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IBS: पेट में हो रहा बार-बार दर्द! कहीं Irritable Bowel Syndrome तो नहीं? गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से इसे ठीक करने के उपाय जानिए

IBS Syndrome: क्या आप पेट दर्द, गैस और बार-बार दस्त-कब्ज से परेशान हैं? गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से जानिए इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) के शुरुआती लक्षण और कंट्रोल करने के उपाय।
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Jul 10, 2026
IBS syndrome Healthy Gut Mental Well-being Permanent Cure
आंतों को 100% फिट रखने का फॉर्मूला!(Photo:AI)

IBS : अक्सर लोग पेट दर्द, गैस या बदहजमी को आम समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं या फिर बिना डॉक्टर की सलाह के एंटासिड (Antacids) चबा लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेट की यह लगातार बनी रहने वाली बेचैनी एक गंभीर मेडिकल कंडीशन हो सकती है, जिसे इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (Irritable Bowel Syndrome IBS) कहा जाता है।

गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट (पेट व आंत रोग विशेषज्ञ) के अनुसार, भारत सहित दुनियाभर में युवाओं और कामकाजी आबादी में IBS के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह आंतों से जुड़ी एक ऐसी क्रोनिक (लंबे समय तक चलने वाली) समस्या है, जो मरीज की पूरी दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। आइए समझते हैं कि IBS क्या है, इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं और इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।

क्या है इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS)?

आईबीएस (IBS) कोई स्ट्रक्चरल बीमारी नहीं है, यानी एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी कराने पर आंतों में कोई घाव, छाले या ट्यूमर जैसी विकृति दिखाई नहीं देती। यह असल में आंतों की कार्यप्रणाली से जुड़ी गड़बड़ी (Functional Gastrointestinal Disorder) है। हमारी आंतों की दीवारें भोजन को आगे बढ़ाने के लिए एक निश्चित लय में सिकुड़ती और फैलती हैं। लेकिन IBS से पीड़ित मरीजों में यह लय (Contractions) बिगड़ जाती है। जब ये संकुचन बहुत तेज होते हैं, तो भोजन बहुत जल्दी आगे बढ़ता है जिससे दस्त (Diarrhea) की समस्या होती है। वहीं, जब ये संकुचन बहुत धीमे होते हैं, तो मल सूख जाता है और मरीज को गंभीर कब्ज (Constipation) का सामना करना पड़ता है।

डॉ. शुभम अग्रवाल से पत्रिका की बातचीत

आम तौर पर लोग पेट दर्द या गैस को सामान्य समझकर घरेलू नुस्खे अपनाने लगते हैं। एक डॉक्टर के तौर पर आप कब और किन लक्षणों को देखकर यह तय करते हैं कि मरीज को सामान्य गैस नहीं बल्कि IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) है?

लगभग हर व्यक्ति को कभी न कभी गैस, पेट फूलने या पेट दर्द की शिकायत होती है। अधिकांश मामलों में यह समस्या गलत खान-पान, असमय भोजन करने या अपच (Indigestion) के कारण अस्थायी तौर पर होती है। लेकिन यदि यही समस्या बार-बार होने लगे और व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तब हमें IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) की संभावना पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। IBS एक फंक्शनल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिसऑर्डर (Functional Gastrointestinal Disorder) है। इसका सीधा मतलब यह है कि आंतों में संरचनात्मक रूप से कोई बड़ा घाव, अल्सर या कैंसर नहीं होता, बल्कि आंतों के काम करने का तरीका बदल जाता है। यही कारण है कि मेडिकल जांचों (जैसे ब्लड टेस्ट या स्कैन) की रिपोर्ट सामान्य आने के बावजूद, मरीज को वास्तविक और असहनीय तकलीफ होती है।

IBS की ओर संकेत करने वाले प्रमुख लक्षण

  • यदि किसी व्यक्ति को नीचे दिए गए लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो यह आईबीएस (IBS) के संकेत हो सकते हैं।
  • लगातार पेट दर्द: पिछले 3 महीने या उससे अधिक समय से बार-बार पेट में दर्द या मरोड़ होना।
  • मल त्याग के बाद आराम: पेट का दर्द या भारीपन मल त्याग (शौच) करने के बाद काफी कम हो जाता है।
  • बाउल हैबिट्स में बदलाव: कब्ज (Constipation), दस्त (Diarrhea) या फिर दोनों का बारी-बारी से होना।
  • ब्लोटिंग: पेट में लगातार गैस बनना, भारीपन रहना और पेट का फूलना।
  • सुबह जगते ही प्रेशर फील करना (Morning Urge): सुबह सोकर उठते ही बार-बार शौच जाने की तीव्र इच्छा होना।
  • अधूरापन: शौच के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट पूरी तरह साफ नहीं हुआ है (Incomplete Evacuation)।

मेडिकल साइंस में 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) की बहुत चर्चा होती है। यह बताए कि हमारे दिमाग का तनाव हमारे पेट को कैसे बीमार कर देता है?

हमारे मस्तिष्क और पाचन तंत्र (गट) के बीच एक सीधा और गहरा संबंध होता है, जिसे मेडिकल साइंस में 'गट-ब्रेन एक्सिस' (Gut-Brain Axis) कहा जाता है। यह दोनों अंग न्यूरोट्रांसमीटर और वेगस नर्व (Vagus Nerve) के जरिए हर सेकंड आपस में संवाद करते हैं। जब हम अत्यधिक मानसिक तनाव, चिंता (Anxiety) या अवसाद में होते हैं, तो हमारा मस्तिष्क 'फाइट या फ्लाइट' मोड में चला जाता है और कोर्टिसोल व एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स रिलीज करता है।

ये हार्मोन्स हमारे पेट पर निम्नलिखित नकारात्मक प्रभाव डालते हैं ।

  • असामान्य संकुचन: आंतों की गति (Motility) बिगड़ जाती है, जिससे अचानक दस्त या गंभीर कब्ज (IBS) की समस्या होने लगती है।
  • संवेदनशीलता (Hypersensitivity): आंतों के नर्व सेल्स इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि सामान्य गैस या खाना भी तेज दर्द और मरोड़ पैदा करता है।
  • सूजन और लीकी गट: तनाव आंतों की सुरक्षात्मक परत को कमजोर कर देता है, जिससे पेट में सूजन (Inflammation) और ब्लोटिंग बढ़ जाती है।

क्या IBS पुरुषों की तुलना में महिलाओं को या किसी खास उम्र के लोगों (जैसे युवाओं या कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स) को ज्यादा प्रभावित करता है? इसके पीछे क्या कारण हैं?

पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आईबीएस (IBS) के मामले अपेक्षाकृत काफी ज्यादा पाए जाते हैं। गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट इसके पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण मानते हैं

  • हार्मोनल बदलाव: महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोनल उतार-चढ़ाव, विशेषकर मासिक धर्म (Periods) के दौरान, आंतों की गतिशीलता को सीधे प्रभावित करते हैं।
  • संवेदनशीलता में अंतर: पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में आंतों के भीतर दर्द और ऐंठन महसूस करने की न्यूरोलॉजिकल संवेदनशीलता (Visceral Hypersensitivity) अधिक होती है।
  • तनाव और एंग्जायटी: घरेलू और बाहरी जिम्मेदारियों के कारण महिलाएं अक्सर मानसिक तनाव और चिंता की अधिक शिकार होती हैं, जो उनके गट हेल्थ को बिगाड़ता है।
  • कब्ज की समस्या: आईबीएस के विभिन्न प्रकारों में से कब्ज-प्रधान आईबीएस (IBS-C) महिलाओं में सबसे ज्यादा देखा जाता है।

अक्सर लोग IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) और IBD (इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज) के बीच भ्रमित हो जाते हैं। इन दोनों में क्या बुनियादी अंतर है?

चूंकि इन दोनों बीमारियों के नाम आपस में काफी मिलते-जुलते हैं, इसलिए अक्सर आम लोग ही नहीं बल्कि मरीज भी इनके बीच भ्रमित (Confused) हो जाते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस में IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) और IBD (इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज) दो बिल्कुल अलग-अलग स्थितियां हैं, जिनका इलाज भी पूरी तरह भिन्न है।

IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम) : यह आंतों की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक विकार है, जिसे 'फंक्शनल डिसऑर्डर' कहा जाता है।

  • आंतों की स्थिति: इसमें आंतों की अंदरूनी परत में कोई स्थायी सूजन, घाव या अल्सर नहीं होता।
  • मेडिकल रिपोर्ट्स: एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी या ब्लड टेस्ट जैसी जांचें अक्सर पूरी तरह सामान्य आती हैं।
  • कैंसर का खतरा: आईबीएस (IBS) के कारण भविष्य में कभी भी कैंसर नहीं बनता।
  • प्रभाव: यह बीमारी मरीज की जीवन की गुणवत्ता (Quality of life) को तो बुरी तरह प्रभावित करती है, लेकिन इससे आंतों को कोई स्थायी या शारीरिक नुकसान (Structural damage) नहीं पहुंचता।

IBD (इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज) : यह आंतों की एक गंभीर और क्रोनिक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें मुख्य रूप से दो स्थितियां शामिल हैं क्रोहन्स डिजीज (Crohn's Disease) और अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis)

  • आंतों की स्थिति: इसमें मरीज की आंतों में वास्तविक और गंभीर सूजन होती है, जिसके कारण अंदरूनी दीवारों पर गहरे घाव या अल्सर बन जाते हैं।
  • प्रमुख लक्षण: इसमें मरीज को बार-बार मल के साथ खून आना, तेजी से वजन कम होना और शरीर में खून की भारी कमी (एनीमिया) जैसे गंभीर लक्षण दिखते हैं।
  • कैंसर का खतरा: यदि आईबीडी (IBD) का इलाज लंबे समय तक न किया जाए, तो कुछ मरीजों में आगे चलकर कोलोरेक्टल कैंसर (Colorectal Cancer) का जोखिम काफी बढ़ जाता है।

आजकल डिजिटल मीडिया पर 'Low-FODMAP डाइट' की बहुत बात होती है। एक भारतीय रसोई या भारतीय खान-पान के संदर्भ में ऐसी कौन सी सामान्य चीजें हैं जिन्हें आईबीएस के मरीज को तुरंत बंद कर देना चाहिए और किसे शामिल करना चाहिए?

भारतीय खान-पान के संदर्भ में Low-FODMAP डाइट को इस तरह समझें:

कहा जाता है कि IBS का कोई स्थायी इलाज (Permanent Cure) नहीं है, तो क्या मरीज को पूरी जिंदगी दवाइयां खानी पड़ती हैं? या सिर्फ लाइफस्टाइल बदलकर इससे पूरी तरह सामान्य जीवन जिया जा सकता है?

यह सच है कि IBS का कोई स्थायी मेडिकल इलाज नहीं है, लेकिन मरीज को पूरी जिंदगी दवाइयां खाने की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। दवाएं सिर्फ शुरुआत में गंभीर लक्षणों को शांत करने के लिए शॉर्ट-टर्म बैकअप के रूप में दी जाती हैं। IBS को कंट्रोल करने की असली चाबी लाइफस्टाइल और डाइट में बदलाव है। जब मरीज अपनी ट्रिगर चीजों की पहचान कर लेता है (जैसे Low-FODMAP डाइट लेना, समय पर खाना, 7-8 घंटे की नींद और योग/मेडिटेशन से तनाव दूर रखना), तो आंतों की संवेदनशीलता स्वतः सामान्य हो जाती है। लाइफस्टाइल सुधरते ही दवाएं बंद हो जाती हैं और मरीज पूरी तरह सामान्य व स्वस्थ जीवन जी सकता है।

Updated on:
10 Jul 2026 10:43 am
Published on:
10 Jul 2026 10:40 am