Indira Gandhi : भारत के इतिहास में 19 जनवरी 1966 को स्वर्णिम अध्याय जुड़ा। इंदिरा गांधी देश की पहिला प्रधानमंत्री बनीं। पीएम पद के लिए पार्टी के अंदर हुए चुनाव में इंदिरा ने मोरारजी देसाई को बुरी तरह से हराया। इतिहास की चाल पलटी और 1977 में मोरारजी ने इंदिरा और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। पढ़िए इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने की पूरी कहानी।
Indira Gandhi become first Women Prime Minister of India on 19th January 1966 : वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध (India-Pakistan War 1965) की समाप्ति के बाद देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद समझौते के लिए रूस के दौरे पर पहुंचे थे। वहां पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान और लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) के बीच समझौता होना था। वहां लाल बहादुर शास्त्री को दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया।
Lal Bahadur Shashtri Died in USSR : लाल बहादुर के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए कुछ लोग सामने आए, लेकिन देश की नियति में 19 जनवरी 1966 को एक स्वर्णिम अध्याय का जुड़ना तय था। पार्टी के अंदरूनी चुनाव में इंदिरा गांधी जीत गईं। क्या हुआ और कैसे हुआ यह सब आइए पढ़ते हैं विस्तृत रिपोर्ट।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (India's First Prime Minister Jawahar Lal Nehru) की इकलौती संतान इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी चुनाव में जीत मिली और वह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। पूर्व वित्त मंत्री मोरारजी देसाई (Morarji Desai) के साथ हुए कड़े नेतृत्व संघर्ष के बाद इंदिरा गांधी को चुना गया है। अपनी जीत के बाद, इंदिरा ने कांग्रेस पार्टी और देश की सेवा करने का संकल्प लिया और कहा कि "मेरे पिता शांति का माहौल बनाने के लिए प्रयासरत रहे, मैं उनके प्रयासों को आगे बढ़ाऊंगी।"
कांग्रेस पार्टी के चुनाव परिणाम के खबर लगते ही संसद भवन के बाहर लोगों की भीड़ जमा हो गई थी और जब वह चुनाव जीतने के बाद जब राष्ट्रपति से मिलने राष्ट्रपति भवन जा रही थीं तब भी लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया।
भारत के कांग्रेस शासित 16 राज्यों में से 11 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे उन्हें देश की सत्ता संभालने के लिए अपना पूरा समर्थन देंगे। इन सबके बावजूद इंदिरा गांधी ने पार्टी के नेता के चुनाव से चार दिन पहले तक अपनी उम्मीदवारी की पुष्टि नहीं की थी।
Guljarilal Nanda : पीएम पद के लिए एक प्रमुख उम्मीदवार गुलजारीलाल नंदा (Guljari Lal Nanda) ने श्रीमती गांधी के चुनाव लड़ने की बात सामने आते ही अपना नाम वापस ले लिया। गुलजारी नंदा को लाल बहादुर शास्त्री की अचानक निधन के बाद देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया था। वह सिर्फ 13 दिनों तक देश के प्रधानमंत्री रहे। इससे पहले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौत (Death Of Jawahar Lal Nehru) के बाद भी 27 मई 1964 से 9 जून 1964 तक उन्हें देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया था।
Indira Gandhi Defeated Guljari Lal Nanda : गुलजारीलाल नंदा के खुद से प्रधानमंत्री पद से पीछे हटने के बाद कांग्रेस पार्टी ने मोरारजी देसाई पर भी पीछे हटने का दबाव बनाया, लेकिन लोकतंत्र का हवाला देते हुए उन्होंने मतदान कराने पर जोर दिया। यह अनुमान लगाया गया था कि उन्हें कांग्रेस सांसदों के 526 वोटों में से 100 से भी कम वोट मिलेंगे। हालांकि मोरारजी को 169 वोट, जबकि इंदिरा गांधी को 355 वोट मिले।
इंदिरा गांधी के चुनाव जीतने के बाद मोरारजी ने उनका पूर्ण सहयोग देने का वादा किया। पार्टी के नेता पद के मामले में मोरारजी को लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा। वह इंदिरा गांधी से शिकस्त पाने से पहले लाल बहादुर शास्त्री के खिलाफ बिना मतदान के अपनी उम्मीदवारी वापस लेनी पड़ी थी। इंदिरा गांधी कैबिनेट में मंत्री रह चुके डॉ. कर्ण सिंह ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'मोरारजी देसाई ने कांग्रेस पार्टी के भीतर इंदिरा गांधी के विरोध में एक दक्षिणपंथी गुट का गठन किया था। इसके बावजूद इंदिरा ने 1967 और 1971 के आम चुनावों में जीत हासिल कर ली। हालांकि मोरारजी ने भी इसका बदला लिया और प्रधानमंत्री की गद्दी हासिल करके दिखाया।'
पूर्व प्रधानमंत्री ने गांधी सरनेम महात्मा गांधी से नहीं, बल्कि अपने पति फिरोज गांधी से लिया था। फिरोज पेशे से एक वकील थे और उनका 1960 में निधन हो गया था। 1940 के दशक में भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ने के बाद इस दंपति को राजद्रोह के आरोप में 13 महीने जेल में बिताने पड़े थे।
इंदिरा ने 1955 से लेकर प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठने तक कांग्रेस पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी राज्यसभा सदस्य बनीं और लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। उन्होंने सूचना मंत्री के रूप में कार्य किया।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा ने 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए संघर्ष की अध्यक्षता की। अमेरिका की धमकी के बावजूद पाकिस्तान से बांग्लादेश को मुक्त कराया। 1975 में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी ठहराया गया और छह साल के लिए पद धारण करने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
इंदिरा ने इस्तीफा देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया और देश में आपातकाल की घोषणा कर दी जो लगभग दो साल तक चला। इसके बाद 1977 में आम चुनाव में मोरारजी देसाई से वह हार गईं। मोरारजी देसाई 1977 के चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन का हिस्सा जनता पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे। जनता पार्टी का गठबंधन 1979 में टूट गया और इंदिरा गांधी सत्ता में दोबारा वापस आ गई।
इंदिरा गांधी ने वर्ष 1984 में उन्होंने पंजाब को अलग करने की मांग कर रहे सिख उग्रवादियों को खदेड़ने के लिए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर धावा बोलने का आदेश दिया था। इसके परिणामस्वरूप कुछ महीने बाद 31 अक्टूबर 1984 में उनकी हत्या उनके ही सिख अंगरक्षकों ने कर दी। उनकी हत्या के बाद चले दंगों में सैंकड़ों लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर सिख थे।