
India US Trade Deal: दिल्ली की ओर बढ़ते किसानों के ट्रैक्टर, सीमाओं पर बढ़ाई गई सुरक्षा और दूसरी तरफ भारत-अमेरिका के बीच तेजी से आगे बढ़ती व्यापार वार्ता। इन दोनों तस्वीरों को अगर साथ रखकर देखें तो साफ समझ आता है कि मामला केवल एक व्यापार समझौते का नहीं है। बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, किसानों की आजीविका, उद्योगों के भविष्य और वैश्विक राजनीति से जुड़ा हुआ मुद्दा है। भारत सरकार इसे निर्यात बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने का अवसर मान रही है। वहीं किसान संगठनों का कहना है कि यदि समझौते में कृषि क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली, तो इसका सबसे बड़ा असर छोटे और मध्यम किसानों पर नजर आ सकता है। यही वजह है कि यह ट्रेड डील अब केवल आर्थिक विषय नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन चुकी है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ट्रेड डील (Trade Deal) का मतलब क्या होता है। दरअसल जब दो देश आपस में यह तय करते हैं कि वे एक-दूसरे के सामान और सेवाओं के व्यापार को आसान बनाएंगे, आयात-निर्यात पर लगने वाले कुछ शुल्क (Tariff) कम करेंगे या कुछ नियमों में ढील देंगे, तो इसे व्यापार समझौता कहा जाता है।
यदि भारत अमेरिका से कोई मशीन मंगवाता है, तो उस पर सरकार आयात शुल्क लगाती है। इसी तरह अमेरिका भी भारत से जाने वाले कपड़े, दवाइयों या इंजीनियरिंग सामान पर शुल्क लगाता है। अगर दोनों देश तय कर लें कि कुछ उत्पादों पर शुल्क कम किया जाएगा या व्यापार आसान बनाया जाएगा, तो दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ सकता है। लेकिन हर व्यापार समझौते में कुछ क्षेत्रों को फायदा मिलता है और कुछ क्षेत्रों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि हर ट्रेड डील पर बहस होती है।
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच हर साल 190 अरब डॉलर से ज्यादा की वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार होता है। पिछले कुछ वर्षों में यह व्यापार लगातार बढ़ा है।
भारत अमेरिका को दवाइयां, IT सेवाएं, हीरे और आभूषण, इंजीनियरिंग उत्पाद, कपड़ा, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स तो वहीं अमेरिका से भारत कच्चा तेल और गैस मुख्य रूप से खरीदता है। विमान और विमान उपकरण, रक्षा उपकरण, मेडिकल उपकरण, कृषि उत्पाद, तकनीकी मशीनें आदि खरीदता है।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है, लेकिन कई उत्पादों पर शुल्क और बाजार पहुंच को लेकर मतभेद बने हुए थे। अमेरिका चाहता है कि उसके कृषि और औद्योगिक उत्पादों को भारत में ज्यादा बाजार मिले। भारत चाहता है कि उसके फार्मा, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग, आईटी और अन्य निर्यात पर अमेरिका कम बाधाएं लगाए। इसी संतुलन को बनाने के लिए दोनों देशों के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही थी। अब जब वार्ता अंतिम चरण में पहुंची है और समझौते की दिशा साफ होने लगी है, तब किसान संगठनों ने विरोध तेज कर दिया।
गौरतलब है कि फरवरी 2026 में भारत और अमेरिका के बीच एक इंटरिम ट्रेड डील पहले ही फाइनल हो चुकी है और अब जिस समझौते को लेकर बहस हो रही है वो उससे आगे की एक व्यापक (कॉम्प्रिहेंसिव) डील है।
किसानों की चिंता से पूरी कहानी बदल जाती है। किसानों का विरोध इस बात पर नहीं है कि भारत अमेरिका से व्यापार क्यों कर रहा है। उनकी चिंता है कि अगर अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय बाजार में कम शुल्क पर आने लगे, तो क्या भारतीय किसान उनसे मुकाबला कर पाएंगे? उनका कहना है कि अमेरिका की खेती अत्यधिक मशीनीकृत है। वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। सरकारी सहायता का ढांचा भी अलग है। ऐसे में भारतीय किसान संगठनों को डर है कि सस्ते विदेशी उत्पाद आने लगे तो, घरेलू किसानों को नुकसान हो सकता है।
कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील सिर्फ दो देशों के बीच व्यापार का मामला नहीं है। यह उस संतुलन की परीक्षा है, जहां एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ व्यापार बढ़ाने का अवसर है, तो दूसरी तरफ एक सवाल भी कि करोड़ों भारतीय किसानों की आजीविका और कृषि सुरक्षा का क्या? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस डील में ऐसी कौन-सी शर्तें हैं, जिन पर किसान सबसे ज्यादा आपत्ति जता रहे हैं? अमेरिका आखिर भारत से क्या चाहता है और भारत किस बात पर अड़ा है?
डील के मुद्दे पर यही सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक सवाल है। दरअसल वास्तविकता यह है कि किसी भी ट्रेड डील में दोनों देशों को कुछ रियायतें देनी और कुछ हासिल करनी पड़ती हैं। इसे 'Give and Take Negotiation' कहा जाता है। लेकिन बहस इस बात पर शुरू होती है कि भारत ने क्या देने की बात की और बदले में क्या पाना चाह रहा है?
अमेरिका लंबे समय से कहता रहा है कि भारत दुनिया के बड़े बाजारों में से एक है, लेकिन यहां कई उत्पादों पर आयात शुल्क (Tariff) अधिक है। इसलिए अमेरिकी कंपनियां भारतीय बाजार में पूरी क्षमता से प्रवेश नहीं कर पातीं। जबकि अमेरिका कृषि उत्पादों जैसे- सेब, बादाम, अखरोट, मक्का आधारित पशु आहार (DDGS), सोयाबीन तेल, कुछ प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद जैसी कुछ वस्तुओं से शुल्क घटाने या कोटा आधारित रियायतों पर चर्चा कर चुका है।
अमेरिका चाहता है कि उसके डेयरी उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक अवसर मिलें। लेकिन भारत का डेयरी क्षेत्र करोड़ों छोटे पशुपालकों की आजीविका से जुड़ा है, इसलिए यह सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है। अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से कहती रही हैं कि भारत में मेडिकल उपकरणों पर मूल्य नियंत्रण किया जाना चाहिए और नियम उनके लिए चुनौती हैं। अमेरिका डिजिटल व्यापार भी बढ़ाना चाहता है। इसके तहत डेटा प्रवाह, ई-कॉमर्स नियम, डिजिटल सेवाओं जैसे विषयों पर भी बातचीत का हिस्सा होने की जानकारी सामने आई है। ऑटो और औद्योगिक सामान भी अमेरिका भारतीय बाजार में उतारना चाहता है। अमेरिका चाहता है कि भारतीय बाजार में औद्योगिक उत्पादों और कुछ विनिर्मित वस्तुओं पर आयात आसान हो।
भारत का उद्देश्य केवल आयात बढ़ाना नहीं है। भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार भारतीय उद्योगों के लिए और अधिक खुले। भारत की प्राथमिकताओं में फार्मास्यूटिकल्स यानी दवाएं, टेक्सटाइल और गारमेंट्स, इंजीनियरिंग सामान, आईटी सेवाएं, जेम्स एंड ज्वेलरी, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुओं का अमेरिकी बाजार बढ़ें। भारत का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों को बेहतर बाजार मिलेगा तो निर्यात बढ़ेगा, विदेशी मुद्रा आएगी और रोजगार भी बढ़ सकते हैं।
यह पूरी बहस केवल 'टैरिफ' की है। अब आप सोच रहे होंगे कि टैरिफ क्या होता है? दरअसल जब कोई विदेशी सामान भारत आता है तो सरकार उस पर टैक्स लगाती है। इसी टैक्स को टैरिफ यानी आयात शुल्क कहा जाता है। यह शुल्क कम कर दिया जाए तो विदेशी सामान सस्ता हो सकता है। लेकिन भारतीय उत्पादकों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। यही कारण है कि किसान संगठन सबसे ज्यादा कृषि उत्पादों पर शुल्क में संभावित कमी को लेकर चिंतित हैं।
सेब- हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के बागवानों को आशंका है कि सस्ते आयातित अमेरिकी सेब घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं। हालांकि बातचीत में न्यूनतम आयात मूल्य और रियायती शुल्क जैसी सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी चर्चा हुई है।
सोयाबीन- मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य है। यदि अमेरिकी सोयाबीन या उससे जुड़े उत्पाद कम शुल्क पर आते हैं तो किसानों को कीमतों को लेकर चिंता है।
मक्का - पशु आहार उद्योग में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों पर रियायतें भी चर्चा में रही हैं, जिसे लेकर कुछ किसान संगठनों ने चिंता जताई है।
डेयरी- यह सबसे संवेदनशील विषय है। भारत का डेयरी मॉडल छोटे किसानों और सहकारी संस्थाओं पर आधारित है। यदि विदेशी डेयरी उत्पादों को अधिक पहुंच मिलती है, तो प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि डेयरी हितों की रक्षा की जाएगी।
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी इसमें दखल दिखाया था और कहा कि कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की रक्षा की गई है और समझौते में किसानों के हितों से समझौता नहीं होगा।
यही बात कई किसान संगठनों की ओर से बार-बार कही जा रही है। उनका कहना है कि वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यदि किसी समझौते से भारतीय किसानों की आय, फसलों के दाम या डेयरी क्षेत्र पर असर पड़ता है तो, उनकी आशंकाओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर विभिन्न किसान संगठनों ने दिल्ली कूच और महापंचायत का आह्वान किया।
यही सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल है। तथ्य बताते हैं कि अब तक ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है कि इस ट्रेड डील के कारण MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) समाप्त होगा या उसमें बदलाव किया जाएगा।
क्योंकि उनका मानना है कि यदि भविष्य में सस्ते आयात बढ़ते हैं, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव आ सकता है। इससे वे MSP व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष असर पड़ने की आशंका जताते हैं। यानी MSP खत्म होने की बात नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित बाजार प्रतिस्पर्धा को लेकर चिंता है।
कुछ किसान संगठनों को आशंका है कि व्यापार समझौतों के साथ बड़ी कृषि कंपनियों का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि, वर्तमान व्यापार वार्ता के सार्वजनिक दस्तावेज़ों में ऐसा कोई प्रावधान स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है कि भारत के बीज कानून या किसानों के पारंपरिक अधिकारों में तत्काल बदलाव किया जाएगा।
भारत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), खाद्य निगम (FCI) और MSP के जरिए करोड़ों लोगों के लिए खाद्यान्न खरीदता है। किसानों का सवाल है कि यदि भविष्य में कृषि आयात बढ़े, तो क्या सरकारी खरीद की नीति प्रभावित होगी? सरकार ने इस पर कोई ऐसा संकेत नहीं दिया है कि सार्वजनिक खरीद व्यवस्था समाप्त की जाएगी।
सरकार लगातार तीन बातें दोहरा रही है कि-
1. किसानों के हितों से समझौता नहीं होगा।
2. संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा की जाएगी।
3. समझौता भारत के निर्यात और रोजगार को बढ़ाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
दरअसल सरकार का कहना है कि भारत अमेरिका ट्रेड डील का मुख्य उद्देश्य भारतीय निर्यात को बढ़ावा देना और भारतीय उत्पादों की पहुंच वैश्विक बाजारों तक आसान करना है। इसके साथ ही विदेशी निवेश को आकर्षित करना और नए रोजगार अवसर पैदा करना है। सरकार यह भी कहती है कि उन क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा दी गई है जहां भारतीय किसानों और घरेलू उद्योगों पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। वाणिज्य मंत्रालय का भी कहना है कि भारत किसी भी व्यापार समझौते में अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है।
एमपी बीजेपी से राज्यसभा सांसद रजनीश अग्रवाल ने अमेरिका भारत ट्रेड डील पर पत्रिका से बातचीत करते हुए कांग्रेस के विरोध पर कहा है कि कांग्रेस का रवैया भ्रम फैलाने वाला रहा है, वो तथ्यहीन बातें करती है। ट्रेड डील हो या डोमेस्टिक पॉलिसी, किसान कल्याण और कृषि दोनों ही केंद्र और राज्य सरकार दोनों की प्राथमिकता में हमेशा रहा है। किसानों का दिल्ली कूच करना महज एक राजनीतिक मूवमेंट है। अभी देश में चार जगह कांग्रेस की सरकारें हैं। वो बताएं कि उन्होंने समर्थन मूल्य पर किसानों से कितनी खरीदी की है। हम तो प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से लेकर तमाम तरह की मदद किसानों को दे रहे हैं और उनके उत्पादन तथा निर्यात बढ़ाने के लिए भी लगातार काम कर रहे हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री खुद कह चुके हैं कि निर्यात बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
इधर मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता आनंद जाट ने पत्रिका से बातचीत के दौरान सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा, यह कांग्रेस का नहीं, देश का सवाल है, 2014 से सरकार ने अपने कितने दावे पूरे किए? क्या हर साल 2 करोड़ रोजगार मिले, क्या किसानों की आमदनी दोगुनी हुई, क्या पेपर लीक जैसी परीक्षाएं रुकीं? भारत के किसान इस डील से प्रभावित होंगे, खासतौर पर डेयरी उत्पादक। यह फैसला अमेरिका ने लिया है, भारत ने नहीं।
उनका कहना है, यह भारत की संप्रभुता से जुड़ा सवाल है। जो किसान इससे प्रभावित होंगे, उनसे एक बार भी नहीं पूछा गया। अगर हमें हर साल अमेरिका से सोयाबीन खली, तेल और मक्का प्रोडक्ट लेने पड़ें, तो सवाल यह है कि जब सरकार अपने किसानों को पर्याप्त सब्सिडी तक नहीं दे पाती, तो वो किसान अमेरिकी किसान से मुकाबला कैसे करेगा, जिसे वहां औसतन हर साल भारी सब्सिडी मिलती है? सरकार मूंग की दाल तक नहीं खरीद पा रही है किसानों से। अगर सरकार के पास इसके पक्ष में तथ्य हैं, तो मेरी चुनौती है कि केंद्रीय कृषि मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दस्तावेज सार्वजनिक करें। कांग्रेस हमेशा वहीं खड़ी रही है जहां देश को फायदा हो, हमने पहले भी दबाव में आकर कोई देश-विरोधी डील नहीं की, न आगे करेंगे।
इसके लिए यह समझना जरूरी है कि पूरे देश के सभी किसान संगठन एक जैसी राय नहीं रखते। कुछ संगठन इस डील का विरोध कर रहे हैं और अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, जबकि कई किसान और कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, तो निर्यात बढ़ने से कृषि के कुछ क्षेत्रों को भी लाभ मिल सकता है।
यदि भारतीय कृषि-प्रसंस्करण (Food Processing), मसाले, बासमती चावल, फल-सब्जियों के प्रसंस्कृत उत्पाद और अन्य निर्यात क्षेत्रों को बेहतर बाजार मिलता है, तो कुछ किसानों और कृषि उद्योगों को लाभ भी हो सकता है। यानी इस डील का असर सभी किसानों पर एक जैसा नहीं होगा।
यदि यह समझौता संतुलित रूप से लागू होता है, तो भारत को कई क्षेत्रों में लाभ मिल सकता है-
गौरतलब है कि अब यह पूरा विवाद केवल व्यापार का नहीं है। असल सवाल यह है कि, क्या भारत आर्थिक विकास और किसानों की सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन बना पाएगा? यदि सरकार संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की रक्षा करते हुए उद्योग और निर्यात को बढ़ावा देती है, तो यह समझौता देश के लिए अवसर बन सकता है। लेकिन यदि किसानों की आशंकाओं का समाधान नहीं हुआ, तो यही समझौता लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक विवाद का कारण भी बनकर रह जाएगा।