
Solar Market VS Solar Waste in India : एक तरफ भारत सोलर बाजार में विश्व भर में दूसरे स्थान पर है, तो वहीं दूसरी ओर सोलर पैनल वेस्ट, जिसे बेहद खतरनाक माना जाता है, उसकी सुरक्षित रीसाइक्लिंग को लेकर चिंता बनी हुई है। देश की स्थापित क्षमता 155 गीगावाट को पार कर गई है और भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट क्षमता हासिल करना है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (2021) के डेटा के हवाले से 'डेली पायनियर' में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि भारत का सोलर कचरा 2030 तक लगभग 34,600 टन होगा, जो 2050 तक बढ़कर 1.8 मिलियन (18 लाख) टन हो जाएगा।
वहीं, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) के एक नए अध्ययन का यह अनुमान है कि 2047 तक भारत में 11 मिलियन (1.1 करोड़) टन से ज्यादा सोलर कचरा पैदा हो सकता है। प्रभावी रीसाइक्लिंग से 2047 तक 38% सामग्री को नए पैनलों के लिए फिर से प्राप्त किया जा सकता है और 37 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन को रोका जा सकता है।
भारत में निजी क्षेत्र की कंपनी 'जैक्सन इंजीनियर्स' (Jakson Engineers) देश का पहला हाई-टेक सोलर पैनल रीसाइक्लिंग प्लांट लगा रही है। इस प्लांट की क्षमता सालाना 300 मेगावाट के सोलर पैनल (करीब 500,000 मॉड्यूल या 13,500 टन सामग्री) को रिसाइकिल करने की होगी। बता दें, इसकी घोषणा कंपनी ने पिछले साल 2025 में की थी।
इस प्लांट में रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया को समझने के लिए पत्रिका के रवि गुप्ता ने कंपनी की कम्यूनिकेशन ऑफिसर मैत्रेयी त्रिपाठी से बात की। उन्होंने बताया, "हमारा प्लांट मध्य प्रदेश में स्थापित होगा। अभी इस पर काम चल रहा है, हालांकि यह कब तक पूरी तरह बनकर तैयार हो जाएगा, इस पर अभी पुष्टि करना संभव नहीं है। लेकिन, ये तय है कि हमारी कंपनी भारत में सोलर वेस्ट को लेकर बेहतर कार्य करने की तैयारी में है।"
UPSC की तैयारी कराने वाली एक संस्था बायजू की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 40 मुख्य सोलर प्लांट और 10 मुख्य सोलर पावर पार्क हैं। खुशी की बात है कि हम दुनिया में सोलर पावर के मामले में दूसरे पायदान पर पहुंच गए हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि हमारे पास इन्हें रीसाइक्लिंग करने के लिए प्लांट्स की संख्या ना के बराबर है (खबर लिखे जाने तक)।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर की स्टडी यह भी कहती है कि 2047 तक भारत में 11 मिलियन (1.1 करोड़) टन से ज्यादा सोलर कचरे का सुरक्षित प्रबंधन के लिए अगले दो दशकों में लगभग 478 मिलियन डॉलर के निवेश और 300 रिसाइकलिंग केंद्रों की आवश्यकता होगी।
सोलर वेस्ट को रीसाइक्लिंग करना महंगा पड़ता है। क्योंकि, अगर एकाध बन भी गए तो वहां तक सोलर वेस्ट ले जाना और फिर आगे की प्रक्रिया करना भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है।
23 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाली शोधकर्ता डॉ. प्रोमिला शर्मा और प्रमुख जन स्वास्थ्य व पर्यावरण शोधकर्ता पोम्पी कोनवार (Pompy Konwar) अपने लेख में लिखते हैं कि वैश्विक स्तर पर सोलर कचरा 2050 तक 60 से 78 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें भारत का भी बड़ा हिस्सा होगा। एक सामान्य क्रिस्टलीय सिलिकॉन पैनल के केवल सोल्डरिंग हिस्से में ही लगभग 14 ग्राम लेड (सीसा) होता है। तो 'मिलियन टन' सोलर कचरे में यह कितना हो सकता है।
आगे बताते हैं कि इस हिसाब से कुल अनुमानित कचरे में लगभग 16 टन कैडमियम और टेल्यूराइड जैसे जहरीले तत्व होने का अनुमान है। सोलर पैनल केवल कांच की चादर नहीं होते, बल्कि इनमें लेड (सीसा), कैडमियम, आर्सेनिक, टेल्यूराइड और हेक्सावलेंट क्रोमियम जैसे बेहद खतरनाक तत्व भी होते हैं। इनका सही तरीके से निष्पादन न करने पर कई तरह की बीमारियां जन्म ले सकती हैं।
उनके लेख के स्वास्थ्य जोखिमों के विश्लेषण के अनुसार, जब इन पैनलों को असुरक्षित तरीके से तोड़ा या फेंका जाता है, तो इनसे निकलने वाले जहरीले धातु के कण मिट्टी, हवा और भूजल में मिल जाते हैं। इसके कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमें बच्चों में न्यूरोडेवलपमेंटल विकार (दिमागी विकास में बाधा), किडनी में विषाक्तता, प्रजनन संबंधी बीमारियां और कैंसर होने का उच्च जोखिम शामिल है।
भारत सरकार ने ई-वेस्ट नियम (2022) जो 1 अप्रैल 2023 से लागू हैं। उसके तहत सोलर पैनलों को भी इसके दायरे में शामिल किया है। इससे निर्माताओं पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वे पैनलों की अवधि समाप्त होने (25 से 30 वर्ष बाद) पर उन्हें इकट्ठा करें, डिस्मेंटल करें और रिसाइकिल करवाएं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने जून 2025 में ड्राफ्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत सोलर कचरे को खुले में फेंकने (डंपिंग) पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। इसे एक अलग कचरा श्रेणी (distinct waste stream) के रूप में मान्यता देते हुए केवल अधिकृत रिसाइकलर्स के माध्यम से ही नष्ट करना अनिवार्य कर दिया गया है।
इस विषय पर 'पत्रिका' ने कई डिस्ट्रीब्यूटर्स से यह समझने की कोशिश की कि क्या कंपनियों की ओर से उन्हें सोलर वेस्ट रिसाइकल करने को लेकर कोई विशेष जानकारी या ट्रेनिंग दी जाती है। इस पर उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया, जिसका मतलब है कि वे इस पूरी प्रक्रिया और नियमों से पूरी तरह अनजान हैं।
WII (वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) और NAT Geo (नेशनल ज्योग्राफिक) की पूर्व शोधार्थी व पर्यावरण एक्सपर्ट सुनंदा भोला कहती हैं, "सोलर पैनल को आम लोग सुरक्षित मानते हैं। क्योंकि, इसे ऐसे ही दिखाया जा रहा है। जबकि, सोलर कचरे की गंभीरता को देखते हुए बड़े पैमाने पर आम जनों में जागरूकता बहुत जरूरी है। आने वाले समय में कहीं यह हमारे लिए प्लास्टिक कचरे की तरह फैलकर एक नई मुसीबत न बन जाए।"