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Herbal Cigarette : ‘हर्बल सिगरेट’ का धुंआ भी फेफड़ों के लिए घातक, पल्मोनोलॉजिस्ट से समझिए ये बातें

Herbal Cigarette Damages Lungs: क्या आयुर्वेदिक सिगरेट सच में हेल्दी है? जानिए हर्बल सिगरेट के भ्रामक दावों, इसके साइड इफेक्ट्स और कंपनियों के मुनाफे के पीछे का पूरा सच।

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Jun 15, 2026
No Nicotine Herbal Cigarette Ultrafine Particles Lead
क्या तुलसी और पुदीने वाली सिगरेट सच में सेफ है?( Photo: AI Generated)

Herbal CigaretteGood or Bad : क्या आप सिगरेट की लत छोड़ने के लिए 'हर्बल' या 'आयुर्वेदिक' सिगरेट का सहारा ले रहे हैं? या फिर इसे 'टोबैको-फ्री' और 'निकोटीन-फ्री' समझकर शौक के लिए फूंक रहे हैं? अगर ऐसा है, तो आप एक बहुत बड़े और खतरनाक भ्रम का शिकार हैं।

बाजार में इन दिनों तुलसी, पुदीना, ग्रीन टी, दालचीनी और कैमोमाइल जैसी जड़ी-बूटियों से बनी सिगरेट की बाढ़ आई हुई है। कंपनियां इसे '100% नेचुरल' और 'सेफ लाइफस्टाइल प्रोडक्ट' बताकर प्रमोट कर रही हैं। लेकिन विज्ञान का कहना है कि यह 'हर्बल' धुआं आपकी सेहत को उसी तरह छलनी कर रहा है, जैसे आम तंबाकू वाली सिगरेट। आइए जानते हैं क्या कहती है इस पर हालिया रिसर्च और कैसे इसके नाम पर करोड़ों का मुनाफा कमाया जा रहा है।

IIT की रिसर्च ने खोली पोल

  • आईआईटी गांधीनगर (IIT Gandhinagar) और यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय के वैज्ञानिकों ने हाल ही में हर्बल सिगरेट पर एक विस्तृत स्टडी की है। इस शोध के नतीजे उन लोगों की आंखें खोलने वाले हैं जो हर्बल सिगरेट को सेहतमंद विकल्प मानते हैं। वैज्ञानिकों ने जब लैब में हर्बल सिगरेट के धुएं की जांच की, तो उसमें चौंकाने वाले तत्व मिले। इस रिसर्च में पाया गया।
  • 20% ज्यादा सूक्ष्म कण (Ultrafine Particles): हर्बल सिगरेट के धुएं में 500 नैनोमीटर से भी छोटे अति-सूक्ष्म कण पाए गए हैं। ये कण सामान्य तंबाकू वाली सिगरेट के मुकाबले 20 फीसदी अधिक मात्रा में निकलते हैं। इतने बारीक होने के कारण ये फेफड़ों के सबसे गहरे हिस्सों (Alveoli) में जाकर जमा हो जाते हैं और सीधे रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं।
  • लेड (Lead) और भारी धातुएं: 'केमिकल फ्री' होने का दावा करने वाली कुछ मशहूर हर्बल सिगरेट ब्रांड्स की जांच में 'लेड' (सीसा) की मात्रा बहुत अधिक पाई गई। लेड शरीर के नर्वस सिस्टम और किडनी को सीधा नुकसान पहुंचाता है।
  • तेंदू पत्ते का जहर: कई आयुर्वेदिक सिगरेट को फिल्टर पेपर की जगह 'तेंदू पत्ते' (जिससे बीड़ी बनती है) में लपेटा जाता है। रिसर्च के मुताबिक, तेंदू पत्ता जलने पर सामान्य सिगरेट पेपर की तुलना में 49% अधिक टॉक्सिक (जहरीला) होता है।

डॉ. सुधांशु शर्मा (पल्मोनोलॉजिस्ट) के साथ पत्रिका के सवाल जवाब

कंपनियां दावा करती हैं कि इनमें तुलसी, पुदीना और ग्रीन टी है जो सेहत के लिए अच्छी हैं। मेडिकल साइंस के नजरिए से जब ये चीजें जलती हैं, तो फेफड़ों के रिसेप्टर्स पर इनका क्या असर पड़ता है?

तुलसी या पुदीना खाना सेहत के लिए अच्छा है, लेकिन उन्हें जलाना और उनका धुआं फेफड़ों में खींचना बेहद खतरनाक है।जब ये जड़ी-बूटियां जलती हैं, तो इनका औषधीय गुण खत्म हो जाता है और ये टार (Tar), कार्बन मोनोऑक्साइड और जहरीली गैसों में बदल जाती हैं। फेफड़ों के रिसेप्टर्स और वायुमार्ग की अंदरूनी परत (Cilia) इस धुएं को एक बाहरी हमलावर (Foreign Particle) मानते हैं। इससे रिसेप्टर्स में तीव्र जलन होती है, फेफड़ों की रक्षा प्रणाली ठप हो जाती है और वहां गंभीर सूजन (Inflammation) आ जाती है। लंबे समय में यह फेफड़ों के टिश्यूज को स्थायी रूप से डैमेज कर देता है।

क्या निकोटीन न होने का मतलब यह मान लिया जाए कि यह सिगरेट पूरी तरह से 'कैंसर-फ्री' या सेफ है? फेफड़ों की अंदरूनी परत (Cilia) पर इसका धुआं क्या असर डालता है?

बिल्कुल नहीं, निकोटीन न होने का मतलब 'कैंसर-फ्री' या सेफ होना कतई नहीं है। निकोटीन सिर्फ लत (Addiction) पैदा करता है, जबकि कैंसर और फेफड़ों की बीमारियां धुआं जलने से निकलने वाले टार, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAH) और कार्बन मोनोऑक्साइड से होती हैं, जो हर्बल सिगरेट में भी भरपूर होते हैं। फेफड़ों की अंदरूनी परत पर मौजूद सिलिया (Cilia) जो झाड़ू की तरह फेफड़ों से धूल और बैक्टीरिया साफ करते हैं। इस हर्बल धुएं के संपर्क में आते ही पैरालाइज (ठप) हो जाते हैं। सिलिया के नष्ट होने से फेफड़ों का नेचुरल क्लीनिंग सिस्टम बंद हो जाता है, जिससे क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, इन्फेक्शन और कैंसर का खतरा बराबर बना रहता है।

कई ब्रांड्स इसे 'स्मोकिंग सेसेशन प्रोडक्ट' (सिगरेट छोड़ने की दवा) की तरह प्रमोट करते हैं। क्या मेडिकल काउंसिल या कोई भी हेल्थ अथॉरिटी हर्बल सिगरेट को तंबाकू छोड़ने का सही जरिया मानती है?

दुनिया की किसी भी प्रतिष्ठित मेडिकल काउंसिल या हेल्थ अथॉरिटी (जैसे WHO, FDA या AIIMS) ने हर्बल सिगरेट को 'स्मोकिंग सेसेशन प्रोडक्ट' (धूम्रपान छोड़ने का साधन) के रूप में मान्यता नहीं दी है। मेडिकल साइंस के अनुसार, यह केवल एक भ्रम है। निकोटीन छोड़ने के लिए लोग इस पर शिफ्ट तो हो जाते हैं, लेकिन सिगरेट पीने का व्यवहार (Smoking Behavior) और हाथ-मुंह का मूवमेंट वैसा ही रहता है, जिससे लत का मनोवैज्ञानिक चक्र कभी नहीं टूटता। उल्टा, फेफड़ों को भारी मात्रा में टार और कार्बन मोनोऑक्साइड का नुकसान झेलना पड़ता है। तंबाकू छोड़ने के लिए केवल मेडिकली अप्रूव्ड तरीके जैसे निकोटीन गम्स, पैच या काउंसिलिंग ही सही जरिया हैं।

अगर कोई चेन-स्मोकर तंबाकू छोड़कर पूरी तरह हर्बल सिगरेट पर शिफ्ट हो जाए, तो लंबे समय में (Long-term) उसके फेफड़ों और दिल (Cardiovascular system) को क्या नुकसान हो सकता है?

अगर कोई चेन-स्मोकर पूरी तरह हर्बल सिगरेट पर शिफ्ट होता है, तो लंबे समय में उसके फेफड़े और दिल दोनों गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं।

  • फेफड़ों को नुकसान (COPD का खतरा): लगातार हर्बल धुआं और टार अंदर जाने से फेफड़ों के वायुकोश (Alveoli) स्थायी रूप से डैमेज हो जाते हैं। इससे क्रोनिक ब्रोंकाइटिस और एम्फिसिमा (COPD) जैसी जानलेवा सांस की बीमारियां हो सकती हैं।
  • दिल को नुकसान (Cardiovascular System): हर्बल सिगरेट से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस खून में ऑक्सीजन की जगह ले लेती है। इससे दिल को शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है, धमनियों में ब्लॉकेज (Atherosclerosis) होने लगती है और हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

लैब टेस्टिंग में कुछ बड़े हर्बल सिगरेट ब्रांड्स में 'लेड' (सीसा) की मात्रा पाई गई है। शरीर के नर्वस सिस्टम, किडनी और मानसिक स्वास्थ्य पर धुएं के जरिए लेड पहुंचने का क्या असर होता है?

धुएं के जरिए लेड (सीसा) का सीधे फेफड़ों में पहुंचना बेहद घातक है, क्योंकि यह बिना किसी फिल्टर के सीधे ब्लडस्ट्रीम (रक्तप्रवाह) में मिल जाता है।

  • नर्वस सिस्टम और मानसिक स्वास्थ्य: लेड एक शक्तिशाली न्यूरोटॉक्सिन (तंत्री-विष) है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं को नष्ट करता है, जिससे याददाश्त कमजोर होना, एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं होने लगती हैं। लंबे समय में यह पेरिफेरल न्यूरोपैथी (हाथ-पैरों में सुन्नता या झनझनाहट) की वजह बनता है।
  • किडनी पर असर: लेड शरीर से टॉक्सिन्स को फिल्टर करने वाले नेफ्रॉन्स को डैमेज कर देता है, जिससे धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता घटने लगती है और क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) का खतरा बढ़ जाता है।

आजकल कॉलेज जाने वाले युवाओं में हर्बल सिगरेट को एक 'कूल और हर्बल लाइफस्टाइल' का हिस्सा माना जा रहा है। इस भ्रम को तोड़ने के लिए युवाओं और उनके माता-पिता को आपकी क्या सलाह है?

  • युवाओं को सलाह: 'कूल' दिखने की चाह में 'ऑर्गेनिक मौत' की तरफ न बढ़ें। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कंपनियों की फैंसी मार्केटिंग सिर्फ एक धोखा है। आपका शरीर और फेफड़े केवल शुद्ध ऑक्सीजन के लिए बने हैं, तुलसी या पुदीने के जहरीले धुएं के लिए नहीं। धुआं उड़ाना कोई लाइफस्टाइल या स्वैग नहीं, बल्कि फेफड़ों को समय से पहले बूढ़ा और बीमार करने का जरिया है।
  • माता-पिता को सलाह: बच्चों की अलमारी या पॉकेट में 'आयुर्वेदिक' या 'तंबाकू-मुक्त' लिखे सिगरेट के पैकेट देखकर निश्चिंत न हों। यह सोचकर अनदेखा न करें कि यह तो सेफ है। बच्चों से खुलकर बात करें, उन्हें समझाएं कि 'नेचुरल स्मोक' जैसी कोई चीज नहीं होती। अगर बच्चा सिगरेट छोड़ना चाहता है, तो भ्रामक हर्बल सिगरेट दिलाने के बजाय उसे किसी चेस्ट स्पेशलिस्ट या काउंसलर के पास ले जाएं।
  • सबसे जरूरी बात: 'सेफ सिगरेट' जैसी कोई चीज नहीं होती। सुरक्षित धुआं सिर्फ वही है, जो आपके फेफड़ों तक पहुंचे ही नहीं।
Published on:
15 Jun 2026 10:31 am