Missing Children: NCRB की ताजा रिपोर्ट के आधार पर देश के 5 प्रमुख राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बच्चों की गुमशुदगी के आंकड़ों पर एक विशेष डिजिटल रिपोर्ट। राजस्थान में हर दिन गायब होने वाले बच्चों में से 84% लड़कियां होती हैं। एनसीआरबी 2024 की इस रिपोर्ट के आधार पर जानिए बच्चों की गुमशुदगी के पीछे का कड़वा सच, मानव तस्करी का जाल, सोशल मीडिया के खतरे और पुलिस प्रशासन के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां।
Missing Children : कल 'अंतरराष्ट्रीय गुमशुदा बाल दिवस' (International Missing Children Day) था। एक ऐसा दिन जो दुनिया भर को उन मासूमों की याद दिलाता है जो एक सुबह अपने घरों से निकले तो सही, लेकिन कभी लौटकर वापस नहीं आए। हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को हिलाकर रख देने के लिए काफी हैं।
आंकड़े बताते हैं कि 2024 में देश भर बच्चों की गुमशुदगी के मामले राजस्थान में 7,198 , मध्य प्रदेश में 11,000 ,बिहार में 12,000 से 14,000 , महाराष्ट्र 12,994 और पश्चिम बंगाल में 22,742 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। यह महज एक सांख्यिकीय डेटा नहीं है, बल्कि यह उन मांओं की चीख है, जो थानों के चक्कर काटते-काटते थक चुकी हैं। यह उन पिताओं की बेबसी है, जिनकी आंखें घर के मुख्य दरवाजे को ताकते-ताकते थक गई हैं। आइए, इस विशेष रिपोर्ट के माध्यम से हम देश भर में बच्चों की गुमशुदगी के इस भयावहता को समझते हैं।
हर राज्य की अपनी एक अलग भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक बनावट है। यही कारण है कि अलग-अलग राज्यों में बच्चों के गायब होने के मुख्य कारण भी अलग-अलग हैं।
महाराष्ट्र और अन्य राज्यों की पुलिस के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 'बचपन बचाओ आंदोलन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2013)' मामले में एक ऐतिहासिक निर्देश दिया था। इस निर्देश के मुताबिक, यदि कोई भी नाबालिग (बच्चा) लापता होता है, तो पुलिस को बिना किसी देरी या जांच के इंतजार किए सीधे धारा 363 (अपहरण/Kidnapping) के तहत FIR दर्ज करनी होगी। यही वजह है कि अब थानों में हर मामले की एंट्री अनिवार्य हो गई है, जिससे ऑन-रिकॉर्ड आंकड़े पहले की तुलना में बहुत बड़े और पारदर्शी दिखाई दे रहे हैं।
यह समस्या सिर्फ कुछ सीमित राज्यों तक नहीं है, बल्कि पूरे भारत के स्तर पर यह एक महामारी का रूप ले चुकी है। देश भर के आंकड़े और भी ज्यादा भयावह हैं।
हम जब इस विषय की गहराई में जाते हैं, तो बच्चों के गायब होने के पीछे कोई एक वजह नजर नहीं आती। इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी कारणों का एक जटिल जाल काम कर रहा है।
आज जब हम इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि इस दिन की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे क्या इतिहास है। यह कहानी न्यूयॉर्क शहर की है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान इस संवेदनशील मुद्दे की ओर खींचा।
इस गंभीर संकट से निपटने के लिए केवल पुलिस या सरकार के भरोसे नहीं बैठा जा सकता। इसके लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण (Multi-Dimensional Approach) की जरूरत है।
एनसीआरबी रिर्पोट के ये आंकड़े हमारे खोखले होते जा रहे सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने का आईना हैं। हर दिन गायब होने वाले 20 बच्चे और उनमें 84 फीसदी बेटियों का होना यह चीख-चीख कर कह रहे है कि संकट गहरा है। इंटरनेशनल मिसिंग चिल्ड्रेन डे पर हमें केवल चिंता व्यक्त करने के बजाय एक प्रतिज्ञा लेनी होगी चाहे वह घर हो, स्कूल हो या समाज का कोई भी कोना, हमें बच्चों के लिए एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करना होगा जहां कोई भी मासूम 'लापता' शब्द की भेंट न चढ़े। जब तक वो 48 हजार से ज्यादा बच्चे अपने घरों को नहीं लौट आते, तब तक देश की तरक्की के हर दावे अधूरे हैं।