Beauty Skincare : क्या आपकी 'ग्लास स्किन' की चाहत ही आपकी त्वचा की दुश्मन बन गई है? जानिए कैसे अनजाने में आपके महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स और 10-स्टेप रूटीन आपकी स्किन को 'हाइपर-सेंसिटिव' बना रहे हैं। डॉ.पुनीत अग्रवाल से जानिए स्वस्थ त्वचा कैसे पाएं।
Beauty Skincare product: आज के दिखावे भरे दौर में हर किसी को 'इंस्टेंट ग्लो' (instant Glow) और 'ग्लास स्किन' (Glass Skin) चाहिए। विज्ञापन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स हमें विश्वास दिला रहे हैं कि जितने ज़्यादा प्रोडक्ट्स, उतनी ही खूबसूरत त्वचा। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के सुझावों और आकर्षक विज्ञापनों को देखकर हम अपने चेहरे पर ढेरों प्रयोग करने लगे हैं । लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि इतने जतन के बाद भी त्वचा पहले से अधिक लाल, ड्राई या दानेदार क्यों होती जा रही है? जानिए त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. पुनीत अग्रवाल से कैसे स्किनकेयर रूटीन आपकी सामान्य त्वचा भी 'हाइपर-सेंसिटिव' बना रहा है ।
हमारी त्वचा की सबसे ऊपरी परत को 'स्ट्रैटम कॉर्नियम' (Stratum Corneum ) कहते हैं, जिसे आम भाषा में स्किन बैरियर कहा जाता है। यह लिपिड्स (Fatty Acids) और कोशिकाओं से बनी एक दीवार है जो नमी को अंदर रखती है और बैक्टीरिया, प्रदूषण व एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों को बाहर। जब हम गलत प्रोडक्ट्स का चुनाव करते हैं, तो यह दीवार कमजोर पड़ जाती है। इसका नतीजा होता हैं त्वचा में जलन, खुजली और संवेदनशीलता।
इंटरनेट पर 10-स्टेप स्किनकेयर रूटीन काफी लोकप्रिय हुआ था, लेकिन त्वचा विशेषज्ञों (Dermatologists) के अनुसार, भारतीय त्वचा और मौसम के हिसाब से 'स्किन मिनिमलिज्म' (Skin Minimalism) सबसे बेहतर है।
अगर आपकी त्वचा किसी प्रोडक्ट की वजह से खराब हो गई है, तो इन घरेलू उपायों से उसे राहत दें ।
डिजिटल दुनिया में 'Skin Fasting' शब्द बहुत ट्रेंड कर रहा है। इसका अर्थ है कुछ दिनों के लिए सभी फैंसी प्रोडक्ट्स को छोड़कर त्वचा को सांस लेने देना। इसे करने का आसान तरीका है एक हफ्ते तक सिर्फ सादे पानी या माइल्ड क्लींजर और एक बेसिक मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल करें। इससे त्वचा को अपनी प्राकृतिक मरम्मत (Natural Repair) करने का समय मिलता है।
टीनेज (किशोरावस्था) में जब शरीर और त्वचा हार्मोनल बदलावों के दौर से गुजर रहे होते हैं, तब जरूरत से ज्यादा या गलत स्किनकेयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल फायदे की जगह भारी नुकसान पहुंचा सकता है। आजकल सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर 13-14 साल के बच्चे भी एंटी-एजिंग और स्ट्रॉन्ग एसिड्स का इस्तेमाल करने लगे हैं, जो उनके लिए खतरनाक है।
अगर आप टीनेजर हैं या आपके घर में कोई टीनेजर है, तो उनका रूटीन C-M-S (Cleanse-Moisturize-Sunscreen) तक ही सीमित रहना चाहिए।
आपकी ओपीडी में ऐसे कितने मरीज आते हैं, जो गलत ब्यूटी प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से अपनी त्वचा खराब कर चुके होते हैं? क्या यह संख्या पिछले कुछ सालों में बढ़ी है?
पत्रिका से बात करते हुए उन्होनें इस सवाल के जवाब में बताया अगर मैं अपनी ओपीडी (OPD) की बात करूं, तो हर 10 में से कम से कम 4 मरीज ऐसे होते हैं, जिनकी समस्या की मुख्य वजह गलत ब्यूटी प्रोडक्ट्स या 'एक्सपेरिमेंटल स्किनकेयर' होती है। पिछले 4-5 वर्षों में ऐसे मामलों में 30 से 40 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। पहले लोग त्वचा संबंधी बीमारियों जैसे एक्जिमा या इन्फेक्शन के लिए हमारे पास आते थे, लेकिन अब एक बड़ा वर्ग 'प्रोडक्ट-इंड्यूस्ड सेंसिटिविटी' (Product-Induced Sensitivity) का शिकार होकर आ रहा है। सोशल मीडिया और 'स्किनकेयर इन्फ्लुएंसर्स' के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग बिना अपनी स्किन टाइप को समझे स्ट्रॉन्ग एसिड्स, रेटिनॉल और पील्स का इस्तेमाल घर पर ही कर रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंताजनक स्थिति टीनेजर्स (किशोरों) में है। वे 'इंस्टेंट ग्लो' और 'ग्लास स्किन' की चाहत में ऐसे रसायनों का उपयोग कर रहे हैं जो उनकी उम्र के लिए बने ही नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि उनकी प्राकृतिक सुरक्षा परत (Skin Barrier) पूरी तरह नष्ट हो जाती है। हमारे पास आने वाले इन मरीजों में चेहरे पर लालिमा, लगातार जलन, दाने और समय से पहले झुर्रियों जैसी शिकायतें आम हो गई हैं। निखार पाने की जल्दी में लोग अपनी स्वस्थ त्वचा को 'बीमार' बना रहे हैं।
क्या वाकई 'ग्लास स्किन' जैसा कोई मेडिकल कॉन्सेप्ट है, या यह सिर्फ एक मार्केटिंग का तरीका है?
इस सवाल के जवाब में उन्होनें बताया चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) के नजरिए से कहूं तो 'ग्लास स्किन' जैसा कोई मेडिकल शब्द या कॉन्सेप्ट अस्तित्व में नहीं है। यह पूरी तरह से एक 'मार्केटिंग टर्म' है जिसे ब्यूटी इंडस्ट्री और कोरियन ब्यूटी ट्रेंड्स (K-Beauty) ने लोकप्रिय बनाया है। एक स्वस्थ त्वचा वह है जो हाइड्रेटेड हो, जिसका टेक्सचर एक समान हो और जिसका 'स्किन बैरियर' मजबूत हो। लेकिन 'ग्लास स्किन' जिस तरह की एकदम कांच जैसी चमक, बिना रोमछिद्रों (Pores) वाली और अत्यधिक परावर्तक (Reflective) त्वचा का दावा करती है, वह प्राकृतिक रूप से असंभव है। हर जीवित त्वचा में रोमछिद्र होते हैं, पसीना निकलता है और उसका अपना एक नेचुरल टेक्सचर ( Natural texture) होता है। विज्ञापनों में जो 'ग्लास स्किन' हमें दिखाई जाती है, वह अक्सर भारी मेकअप, लाइटिंग और डिजिटल फिल्टर्स का नतीजा होती है। समस्या तब शुरू होती है जब आम लोग इस अवास्तविक लक्ष्य को पाने के लिए त्वचा पर रसायनों की परतें चढ़ाने लगते हैं। इस चमक को पाने की कोशिश में लोग अपनी त्वचा की ऊपरी परत को इतना पतला कर देते हैं कि वह 'कांच' जैसी दिखने तो लगती है, लेकिन अंदर से वह 'हाइपर-सेंसिटिव' और डैमेज हो चुकी होती है।
हम अक्सर 'स्किन बैरियर' (Skin Barrier) टूटने की बात करते हैं। एक आम इंसान कैसे पहचान सकता है कि उसकी त्वचा की सुरक्षा परत डैमेज हो गई है?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया स्किन बैरियर को आप अपनी त्वचा की एक 'अदृश्य ढाल' समझ सकते हैं। जब यह ढाल टूटती है, तो आपकी त्वचा अपनी नमी खोने लगती है और बाहरी प्रदूषण व बैक्टीरिया सीधे अंदर प्रवेश करने लगते हैं। एक आम इंसान इसे कुछ बहुत ही स्पष्ट संकेतों से पहचान सकता है।
बाजार में मिलने वाले 'एक्टिव इंग्रीडिएंट्स' (जैसे रेटिनॉल या विटामिन-सी) बिना डॉक्टरी सलाह के इस्तेमाल करना कितना जोखिम भरा हो सकता है?
इस सवाल के जवाब में उन्होनें बताया बाजार में मिलने वाले 'एक्टिव इंग्रीडिएंट्स' जैसे रेटिनॉल, विटामिन-सी या सैलिसिलिक एसिड को बिना डॉक्टरी सलाह के इस्तेमाल करना 'बिना प्रिस्क्रिप्शन के दवा लेने' जैसा ही जोखिम भरा है। हर 'एक्टिव' का एक विशिष्ट काम और एकाग्रता (Concentration) होती है। उदाहरण के लिए, रेटिनॉल एक शक्तिशाली तत्व है। यदि इसे गलत मात्रा में या बिना सनस्क्रीन के लगाया जाए, तो यह 'केमिकल बर्न' और त्वचा को बुरी तरह छील सकता है। इसी तरह, विटामिन-सी हर स्किन टाइप को सूट नहीं करता, संवेदनशील त्वचा पर यह दाने और जलन पैदा कर सकता है।
सबसे बड़ा जोखिम तब होता है जब लोग यूट्यूब या रील्स देखकर कई एसिड्स को एक साथ मिला लेते हैं। इससे त्वचा का पीएच (pH) संतुलन बिगड़ जाता है और त्वचा 'हाइपर-पिगमेंटेड' (काली) पड़ सकती है। याद रखें, जो इंग्रीडिएंट आपकी सहेली या किसी इन्फ्लुएंसर के लिए काम कर रहा है, जरूरी नहीं कि वह आपकी त्वचा की बनावट के अनुकूल हो। स्किनकेयर कोई 'वन साइज फिट्स ऑल' फॉर्मूला नहीं है।
आजकल 12-15 साल के बच्चे भी एंटी-एजिंग प्रोडक्ट्स इस्तेमाल कर रहे हैं। कम उम्र में इन रसायनों का त्वचा की कोशिका संरचना (Cell Structure) पर क्या दीर्घकालिक असर पड़ता है?
यह एक अत्यंत चिंताजनक ट्रेंड है जिसे हम 'Pre-mature Skincare' कह सकते हैं। 12-15 साल की उम्र में त्वचा की कोशिका संरचना (Cell Structure) प्राकृतिक रूप से बहुत सक्रिय होती है और उसका 'सेल टर्नओवर' यानी नई कोशिकाएं बनने की प्रक्रिया बहुत तेज़ होती है। जब इस उम्र में बच्चे रेटिनॉल या एएचए (AHA) जैसे एंटी-एजिंग रसायनों का उपयोग करते हैं, तो वे त्वचा की इस स्वाभाविक प्रक्रिया में बाधा डालते हैं। ये उत्पाद त्वचा की सबसे ऊपरी परत को समय से पहले ही 'एक्सफोलिएट' ( Exfoliate ) कर देते हैं, जिससे कोशिकाएं पतली और कमजोर हो जाती हैं। Long-term impact के रूप में, ऐसी त्वचा अपनी प्राकृतिक नमी बनाए रखने की क्षमता खो देती है और समय से पहले ही बूढ़ी दिखने लगती है। इतना ही नहीं, कम उम्र में इन रसायनों का संपर्क त्वचा को धूप और प्रदूषण के प्रति इतना संवेदनशील बना देता है कि आगे चलकर उन्हें गंभीर पिगमेंटेशन और क्रॉनिक स्किन इन्फ्लेमेशन का सामना करना पड़ सकता है।
एक आइडियल और सुरक्षित स्किनकेयर रूटीन में अधिकतम कितने प्रोडक्ट्स होने चाहिए?
इस सवाल के जवाब में उन्होनें बताया स्किनकेयर के मामले में एक बुनियादी सिद्धांत हमेशा याद रखना चाहिए 'लेस इज मोर' (Less is More)। एक आइडियल और सुरक्षित रूटीन के लिए अधिकतम 3 से 4 प्रोडक्ट्स पर्याप्त होते हैं। किसी भी व्यक्ति का मूल रूटीन 'C-M-S' (Cleanse, Moisturize, Sunscreen) पर आधारित होना चाहिए। इसमें सबसे पहले एक कोमल क्लींजर, उसके बाद त्वचा की नमी बरकरार रखने के लिए एक अच्छा मॉइस्चराइजर, और दिन के समय सबसे महत्वपूर्ण सनस्क्रीन शामिल है। यदि आपकी कोई विशेष समस्या है (जैसे मुंहासे या पिगमेंटेशन), तो डॉक्टर की सलाह पर केवल एक सक्रिय तत्व (Active Ingredient) या सीरम जोड़ा जा सकता है। बाजार में प्रचलित 10-स्टेप या 7-स्टेप रूटीन न केवल जेब पर भारी पड़ते हैं, बल्कि त्वचा के प्राकृतिक संतुलन को भी बिगाड़ते हैं। जितने ज़्यादा प्रोडक्ट्स आप चेहरे पर लगाएंगे, त्वचा में जलन और 'प्रोडक्ट क्लैश' का खतरा उतना ही बढ़ेगा।
क्या 'डबल क्लींजिंग' या '7-स्टेप स्किनकेयर' जैसी कोरियन पद्धतियां भारतीय त्वचा और यहां के प्रदूषण भरे वातावरण के लिए अनुकूल हैं?
यह समझना बहुत जरूरी है कि '7-स्टेप' या '10-स्टेप' स्किनकेयर रूटीन कोरिया की ठंडी और कम नमी वाली जलवायु (Cold & Dry Climate) के हिसाब से बनाए गए हैं। भारतीय त्वचा और यहां के गर्म व प्रदूषण भरे वातावरण के लिए यह पद्धतियां अक्सर प्रतिकूल साबित होती हैं। भारत में उमस (Humidity) और धूल-मिट्टी अधिक है। ऐसे में चेहरे पर 7-8 परतों वाले प्रोडक्ट्स लगाने से रोमछिद्र (Pores) बंद हो सकते हैं, जिससे मुंहासे और 'व्हाइटहेड्स' की समस्या बढ़ जाती है। जहां तक 'डबल क्लींजिंग' की बात है, यह केवल उनके लिए फायदेमंद है जो भारी मेकअप या 'वॉटरप्रूफ सनस्क्रीन' का इस्तेमाल करते हैं। बिना जरूरत रोजाना दो बार चेहरा धोने से त्वचा का प्राकृतिक तेल खत्म हो जाता है, जिससे स्किन बैरियर कमजोर पड़ सकता है। भारतीय परिस्थितियों में 'स्किन मिनिमलिज्म' ही सबसे बेहतर ओपशन है।
अगर किसी की त्वचा गलत प्रोडक्ट से जल गई है या सेंसिटिव हो गई है, तो उसे सबसे पहले क्या कदम उठाने चाहिए?
उन्होंने बताया कि अगर आपको महसूस हो कि किसी प्रोडक्ट की वजह से आपकी त्वचा लाल पड़ गई है, जल रही है या दाने निकल आए हैं, तो सबसे पहला कदम है 'स्किन फास्टिंग'। यानी, तुरंत उन सभी फैंसी सीरम्स, टोनर्स और एक्टिव इंग्रीडिएंट्स का इस्तेमाल बंद कर दें जिन्हें आप लगा रहे थे।
सस्ते और खुशबूदार प्रोडक्ट्स बनाम डर्मेटोलॉजिकल टेस्टेड प्रोडक्ट्स क्या कीमत वाकई क्वालिटी की गारंटी होती है?
इस सवाल के जबाव में उन्होनें बताया यह एक आम धारणा है कि महंगा प्रोडक्ट हमेशा बेहतर होता है, लेकिन स्किनकेयर में 'कीमत' से ज्यादा 'फॉर्मूलेशन' मायने रखता है। सस्ते और अत्यधिक खुशबूदार प्रोडक्ट्स में अक्सर 'सिंथेटिक फ्रैगरेंस' और अल्कोहल का इस्तेमाल किया जाता है, जो त्वचा को तुरंत तो अच्छा महसूस कराते हैं, लेकिन लंबे समय में उसे संवेदनशील और ड्राई बना देते हैं।