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Kalpakkam: 20 साल बाद भारत को मिली ‘परमाणु’ जीत!, कलपक्कम के PFBR ने बनाया न्यूक्लियर सुपरपावर

Kalpakkam Prototype Fast Breeder Reactor: भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में इतिहास रच दिया है। कलपक्कम के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) के 'क्रिटिकल' होते ही चीन और पाकिस्तान की नींद उड़ गई है। भारत अब परमाणु कचरे से भी बिजली बनाएगा और सुपरपावर बनने की रेस में सबको पीछे छोड़ देगा।

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Apr 10, 2026
भारत का न्यूक्लियर ब्रह्मास्त्र देसी जुगाड़, देसी ताकत (AI)

Kalpakkam Prototype Fast Breeder Reactor: एक ओर ईरान, इजरायल और अमेरिका तो दूसरी ओर रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध से पूरी दुनिया असुरक्षित महसूस करने लगी है। दुनिया के कई देश लगातार अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने में लगे हुए हैं। अभी तो ईरान-अमेरिका के बीच दो हफ्ते का संघर्ष विराम की घोषणा हुई है लेकिन दोनों के बीच समझौता नहीं हो पाया तो इसकी संभावना है कि परमाणु हमले भी हो सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल जाएगी। ऊर्जा सप्लाई पूरी तरह बाधित हो जाएगी। इन तनावों के बीच भारत ने अपना कलपक्कम 'प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (PFBR) प्रोजेक्ट शुरू किया है।

भारत के इस कदम को दुनिया परमाणु ताकत से जोड़कर देख रही है। लेकिन, भारत ने ‘परमाणु कचरे से बिजली’ बनाकर ये दिखा दिया है कि वह दुनिया की तबाही नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती है। ये टेक्नोलॉजी भारत को बाहरी दबावों से मुक्ति दिलाएगी और अगर दुनिया में हालात बिगड़ते भी हैं, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और सैन्य ताकत पर कोई आंच नहीं आएगी।

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कलपक्कम से भारत ने लिखी न्यूक्लियर जीत की इबारत

भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसका सपना दशकों पहले देखा गया था। तमिलनाडु के कलपक्कम में 'प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (PFBR) के चालू होते ही भारत, दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो परमाणु कचरे से भी बिजली बना सकते हैं। यह सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक बढ़त को खत्म करने वाला ब्रह्मास्त्र है। जहां पड़ोसी देश अरबों डॉलर खर्च करके भी इस तकनीक के लिए तरस रहे हैं, वहीं भारतीय वैज्ञानिकों ने पूरी तरह स्वदेशी तरीके से अपने दम पर इसे खड़ा कर दिया है।

खरबों का निवेश और ड्रैगन की भूख

चीन इस समय दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु पावरहाउस बनने की होड़ में है। वह केवल बिजली के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका को टक्कर देने के लिए परमाणु हथियारों पर भी पानी की तरह पैसा बहा रहा है। एक रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन हर साल अपने परमाणु कार्यक्रम और हथियारों के आधुनिकीकरण पर लगभग 10 से 15 अरब डॉलर (करीब 80,000 से 1,20,000 करोड़ रुपये) खर्च कर रहा है। चीन ने अगले 15 वर्षों में 150 नए परमाणु रिएक्टर बनाने का लक्ष्य रखा है, जिस पर वह करीब 440 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बना चुका है। ब्रीडर रिएक्टर के लिए चीन रूस की मदद से अपना 'CFR-600' फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तैयार करने में जुटा है।

बजट का बड़ा हिस्सा रक्षा और परमाणु ताकत पर खर्च

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भले ही खराब है, पर भारत के डर से वह अपनी पूरी ताकत परमाणु हथियारों और रिएक्टरों पर लगा रहा है। रक्षा और परमाणु बजट में पाकिस्तान अपने कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा करीब 15-20% रक्षा और परमाणु हथियारों पर खर्च कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान परमाणु हथियारों के रखरखाव और नए विकास पर सालाना 1 से 2 अरब डॉलर (करीब 8,000 से 16,000 करोड़ रुपये) खर्च कर रहा है।

पाकिस्तान की परमाणु तकनीक चीन पर निर्भर

पाकिस्तान के पास खुद की कोई एडवांस तकनीक नहीं है। उसके 'कराची न्यूक्लियर पावर प्लांट' (K-2, K-3) पूरी तरह चीन के कर्ज और तकनीक पर टिके हैं। चीन ने पाकिस्तान के परमाणु सेक्टर में अब तक 10 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश कर चूका है,पाकिस्तान कोशिश कर रहा है कि वो भारत से आगे निकल जाए, लेकिन सच ये है कि भारत एडवांस तकनीक के मामले में पहले ही उससे काफी आगे बढ़ चुका है।

भारत का देसी जुगाड़ चीन के अरबों डॉलर पर भारी

भारत का कलपक्कम रिएक्टर (PFBR) दुनिया का पहला ऐसा रिएक्टर है जो 'कमर्शियल लेवल' पर थोरियम का इस्तेमाल करने की दिशा में बढ़ा है। चीन और अमेरिका जैसे देश भी अभी इस तकनीक को पूरी तरह जमीन पर नहीं उतार पाए हैं। भारत ने यह परिक्षण बहुत कम खर्च में पूरा कर लिया है। भारत ने कलपक्कम रिएक्टर को बनाने में करीब 6,800 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। चीन के समान क्षमता वाले प्रोजेक्ट्स की लागत इससे तीन गुना ज्यादा है। भारतीय वैज्ञानिकों ने सस्ते में और एकदम सही काम करके पूरी दुनिया को हैरान कर दिया।

ईंधन की टेंशन खत्म

चीन को अपना परमाणु कार्यक्रम चलाने के लिए यूरेनियम का आयात करना पड़ता है। पाकिस्तान पूरी तरह चीन पर निर्भर हो चूका है। लेकिन भारत ने इस रिएक्टर के जरिए रास्ता साफ कर दिया है कि वह अपने थोरियम भंडार से सदियों तक बिजली बना सकता है। यानी अब भारत को किसी भी 'न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप' (NSG) की शर्तों को मामना जरुरी नहीं रहेगा।

भारत की परमाणु सुरक्षा बढ़त

यह रिएक्टर जितना ज्यादा 'प्लूटोनियम' पैदा करेगा, भारत की परमाणु सुरक्षा उतनी ही मजबूत होगी। चीन की सबसे बड़ी चिंता यही है कि भारत अब चुपचाप अपनी परमाणु क्षमता को बिजली उत्पादन के साथ बढ़ा आगे रहा है।

परमाणु निवेश (भारत, चीन, पाकिस्तान)

मानक (Parameter)भारत (India)चीन (China)पाकिस्तान (Pakistan)
अनुमानित वार्षिक परमाणु खर्च$3–5 बिलियन (ऊर्जा + रक्षा)$15 बिलियन$1–2 बिलियन
थोरियम भंडार25% (विश्व स्तर पर)5%–10%0 (नगण्य)
ब्रीडर रिएक्टर की स्थितिकलपक्कम PFBR चालू (Critical अवस्था तक विकसित)ट्रायल/विकास चरण मेंकोई स्थापित क्षमता नहीं

4.8 अरब डॉलर का निवेश

एक रिपोर्ट के अनुसार चीन ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 'चश्मा' परमाणु संयंत्र (Chashma-5) के लिए हाल ही में 4.8 अरब डॉलर का समझौता किया है। चीन चाहता है कि पाकिस्तान भारत को परमाणु मोर्चे पर उलझा कर रखे। लेकिन भारत की 'फास्ट ब्रीडर' तकनीक परिक्षण कर के इस खेल को ही बदल दिया है। पाकिस्तान जहां पुराने जमाने के रिएक्टरों पर अरबों का कर्ज ले रहा है, वहीं भारत ने भविष्य की तकनीक को कलपक्कम में चालू कर दिया है।

थोरियम का बढ़ेगा इस्तेमाल

अब परमाणु मिशन की प्रक्रिया चालू हो गई है, और ये लगातार बिजली पैदा करेगी। इससे बिजली के बिल में भी धीरे-धीरे राहत मिलने लगेगी। थोरियम का इस्तेमाल बढ़ेगा, तो बिजली बनाने की लागत लगभग आधी रह जाएगी। भारत की बिजली बनाने में अभी सौर, जल और पवन पर निर्भरता है। परमाणु रिएक्टर 24 घंटे बिना रुके बिजली देता है। इस तरह भारत अपनी लगातार ऊर्जा ताकत बढ़ा रहा है और आने वाले समय में बिजली सस्ती भी मिलेगी।

परमाणु ऊर्जा के लिए 50–70% यूरेनियम का आयात

भारत अपनी परमाणु ऊर्जा की जरूरतों के लिए अभी भी करीब 50–70% यूरेनियम बाहर से मंगाता है। लेकिन भारत धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बन रहा है, अब भारत को यूरेनियम के लिए रूस या अमेरिका पर निर्भर रहने और उनकी शर्तें मानने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कलपक्कम प्रोजेक्ट इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है।

वैज्ञानिकों की कई सालों की मेहनत

इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने लगभग दो दशक खर्च कर दिए। ये वैज्ञानिक 'भाविनी' (BHAVINI) संस्था के साथ जुड़े हुए हैं। तरल सोडियम को कंट्रोल करना और उसे बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल करना दुनिया की सबसे जटिल इंजीनियरिंग मानी जाती है। भारत ने यह कर दिखाया है। भारत की यह परियोजना बिजली संकट को हमेशा के लिए खत्म करने की चाबी साबित होने वाली है।

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