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Polluted Cities: चीन के 719 शहर साफ, हमारे 35% गंदे, ‘शहरों की बढ़ती जीडीपी कम हो रही फेफड़ों की उम्र’

Polluted Cities in the World: क्या भारत के शहर संपन्नता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन बगैर मांगे बीमारी देने वाले भी बनते जा रहे हैं? यह हम नहीं कह रहे हैं। 'नेचर सिटीज' की ताजी रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि हमारे ज्यादातर शहर प्रदूषित हो चुके हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, नासिक दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है। प्रदूषित हवा में शामिल नाइट्रोजन डाइऑक्साइड किस तरह हमारे फेफड़ों की उम्र घटा रहा है, आइए इस बारे में डॉ. दीपांशु जैन से विस्तार से समझते हैं।

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May 19, 2026
स्मोकिंग किए बगैर ही लोगों में बढ़ रही है फेफड़ों की बीमारी। (Photo: AI Generated)

Polluted Cities in World: चीन के 719 शहर साफ, हमारे 35 फीसदी गंदे, 'शहरों की बढ़ती जीडीपी कम हो रही फेफड़ों की उम्र' : क्या किसी देश की आर्थिक प्रगति को उसके नागरिकों के फेफड़ों की सेहत से मापा जा सकता है? पहली नजर में यह सवाल थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यदि हम समकालीन भारतीय शहरीकरण और विकास के मौजूदा तरीकों का बारीक अध्ययन करें, तो यह सवाल न केवल प्रासंगिक बल्कि बेहद डरावना हो जाता है। आज जब भारत वैश्विक मंच पर सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, तब एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि इस प्रगति की वास्तविक कीमत कौन चुका रहा है?

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'फिल्दी रिच' भारत क्या है ?

हाल ही में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध 'नेचर सिटीज' (Nature Cities) में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन में सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई है कि भारत के शहर आर्थिक रूप से तो बहुत तेजी से संपन्नता की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन इस समृद्धि के पीछे जो ईंधन जल रहा है, वह हमारी आबोहवा को पूरी तरह से तबाह कर रहा है। शोधकर्ताओं ने इस स्थिति को वैज्ञानिक शब्दावली में 'फिल्दी रिच' (Filthy Rich) यानी "प्रदूषण की कीमत पर अमीर होना" कहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक आंकड़ा यह है कि दुनिया भर में जितने भी शहर आर्थिक विकास के साथ-साथ गंभीर वायु प्रदूषण की चपेट में आए हैं, उनमें से अकेले 35.4% शहर भारत में स्थित हैं।

यह शोध कोई सामान्य या सतही सर्वे नहीं है। यह साल 2019 से 2024 के बीच की पांच वर्षों की लंबी अवधि में दुनिया भर के 5,435 शहरों से प्राप्त सैटेलाइट डेटा और उनके वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुमानों पर आधारित एक अत्यंत प्रामाणिक वैज्ञानिक दस्तावेज है। इस अध्ययन में दुनिया भर के उन शहरों को शामिल किया गया है जिनकी जनसंख्या एक लाख से अधिक है। इस व्यापक डेटाबेस ने साफ कर दिया है कि भारत का वर्तमान आर्थिक ढांचा और शहरीकरण पूरी तरह से जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) जैसे कोयला, डीजल और पेट्रोल के अत्यधिक दोहन पर निर्भर है।विकास का यह मॉडल अल्पकालिक रूप से तो हमें समृद्ध और विकसित दिख सकता है है, लेकिन दीर्घकालिक रूप (Long-term) से यह एक ऐसे बड़े जनस्वास्थ्य संकट की मजबूत नींव रख रहा है, जिसकी भरपाई भविष्य की कई पीढ़ियां मिलकर भी नहीं कर पाएंगी।

वैश्विक शहरों का वर्गीकरण: भारत कहां खड़ा है?

रिर्पोट के मुताबिक, वैज्ञानिक सटीकता (Scientific Accuracy) और तुलनात्मक स्पष्टता (Comparative clarity) देने के लिए शोधकर्ताओं ने वैश्विक स्तर पर सभी 5,435 शहरी केंद्रों को चार प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया था। यह विभाजन दो मुख्य पैमानों पर आधारित था पहला, शहरों की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) और दूसरा, उनकी वायु गुणवत्ता (Air Quality) का स्तर (विशेष रूप से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड या NO₂ गैस की सांद्रता)। आइए इन चार श्रेणियों के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं कि वैश्विक परिदृश्य में भारत की स्थिति कितनी नाजुक है।

  • 'साफ और अमीर' (Cleaner and Richer) : इस श्रेणी में दुनिया के वे भाग्यशाली, अनुशासित और दूरदर्शी शहर आते हैं जिन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को तो मजबूत किया, रोजगार के नए अवसर पैदा किए और बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाया, लेकिन इसके साथ ही साथ अपनी हवा को भी साफ रखा या प्रदूषण के स्तर को नीचे लाने में सफलता हासिल की। यह सतत विकास (Sustainable Development) का सबसे आदर्श रूप है।
  • 'गंदे और अमीर' (Dirtier and Richer) : यह वह खतरनाक श्रेणी है जहां आर्थिक विकास की रफ्तार बहुत तेज है। यहां नए उद्योग लगते हैं। गगनचुंबी (skyscraper) इमारतें बनती हैं और लोगों की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ती है, लेकिन इसके ठीक समानांतर हवा में जहर भी उतनी ही तेजी से घुलता जाता है। भारत के अधिकांश बड़े शहर और नए औद्योगिक केंद्र इसी श्रेणी के शीर्ष पर खड़े नजर आ रहे हैं।
  • 'साफ और गरीब' (Cleaner and Poorer) : इस श्रेणी में वे शहर आते हैं जो पर्यावरण के मोर्चे पर तो बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि वहां प्रदूषण का स्तर कम हुआ है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वे पिछड़ गए हैं या उनकी विकास दर सुस्त रही है। आमतौर पर मंदी या औद्योगिक पलायन से जूझ रहे क्षेत्र इस श्रेणी में आते हैं।
  • 'गंदे और गरीब' (Dirtier and Poorer) : यह किसी भी समाज के लिए सबसे खराब और अभिशप्त (cursed) स्थिति है, जहां आर्थिक रूप से कोई खास प्रगति नहीं होती, लोगों का जीवन स्तर निम्न बना रहता है, फिर भी पुराने, अप्रचलित और घटिया तौर-तरीकों के कारण पर्यावरण और हवा का स्तर बेहद खराब बना रहता है। हम जब इन चारों श्रेणियों के बीच भारत की स्थिति का निष्पक्ष मूल्यांकन करते हैं, तो तस्वीरें बेहद डरावनी दिखाई देती हैं। वैश्विक स्तर पर 'गंदे और अमीर' (Dirtier and Richer) की श्रेणी में आने वाले कुल शहरों में से एक-तिहाई से अधिक हिस्सेदारी अकेले भारत की है। रिर्पोट के अनुसार, भारत के कुल शहरी केंद्रों में से 15% से अधिक शहर ऐसे हैं जहां पिछले पांच वर्षों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर गया है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि हमारा शहरीकरण पर्यावरण के अनुकूल होने के बजाय पर्यावरण का दुश्मन बनता जा रहा है।

नासिक : महानगरों से आगे बढ़ता प्रदूषण का नया जाला

हमारे देश के लोगों की आम धारणा यह हुआ करती थी कि वायु प्रदूषण केवल दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता या कानपुर जैसे बड़े औद्योगिक और घनी आबादी वाले टियर-1 महानगरों की समस्या है। छोटे शहरों के लोग खुद को इस संकट से सुरक्षित मानते थे। नेचर सीटीज रिपोर्ट में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि महाराष्ट्र का नासिक (Nashik Pollution) शहर दुनिया के उन टॉप 10 शहरों में शामिल हो गया है जो सबसे तेजी से 'गंदे और अमीर' बन रहे हैं।

नासिक को ऐतिहासिक रूप से उसकी सुखद और ठंडी जलवायु, धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व और बड़े पैमाने पर होने वाली अंगूर की उन्नत खेती (कृषि) के लिए जाना जाता था। इसे महाराष्ट्र के एक शांत और हरे-भरे शहर के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में, मुंबई और पुणे जैसे बड़े बिजनेस हब से इसकी भौगोलिक नजदीकी के कारण, यहां औद्योगिक गतिविधियों का अभूतपूर्व और अनियंत्रित विस्तार हुआ है। नए मैन्युफैक्चरिंग प्लांट, ऑटोमोबाइल हब, फार्मास्यूटिकल कंपनियां और रीयल एस्टेट के अनियोजित विकास ने नासिक के पूरे इकोसिस्टम को बदलकर रख दिया है।

वाहनों की संख्या में हुई बेतहाशा वृद्धि, सड़कों पर लगने वाले लंबे ट्रैफिक जाम और बड़े पैमाने पर चलने वाले निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल ने इस खूबसूरत शहर की हवा में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की मात्रा को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। नासिक का इस वैश्विक सूची के शीर्ष 10 में आना इस बात की गंभीर चेतावनी है कि यदि हमारे टियर-2 और टियर-3 शहरों (जैसे जयपुर, इंदौर, लखनऊ, रायपुर) के विकास को अभी से सही ढंग से पर्यावरण के अनुकूल नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में देश का कोई भी कोना सांस लेने योग्य नहीं बचेगा।

जीवाश्म ईंधन पर हमारी अत्यधिक निर्भरता के तीन मुख्य स्तंभ

भारतीय शहरों के इस तरह 'प्रदूषित और समृद्ध' होने के पीछे कोई एक रात में पैदा हुआ कारण नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे आर्थिक मॉडल की एक गहरी संरचनात्मक खामी है। रिर्पोट के आंकड़ों और पर्यावरण विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, मुख्य रूप से तीन ऐसे मोर्चे हैं जहां भारत जीवाश्म ईंधन के एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा हुआ है, जिससे बाहर निकलना फिलहाल मुश्किल दिख रहा है।

परिवहन क्षेत्र का अनियंत्रित और जीवाश्म ईंधन-गहन विस्तार

भारत के लगभग हर शहर में सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) की स्थिति बेहद दयनीय और अपर्याप्त है। मेट्रो प्रणालियों का विस्तार अभी भी कुछ चुनिंदा बड़े शहरों की लाइफलाइन तक सीमित है और सार्वजनिक बसों की संख्या शहरी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। इसके कारण, देश का एक बड़ा मध्यम वर्ग अपनी दैनिक यात्रा के लिए निजी वाहनों विशेषकर दुपहिया वाहनों और डीजल-पेट्रोल कारों पर निर्भर होने के लिए मजबूर है। सड़कों पर हर दिन उतरने वाली वाहनों की यह नई फौज सीधे तौर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की खपत को बढ़ाती है, जिसका अंतिम परिणाम भारी धुएं और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के रूप में हमारे सामने आता है। इसके अलावा, भारत में अंतर-शहरी माल ढुलाई (Freight Transport) का एक बहुत बड़ा हिस्सा रेलवे के बजाय ट्रकों के माध्यम से होता है, जो पुराने और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले कमर्शियल डीजल इंजनों से चलते हैं। जब ये ट्रक रात के समय शहरों में प्रवेश करते हैं, तो पीछे जहरीली हवा छोड़ जाते हैं।

थर्मल पावर और ऊर्जा ग्रिड की कोयले पर भारी निर्भरता

भले ही भारत सरकार ने हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सौर ऊर्जा (Solar Energy) और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े-बड़े कीर्तिमान स्थापित किए हों और हमारी रिन्यूएबल ऊर्जा की स्थापित क्षमता में भारी विस्तार भी हुआ हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी चिंताजनक है। आज भी हमारे देश की कुल बिजली उत्पादन का लगभग 65% से 70% हिस्सा कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों (Thermal Power Plants) से ही आता है। शहरों में जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं, नए शॉपिंग मॉल्स, गगनचुंबी रिहायशी इमारतें और आईटी पार्क बन रहे हैं, वैसे-वैसे बिजली की मांग भी रिकॉर्ड तोड़ रही है। विशेषकर गर्मियों के मौसम में एयर कंडीशनर (AC) की भारी मांग को पूरा करने के लिए इन थर्मल पावर प्लांटों को अपनी पूरी क्षमता से चौबीसों घंटे चलाना पड़ता है। कोयले का यह अनवरत और भारी दहन हवा में भारी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड छोड़ता है, जो हवा के रुख के साथ शहरों के ऊपर एक अदृश्य जानलेवा चादर बना लेता है।

MSMEs में पुरानी व सस्ती तकनीकों का उपयोग

भारत के छोटे और मध्यम उद्योग, जो हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं और करोड़ों लोगों को रोजगार देते हैं, अक्सर वित्तीय बाधाओं और संसाधनों की कमी के कारण पुरानी और अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकों का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं। कई औद्योगिक क्लस्टर्स में आज भी भट्ठियों को गर्म करने के लिए घटिया कोयले, फर्नेस ऑयल या यहां तक कि कबाड़ और प्लास्टिक कचरे का उपयोग अनौपचारिक रूप से किया जाता है। पर्यावरण नियमों को जमीन पर लागू करने वाली हमारी सरकारी एजेंसियां (जैसे राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) अक्सर भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव या जनशक्ति की भारीकमी के कारण इन उद्योगों पर प्रभावी ढंग से लगाम लगाने या उन्हें आधुनिक तकनीकों पर शिफ्ट करने में पूरी तरह विफल साबित होती हैं।

NO₂ का अदृश्य आतंक और स्वास्थ्य संकट

इस पूरे वैज्ञानिक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने जिस प्रदूषक तत्व पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है और जिसे शहरी विकास की बर्बादी का मुख्य संकेतक माना है, वह है नाइट्रोजन डाइऑक्साइड । आमतौर पर आम लोग केवल PM(2.5) या PM(10)(धूल के कणों) के बारे में ही चर्चा करते हैं, लेकिन NO₂ एक ऐसा अदृश्य और मौन आतंक है जो हवा में घुलकर सीधे हमारे जीवन को लील रहा है।

  • जब जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल, डीजल) को बहुत ही उच्च तापमान पर जलाया जाता है, तो हवा में मौजूद नाइट्रोजन और ऑक्सीजन आपस में प्रतिक्रिया करके इस गैस का निर्माण करते हैं। चिकित्सा वैज्ञानिकों और पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ों के रोग विशेषज्ञ) के अनुसार, हवा में NO₂ का बढ़ा हुआ स्तर मानव शरीर के श्वसन तंत्र पर सीधा और तीखा हमला करता है। जब हम लगातार ऐसी हवा में सांस लेते हैं, तो इसके हमारे स्वास्थ्य पर निम्नलिखित दूरगामी और जानलेवा प्रभाव पड़ता हैं।
  • बच्चों के फेफड़ों का अपूर्ण विकास: जो बच्चे बचपन से ही उच्च NO₂ वाले शहरी इलाकों में रह रहे हैं, उनके फेफड़ों का प्राकृतिक और पूर्ण विकास रुक जाता है। ऐसे बच्चे बहुत कम उम्र में ही गंभीर अस्थमा (Asthma), एलर्जी और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस (chronic bronchitis) जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। भारतीय शहरों के स्कूलों में इनहेलर का उपयोग करने वाले बच्चों की बढ़ती संख्या इसका जीवंत प्रमाण है।
  • वयस्कों में सीओपीडी (COPD) का खतरा: यह फेफड़ों की एक ऐसी असाध्य और दर्दनाक बीमारी है जिसमें इंसान की सांस लेने की क्षमता धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। फेफड़ों के ऊतकों में लगातार होने वाली सूजन अंत में फेफड़ों के कैंसर (Lung Cancer) का रूप ले सकती है, भले ही वह व्यक्ति धूम्रपान न करता हो।
  • हृदय रोग, स्ट्रोक और समय से पहले मृत्यु: हालिया कार्डियोलॉजिकल (cardiological) शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि जब NO₂ और उससे जुड़े अन्य बारीक कण फेफड़ों के जरिए हमारे रक्त प्रवाह (Bloodstream) में प्रवेश करते हैं, तो वे हमारी रक्त वाहिकाओं में गंभीर सूजन (Inflammation) पैदा कर देते हैं। इसके कारण धमनियों में थक्के जमने लगते हैं, जिससे साइलेंट हार्ट अटैक ( Silent Heart Attack) और ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है।

चीन और पश्चिमी देशों से तुलना: भारत के लिए एक बड़ा आईना

'नेचर सिटीज' की यह विस्तृत रिपोर्ट केवल भारत की कमियों को उजागर करके नहीं रुक जाती, बल्कि यह वैश्विक संदर्भ और अन्य देशों के सफल उदाहरण प्रस्तुत करके यह भी बताती है कि इच्छाशक्ति हो तो इस भयावह स्थिति को पूरी तरह बदला जा सकता है। रिपोर्ट में चीन और पश्चिमी दुनिया (यूरोप और उत्तरी अमेरिका) के जो तुलनात्मक आंकड़े दिए गए हैं, वे भारत के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा सबक और आईना हैं।

चीन का कायाकल्प और 'क्लीनर एंड रिचर' मॉडल

  • एक दशक पहले तक चीन के शहर, विशेषकर उसकी राजधानी बीजिंग और शंघाई जैसे आर्थिक केंद्र, अपनी जहरीली और धुंध भरी हवा के लिए पूरी दुनिया में कुख्यात थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बीजिंग के प्रदूषण को 'एयरपोकैलिप्स' (Airpocalypse) यानी हवा का कयामत कहा जाता था। लेकिन चीन की सरकार ने इसे अपनी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और जनस्वास्थ्य पर एक बड़ा हमला माना और अपनी नीतियों में एक क्रांतिकारी व सख्त बदलाव किया। उन्होंने 'हवा की गुणवत्ता ( Air Quality) में सुधार' को एक शीर्ष राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया।
  • चीन ने अपने सभी बड़े शहरों के भीतर कोयले के किसी भी रूप में उपयोग पर पूरी तरह से कानूनी प्रतिबंध लगा दिया। शहरों के आसपास चल रहे भारी प्रदूषणकारी उद्योगों को रातों-रात शहरी सीमाओं से सैकड़ों किलोमीटर दूर गैर-रिहायशी इलाकों में स्थानांतरित कर दिया गया। इसके साथ ही, चीन ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के निर्माण, सब्सिडी और उनके चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में अपनी पूरी आर्थिक ताकत झोंक दी। आज इसका नतीजा यह है कि 'नेचर सिटीज' की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के 719 शहर 'साफ और अमीर' (Cleaner and Richer) की श्रेणी में गर्व से खड़े हैं। चीन ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि एक विशाल मैन्युफैक्चरिंग और औद्योगिक अर्थव्यवस्था होने के बावजूद सख्त नीतियों से हवा को साफ रखा जा सकता है।

यूरोप और उत्तरी अमेरिका का 'डीकपलिंग' (Decoupling) मंत्र

  • पश्चिमी देशों, विशेषकर यूरोपीय संघ के देशों ने आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक बहुत ही वैज्ञानिक संतुलन स्थापित किया है, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में 'डीकपलिंग' (Decoupling) कहा जाता है। इसका सरल अर्थ यह है कि देश की जीडीपी (GDP) का ग्राफ तो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहेगा, लेकिन उसके कारण होने वाले कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण का ग्राफ नीचे की ओर गिरेगा। यानी विकास और प्रदूषण का संबंध एक-दूसरे से पूरी तरह टूट जाता है।
  • यूरोपीय महानगरों (जैसे लंदन, पेरिस, एम्स्टर्डम) ने अपनी शहरी परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह से पुनर्जीवित किया है। वहां निजी कारों के उपयोग को बेहद महंगा और हतोत्साहित (Discouraged) किया गया है, जबकि इसके स्थान पर साइकिल ट्रैक, पैदल चलने के लिए समर्पित रास्तों और शून्य-उत्सर्जन वाली इलेक्ट्रिक या हाइड्रोजन बसों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसके अलावा, इन देशों ने अपने कुल ऊर्जा मिश्रण (Energy Mix) में जीवाश्म ईंधन और कोयले की हिस्सेदारी को घटाकर बेहद न्यूनतम स्तर पर ला दिया है और अपना पूरा ध्यान परमाणु, सौर और पवन ऊर्जा पर केंद्रित किया है।

समाधान की राह: 'फिल्दी रिच' से 'क्लीन एंड रिच' बनने की नीति

यदि भारत को वैश्विक मंच पर 'प्रदूषित होकर अमीर बनने' के इस बदनाम तमगे से मुक्ति पानी है और अपनी भावी पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य देना है, तो हमें अपने पारंपरिक विकास के ढर्रे को तुरंत छोड़ना होगा। इसके लिए पर्यावरणविदों और आर्थिक विश्लेषकों ने कुछ बहुत ही व्यावहारिक और ठोस रणनीतियों का सुझाव दिया है, जिन्हें युद्धस्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।

  • सार्वजनिक परिवहन में अभूतपूर्व और क्रांतिकारी निवेश: जब तक हमारे शहरों में सुरक्षित, वातानुकूलित, सस्ती और अत्यधिक विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन प्रणाली (जैसे बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक बसें और रैपिड मेट्रो) नागरिकों को उनके घर के दरवाजे पर उपलब्ध नहीं होगी, तब तक मध्यम वर्ग अपनी निजी गाड़ियों और दुपहिया वाहनों का उपयोग बंद नहीं करेगा। सरकार को हर छोटे-बड़े शहर में 'पब्लिक ट्रांसपोर्ट फर्स्ट' (सार्वजनिक परिवहन सर्वोपरि) की सख्त नीति अपनानी होगी।
  • ऊर्जा ग्रिड का तीव्र हरितकरण (Green Transition): कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर हमारी निर्भरता को कम करने के लिए केवल सौर ऊर्जा पैनल लगाना काफी नहीं है। हमें बड़े पैमाने पर 'ग्रिड-स्केल बैटरी स्टोरेज' (सौर ऊर्जा को संचित करने वाली विशाल बैटरियों) की तकनीकों में निवेश करना होगा, ताकि रात के समय या मानसून के दिनों में भी शहरों को बिना कोयला जलाए लगातार स्वच्छ बिजली की आपूर्ति की जा सके।
  • शहरी नियोजन और मास्टर प्लान में कड़े बदलाव: किसी भी शहर के नए मास्टर प्लान में औद्योगिक क्षेत्रों और रिहायशी कॉलोनियों के बीच एक बहुत बड़ा 'ग्रीन बफर जोन' (पेड़ों और सघन जंगलों की एक मोटी पट्टी) होना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, रीयल एस्टेट निर्माण कार्यों के दौरान धूल को हवा में उड़ने से रोकने के लिए 'एंटी-स्मॉग गन' और कड़े नियमों का उल्लंघन करने वाले बिल्डरों पर भारी आर्थिक जुर्माने और जेल की सजा का प्रावधान होना चाहिए।
  • उभरते टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए अर्ली एक्शन प्लान: केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर नासिक, जयपुर, इंदौर और लखनऊ जैसे तेजी से बढ़ रहे शहरों के लिए अभी से एक 'प्रिवेंटिव क्लीन एयर एक्शन प्लान' (निवारक स्वच्छ वायु योजना) लागू करना चाहिए। इन शहरों को महानगर बनने की अंधी दौड़ में अपनी शुद्ध हवा खोने से पहले ही बचाना होगा, अन्यथा ये भी बहुत जल्द दिल्ली की तरह 'गैस चैंबर' में तब्दील हो जाएंगे।

डॉ. दीपांशु जैन के साथ पत्रिका के सवाल-जवाब

'नेचर सिटीज' की रिपोर्ट में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) के बढ़ते स्तर को आर्थिक विकास की बड़ी कीमत बताया गया है। एक डॉक्टर के तौर पर आप हवा में बढ़ती इस गैस को मानव शरीर विशेषकर फेफड़ों और ब्लड सर्कुलेशन के लिए कितना खतरनाक मानते हैं?

मैं इस स्थिति को बेहद डरावना मानता हूं। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड एक 'साइलेंट किलर' है। जब यह गैस सांस के जरिए शरीर में जाती है, तो हमारे फेफड़ों के सबसे अंदरूनी हिस्से (Alveoli) को छील देती है। इससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है और बच्चों में अस्थमा व वयस्कों में COPD (Chronic Obstructive Pulmonary Disease ) का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सबसे खतरनाक बात यह है कि NO₂ केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहती। यह फेफड़ों की दीवार को पार कर हमारे ब्लड सर्कुलेशन (रक्त प्रवाह) में घुल जाती है। खून में घुलकर यह धमनियों के अंदरूनी हिस्से को नुकसान पहुंचाती है, जिससे खून गाढ़ा होने लगता है और क्लॉटिंग (थक्के) शुरू हो जाती है। यही वजह है कि आज हमारे पास बिना किसी स्मोकिंग बैकग्राउंड या हिस्ट्री के भी 30-35 साल के युवा सीधे 'साइलेंट हार्ट अटैक' और ब्रेन स्ट्रोक के साथ आ रहे हैं। हम आर्थिक रूप से अमीर तो हो रहे हैं, लेकिन अपनी शारीरिक पूंजी गंवाकर।

प्रदूषित शहर में रहने वाले बच्चों के फेफड़ों के प्राकृतिक विकास (Lung Development) पर क्या असर पड़ रहा है? क्या आपके पास ऐसे बच्चों के केस बढ़ रहे हैं जिन्हें बहुत कम उम्र में इनहेलर की जरूरत पड़ रही है?

यह हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है। प्रदूषित शहरीकरण बच्चों के फेफड़ों के प्राकृतिक विकास को पूरी तरह रोक रहा है। जन्म से लेकर 18 साल तक फेफड़े बढ़ते हैं, लेकिन हवा में घुली जहरीली गैस फेफड़ों के नए वायुकोशों (Alveoli) के बनने की प्रक्रिया को ही धीमा कर देती है। नतीजा बच्चों के फेफड़े उम्र के हिसाब से छोटे और कमजोर रह जाते हैं, जिससे उनकी 'लंग कैपेसिटी' हमेशा के लिए कम हो जाती है। हां, हमारे क्लीनिक में ऐसे बच्चों के मामले रफ्तार से बढ़ रहे हैं। अब 5 से 8 साल के मासूम बच्चों को लगातार खांसी, घरघराहट (Wheezing) और सांस फूलने की शिकायत के साथ लाया जा रहा है। खेल-कूद तो दूर, उन्हें सामान्य दिनचर्या के लिए भी बहुत कम उम्र में इनहेलर (Inhaler) का सहारा लेना पड़ रहा है। यह सीधे तौर पर उनके बचपन और भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

क्या गर्भावस्था के दौरान इस तरह की जहरीली हवा के संपर्क में रहने से नवजात शिशुओं में जन्मजात बीमारियां या समय से पहले डिलीवरी (Premature Birth) का खतरा बढ़ जाता है?

यह खतरा बहुत गंभीर है। गर्भावस्था के दौरान जब एक मां जहरीली हवा में सांस लेती है, तो ये सूक्ष्म कण फेफड़ों से होते हुए गर्भनाल (Placenta) तक पहुंच जाते हैं। इससे गर्भनाल में सूजन आ जाती है और भ्रूण तक ऑक्सीजन व जरूरी पोषक तत्वों की सप्लाई कम हो जाती है। नतीजा, गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास रुक जाता है, जिससे 'समय से पहले डिलीवरी' (Premature Birth) और जन्म के समय बच्चे का वजन बेहद कम (Low Birth Weight) होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, जहरीले टॉक्सिन्स के कारण नवजात शिशुओं में जन्मजात सांस की बीमारियां और कमजोर इम्युनिटी जैसी समस्याएं सीधे तौर पर देखी जा रही हैं।

लोग अक्सर प्रदूषण से बचने के लिए साधारण कपड़े का मास्क या सर्जिकल मास्क पहनकर निश्चिंत हो जाते हैं। क्या ये मास्क जहरली गैसों और सूक्ष्म कणों को रोकने में सक्षम हैं? कौन सा मास्क लगाना बेहतर हैं ?

उन्होंने कहा, साधारण कपड़े का मास्क या थ्री-प्लाई सर्जिकल मास्क केवल धूल के बड़े कणों या थूक की बूंदों (droplets) को रोक सकते हैं। ये हवा में घुली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों और जैसे अति-सूक्ष्म कणों को रोकने में पूरी तरह नाकाम हैं, क्योंकि इन कणों का आकार मास्क के छिद्रों से बहुत छोटा होता है। प्रदूषण से बचने के लिए N95 या N99 रेटिंग वाले रेस्पिरेटर मास्क लगाना ही सबसे बेहतर है। ये मास्क हवा के 95% से 99% तक हानिकारक सूक्ष्म कणों और कुछ हद तक गैसों को फिल्टर कर सकते हैं। बस ध्यान रहे कि मास्क चेहरे पर पूरी तरह फिट (Snug fit) होना चाहिए, वरना किनारों से लीक होने वाली हवा आपको बीमार कर देगी।

लोग प्रदूषण के डर से घरों के भीतर ही बंद रहते हैं, लेकिन घर के अंदर का प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या है। घरों की हवा को साफ रखने के लिए क्या करना चाहिए?

यह सोचना गलत है कि घर के अंदर की हवा पूरी तरह सुरक्षित है। खाना पकाने की गैस, अगरबत्ती का धुआं, पालतू जानवरों के बाल और वेंटिलेशन की कमी मिलकर 'इंडोर पॉल्यूशन' बढ़ाते हैं। इससे बचने के लिए सबसे पहले क्रॉस-वेंटिलेशन जरूरी है। दोपहर के समय जब बाहर प्रदूषण कम हो, तब खिड़कियां जरूर खोलें। रसोई में एग्जॉस्ट फैन या चिमनी का इस्तेमाल अनिवार्य करें। घर के अंदर अगरबत्ती या मोमबत्ती जलाने से बचें। हवा को शुद्ध करने के लिए एरेका पाम, स्नेक प्लांट जैसे एयर-प्यूरिफाइंग पौधे लगाएं और बजट हो, तो HEPA फिल्टर वाले एयर प्यूरिफायर का इस्तेमाल करें।

नासिक जैसे टियर-2 शहर अब दुनिया के टॉप 10 प्रदूषित आर्थिक केंद्रों में आ गए हैं। क्या आप अपने क्लिनिक या अस्पताल में ऐसे मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी देख रहे हैं जिनका कोई स्मोकिंग बैकग्राउंड नहीं है, फिर भी उनके फेफड़े स्मोकर्स जैसे खराब हो चुके हैं?

पिछले कुछ सालों में हमारे पास ऐसे मरीजों की संख्या 30% से 40% तक बढ़ गई है, जिन्होंने जीवन में कभी सिगरेट या बीड़ी को छुआ तक नहीं है। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं, युवाओं और नासिक व जयपुर जैसे टियर-2 शहरों के निवासियों की है। जब हम इन नॉन-स्मोकर्स का एक्स-रे या सीटी स्कैन (CT Scan) देखते हैं, तो उनके फेफड़े किसी चेन-स्मोकर (लगातार सिगरेट पीने वाले) की तरह काले और डैमेज दिखाई देते हैं। हवा में घुली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और जहरीले कण उनके फेफड़ों को उसी तरह धीरे-धीरे जला रहे हैं जैसे सिगरेट का धुआं जलाता है। अब स्थिति यह है कि इन शहरों में रहने वाला हर नागरिक मजबूरी में 'पैसिव स्मोकर' बन चुका है, और बिना धूम्रपान किए ही गंभीर बीमारियों की ओर बढ़ रहा है।

मेडिकल कम्युनिटी की तरफ से आप सरकार और शहरी योजनाकारों को क्या सुझाव देना चाहेंगे? क्या हमें आर्थिक विकास (GDP) के साथ-साथ 'हेल्थ इंडेक्स' को भी शहरों की सफलता का पैमाना नहीं बनाना चाहिए?

  • मेडिकल कम्युनिटी की तरफ से मेरा सरकार को यही सबसे पहला सुझाव है कि अब समय आ गया है जब हमें शहरों की सफलता को सिर्फ जीडीपी (GDP) से मापना बंद करना होगा। जिस विकास की कीमत हमारे नागरिकों को अपने फेफड़े और जिंदगी देकर चुकानी पड़े, उसे प्रगति नहीं कहा जा सकता। हर शहर का अपना एक 'हेल्थ इंडेक्स' (स्वास्थ्य सूचकांक) होना अनिवार्य किया जाना चाहिए, जो वहां की हवा और जनता की सेहत का रिपोर्ट कार्ड हो।
  • शहरी योजनाकारों को मेरा सुझाव है कि वे 'ग्रीन अर्बनाइजेशन' को अपनाएं। नए मास्टर प्लान में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को डीजल-पेट्रोल से मुक्त कर पूरी तरह इलेक्ट्रिक या सीएनजी पर शिफ्ट करें। औद्योगिक क्षेत्रों और रिहायशी कॉलोनियों के बीच घने जंगलों की 'ग्रीन बेल्ट' अनिवार्य हो। जब तक नीति निर्धारण में 'हेल्थ फर्स्ट' की सोच नहीं आएगी, तब तक हमारे शहर सिर्फ पैसे से अमीर और सांसों से गरीब बनते रहेंगे।

आप 3 या 4 'क्विक प्रिवेंटिव टिप्स' (Do's and Don'ts) बता दीजिए, जिन्हें अपनाकर वे इस जहरीली हवा के बीच भी खुद को और अपने परिवार को काफी हद तक सुरक्षित रख सकें।

Do's (क्या करें):

  • सुबह या शाम को वॉक/आउटडोर एक्सरसाइज के बजाय दोपहर में बाहर निकलें, क्योंकि सुबह प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा होता है।
  • बाहर जाते समय हमेशा N95 मास्क का उपयोग करें।
  • डाइट में विटामिन-C, एंटीऑक्सीडेंट्स और गुड़ जैसी चीजें शामिल करें जो इम्युनिटी बढ़ाती हैं।

Don'ts (क्या न करें):

  • घर के अंदर अगरबत्ती, मोमबत्ती या मॉस्किटो कॉइल बिल्कुल न जलाएं, यह इंडोर प्रदूषण को खतरनाक स्तर पर ले जाता है।
  • भारी ट्रैफिक वाले रास्तों पर खिड़की खोलकर गाड़ी चलाने से बचें।
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