जाता है, जिसमें बच्चे का पेट तो भर जाता है लेकिन उसके शरीर को जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
अलग-अलग पोषक तत्वों की कमी से बच्चों में ये लक्षण और बदलाव देखे जा सकते हैं।
क्या बचपन में जबरदस्ती खाना खिलाने की आदत आगे चलकर बच्चों में मोटापे (Childhood Obesity) या ईटिंग डिसऑर्डर का कारण बन सकती है?
यह समझना बहुत जरूरी है कि जब बच्चा पैदा होता है, तभी से उसके भीतर भूख (Hunger) और तृप्ति (Satiety पेट भरने का अहसास) के प्राकृतिक संकेत मौजूद होते हैं। बच्चा खुद इन संकेतों को पहचानना जानता है। लेकिन जब पैरेंट्स बचपन से ही बच्चों को जबरदस्ती खाना खिलाना शुरू कर देते हैं, तो इसके बच्चों पर दो बहुत ही नकारात्मक असर पड़ सकते हैं।
पैरेंट्स अक्सर थककर बच्चे को स्क्रीन (मोबाइल/टीवी) दिखाकर खिलाने लगते हैं। एक एक्सपर्ट के तौर पर आप 'स्क्रीन फीडिंग' के क्या नुकसान देखती हैं और इससे कैसे पीछा छुड़ाएं?
आजकल के व्यस्त दौर में, जहां अक्सर माता-पिता दोनों वर्किंग (कामकाजी) हैं और परिवार भी छोटे (Nuclear Families) हो गए हैं, बच्चों को टीवी या मोबाइल स्क्रीन के सामने बैठाकर खाना खिलाना एक आम चलन बन गया है। पैरेंट्स को लगता है कि इससे उनका समय बच रहा है और बच्चा आसानी से खाना खा रहा है, लेकिन हकीकत में यह आदत बच्चों के भीतर स्वस्थ खान-पान की आदतों (Healthy Eating Habits) को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। स्क्रीन फीडिंग के कारण बच्चों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
न्यूट्रिशन में एक नियम है 'डिवीजन ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी' (Division of Responsibility)। डाइनिंग टेबल पर माता-पिता और बच्चे के बीच सीमाओं को कैसे तय किया जाना चाहिए?
न्यूट्रिशन साइंस में 'डिवीजन ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी' का नियम यह तय करता है कि खाने की मेज पर माता-पिता और बच्चों की अपनी-अपनी क्या जिम्मेदारियाँ हैं। इस नियम के अनुसार
पैरेंट्स को क्या करना चाहिए?
अगर बच्चा बिल्कुल भी सब्जी नहीं छू रहा है, तो क्या मल्टीविटामिंस या सप्लीमेंट्स इसका विकल्प हो सकते हैं?
सप्लीमेंट्स क्यों नहीं हैं सही विकल्प?
प्राकृतिक भोजन की जगह सिर्फ मल्टीविटामिन देने के दो बड़े नुकसान हैं:
माता-पिता के लिए आपका 'गोल्डन मंत्र' क्या है?
सभी माता-पिता के लिए मेरा एक ही 'गोल्डन मंत्र' है - अपने घर में खाना खाने के समय (Mealtime) को एक आनंदमयी और खुशनुमा पारिवारिक समय बनाइए। पैरेंट्स के तौर पर आपका लक्ष्य केवल आज की थाली का खाना खत्म करवाना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य तो बच्चे के भीतर एक ऐसी आदत पैदा करना है, जिससे वह जीवनभर एक हेल्दी ईटिंग (Healthy Eating) की तरफ बढ़ सके। वह अपना पूरा खाना अच्छे से खाए, एक बैलेंस्ड डाइट (संतुलित आहार) ले और भोजन के साथ कोई भी नकारात्मक संबंध (Negative Association) बनाने के बजाय एक सकारात्मक और सुखद रिश्ता विकसित करे।इसके लिए सबसे पहले आपको खुद बच्चे के सामने एक सही रोल मॉडल (आदर्श) बनना होगा। जब आप खुद बच्चे के सामने बैठकर स्वस्थ भोजन करेंगे और खाने के प्रति एक सकारात्मक व्यवहार (Healthy Food Behavior) रखेंगे, तो बच्चा आपको देख-देखकर खुद-ब-खुद अच्छी और सेहतमंद खाने की आदतें अपना लेगा।