Blue Collar Jobs growth: एआई को लेकर पूरी दुनिया में यह बहस छिड़ी हुई है कि यह किन-किन सेक्टरों में नौकरियों को नकारात्मक तौर पर प्रभावित करेगा। हालांकि पिछले 10 वर्षों के श्रम बाजार के विश्लेषण से यह साफ है कि ब्लू कॉलर जॉब्स अब केवल श्रम आधारित कार्यों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वे आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुकी हैं।

Blue Collar Jobs India : भारत में पिछले चार वर्षों में ब्लू कॉलर जॉब्स में काफी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हालांकि पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो केंद्र में 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही ब्लू कॉलर जॉब्स में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ब्लू कॉलर जॉब्स में कोविड-19 के बाद गुणात्मक रूप से तेजी दर्ज की गई है।
Why Blue collar Jobs seeing growth? प्रतिभा समाधान कंपनी रैंडस्टैड द्वारा 5 करोड़ से अधिक नौकरी विज्ञापनों के विश्लेषण करने के बाद रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि ब्लू कॉलर नौकरियों में पिछले चार वर्षों से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। एआई के चलते इन नौकरियों में और ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। आइए जानते हैं कि किस तरह के स्किल से लैस लोगों की नौकरियों और आमदनियों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके साथ यह भी जानते हैं कि एआई के चलते किस तरह की नौकरियों की मांग कम हो रही है।
व्हाइट कॉलर जॉब्स मुख्यतः किसी भी कार्यालय में डेस्क जॉब होता है। व्हाइट कॉलर जॉब मूल रूप में बौद्धिक और प्रबंधन गतिविधियों से जुड़ी होती हैं। मिसाल के तौर पर प्रबंधन, शिक्षा, बैंकिंग, आईटी, वित्त और प्रशासन। वहीं ब्लू कॉलर जॉब्स में वे लोग शामिल होते हैं जिनके पास आईटीआई या किसी प्रतिष्ठित संस्थान से डिप्लोमा, डिग्री, व्यवसायिक प्रमाण पत्र होता है। उत्पादन, निर्माण, मशीन संचालन, परिवहन, वेयरहाउसिंग, मरम्मत, तकनीकी सेवाओं और श्रम आधारित कार्यों से संबंधित होती हैं। भारत में कुशल व्यवसायों की मांग में आई तेजी से भारत में ब्लू कॉलर जॉब्स से जुड़े लोगों की आमदनी भी बढ़ी है। इससे ब्लू-कॉलर कर्मचारियों और शुरुआती स्तर के व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के बीच वेतन का अंतर कम हो रहा है।
इसके विपरीत डेटा एंट्री ऑपरेटर और जूनियर अकाउंटिंग जैसी प्रारंभिक स्तर की व्हाइट-कॉलर नौकरियों का वार्षिक वेतन लगभग 2.71 लाख रुपये के आसपास है। इनमें से कई भूमिकाएं एआई के चलते प्रभावित हो रही हैं।
वर्ष 2015 में ब्लू कॉलर जॉब्स में ग्रोथ 2-3 प्रतिशत थी और व्हाइट कॉलर जॉब्स में 5-6 फीसदी। ब्लू कॉलर जॉब्स में वर्ष 2016 से ग्रोथ दर्ज की जाने लगी, जबकि व्हाइट कॉलर नौकरियां कम होने लगी। 2016 में ब्लू कॉलर में ग्रोथ रेट 3-4 प्रतिशत, जबकि व्हाइट कॉलर में यह कम होकर 5 फीसदी रह गई। वर्ष 2019 तक आते-आते ब्लू कॉलर जॉब्स की ग्रोथ दर बढ़कर 7 फीसदी पहुंच गई, जबकि 2018 और 2019 में व्हाइट कॉलर नौकरियों में ग्रोथ रेट गिरकर 4 फीसदी पर आ गई। कोविड काल के दौरान ब्लू कॉलर जॉब्स में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2025 तक आते-आते ब्लू कॉलर जॉब्स में 20 फीसदी तक की ग्रोथ दर्ज की गई।
वर्ष 2022 की शुरुआत से लेकर 2026 की शुरुआत तक भारत में ब्लू-कॉलर नौकरियों की संख्या 93% बढ़ी है, जबकि व्हाइट-कॉलर नौकरियों में वृद्धि 40% रही। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि भारत का रोजगार बाजार एक अनोखे विकास चरण में प्रवेश कर रहा है। जहां विकसित देशों में तकनीकी बदलाव अक्सर श्रम मांग को कम करते हैं, वहीं भारत में तेज औद्योगिकीकरण, बुनियादी ढांचा विकास और विनिर्माण विस्तार के कारण कुशल तकनीकी कर्मचारियों की मांग लगातार बढ़ रही है।
हालांकि कुछ नियमित और दोहराए जाने वाले कार्य एआई से प्रभावित हो सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन कुशल तकनीकी नौकरियों की आवश्यकता निकट भविष्य में बनी रहेगी और कई मामलों में और अधिक बढ़ेगी।
भारत में कोविड काल के बाद से ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स का विस्तार तेजी से हुआ है। बड़ी आबादी ऑनलाइन खरीदारी से जुड़ी है। अमेजन, फ्लिपकार्ट से लेकर तमाम कंपनियों ने ई-कॉमर्स के जरिए अपने कारोबार में बढ़ोतरी हासिल की है। इसके चलते डिलीवरी एजेंट, वेयरहाउस कर्मचारी, पैकिंग स्टाफ और परिवहन कर्मियों की मांग में भारी वृद्धि हुई है। पिछले दस वर्षों में लाखों नए रोजगार इसी क्षेत्र में सृजित हुए हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा शुरू की गई विभिन्न आधारभूत संरचना परियोजनाओं, मिसाल के तौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे कनेक्टिविटी बढ़ाने से लेकर आधुनिकीकरण में तेजी, स्मार्ट सिटी, मेट्रो रेल और आवास योजनाओं के चलते बड़ी संख्या में निर्माण श्रमिकों, मशीन ऑपरेटरों और तकनीकी कर्मचारियों की मांग बढ़ा रही है।
देश में बीजेपी सरकार के मेक इन इंडिया (Make in India) और स्किल इंडिया (Skill India) के जरिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, मोबाइल निर्माण और अन्य उद्योगों में उत्पादन बढ़ा है। इससे तकनीकी और अर्ध-कुशल श्रमिकों की आवश्यकता बढ़ी है। इसके चलते एयर कंडीशनर तकनीशियन, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन रिपेयर विशेषज्ञ, मोबाइल तकनीशियन और ऑटोमोबाइल मैकेनिक जैसे व्यवसायों की मांग लगातार बढ़ रही है। शहरी जीवनशैली और बढ़ती उपभोक्ता आवश्यकताओं ने इन व्यवसायों को नई पहचान दी है।
एक ओर ब्लू कॉलर जॉब्स में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, तो वहीं दूसरी ओर व्हाइट कॉलर जॉब में नौकरी हासिल करने और बनाए रखने की चुनौतियां बढ़ रही हैं। दरअसल, कार्यालयों में एआई और स्वचालित सॉफ्टवेयर की मदद से कई प्रशासनिक और डेटा आधारित कार्य संपन्न कराए जाने लगा है। इससे पारंपरिक व्हाइट कॉलर जॉब्स में कमी आ रही है। कोविड काल के दौरान दुनियाभर में कंपनियों ने कॉस्ट कटिंग का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। कंपनियां कम लागत में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने में जुट गई हैं। वहीं सामान्य बी.ए. और एम. ए. डिग्रीधारी युवाओं के पास उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कौशल नहीं हैं। इससे व्हाइट कॉलर नौकरियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और रोजगार प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है।